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संसद मार्ग थाने पहुंची CJP की टीम, निशु आजाद के पिता से मारपीट मामले में कार्रवाई की मांग

by न्यूज डेस्क

नई दिल्ली: जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान निशु आजाद के पिता संजय कुमार के साथ कथित मारपीट का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। घटना को लेकर दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गया है। CJP के प्रवक्ता सौरव दास और आशुतोष रांका पार्टी समर्थकों के साथ पटेल चौक से संसद मार्ग थाने पहुंचे और पुलिस से मामले में सख्त कार्रवाई की मांग की। निशु आजाद भी इस दौरान थाने पहुंचीं। इस मामले में आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर भी प्रदर्शनकारियों के समर्थन में संसद मार्ग थाने पहुंचे हैं।
वायरल पॉडकास्ट क्लिप के बाद फिर गरमाया मामला

दरअसल, सोशल मीडिया पर सामने आए एक पॉडकास्ट वीडियो की क्लिप के बाद यह मामला दोबारा चर्चा में आया। क्लिप में स्वतंत्र भारद्वाज कथित तौर पर यह दावा करते नजर आ रहे हैं कि संजय कुमार के सिर पर हमला उन्होंने ही किया था। वीडियो में राजनीतिक प्रभाव की वजह से अपने खिलाफ बड़ी कानूनी कार्रवाई नहीं होने का भी दावा किए जाने की बात सामने आई है। क्लिप वायरल होने के बाद CJP ने मामले में पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। पार्टी के पदाधिकारी और समर्थक पटेल चौक से संसद मार्ग थाने तक पहुंचे और आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की।

CJP की मांग- आरोपियों की तुरंत गिरफ्तारी हो

CJP के सह-संयोजक आशुतोष रांका ने कहा कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान संजय कुमार के साथ मारपीट हुई थी और उन्हें सिर में चोट आई थी। उनका कहना है कि घटना के बाद से ही पार्टी की ओर से दिल्ली पुलिस से आरोपियों की गिरफ्तारी और मामले में गंभीर धाराएं लगाने की मांग की जा रही है। रांका ने आरोप लगाया कि अब कथित तौर पर घटना में शामिल लोगों की ओर से संजय कुमार पर हमला करने की बात सामने आ रही है। इसके बावजूद पुलिस की कार्रवाई को लेकर सवाल बने हुए हैं। 
उन्होंने कहा कि पार्टी चाहती है कि जिन लोगों ने कथित तौर पर घटना में अपनी भूमिका स्वीकार की है, उन्हें तत्काल गिरफ्तार किया जाए। साथ ही मामले में हत्या के प्रयास समेत सभी लागू गंभीर धाराओं के तहत कार्रवाई की जाए। रांका ने पुलिस की अब तक की कार्रवाई पर नाराजगी जताते हुए कहा कि उनकी टीम शुरुआत से ही संजय कुमार और उनके परिवार के साथ खड़ी है।

कांग्रेस की लीगल टीम भी हुई सक्रिय

मामले में अब कांग्रेस की कानूनी टीम की सक्रियता भी सामने आई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की सोशल मीडिया पोस्ट के बाद पार्टी की लीगल टीम ने निशु आजाद को कानूनी मदद देने की दिशा में कदम बढ़ाया है। फिलहाल प्रदर्शनकारियों की ओर से दिल्ली पुलिस से मामले की निष्पक्ष जांच, आरोपियों की गिरफ्तारी और कथित हमले में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग की जा रही है।


राघव चड्ढा का वोटर लिस्ट से नाम कटने पर AAP पर हमला, बोले- ‘पार्टी बौखलाई हुई है’, आप ने भी दिया जवाब

by न्यूज डेस्क

नई दिल्ली: पंजाब की ड्राफ्ट मतदाता सूची से राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा का नाम हटाए जाने को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के तहत जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में चड्ढा के नाम के सामने ‘Permanently Shifted’ यानी ‘स्थायी रूप से स्थानांतरित’ दर्ज किया गया है। उनका नाम अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लीकेट मतदाताओं वाली ASDD सूची में भी शामिल किया गया है। अपने नाम को ड्राफ्ट सूची से हटाए जाने पर राघव चड्ढा ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध से जोड़ते हुए पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। वहीं, AAP ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आती है और इसमें राज्य सरकार की कोई भूमिका नहीं है।

‘जब से AAP छोड़ी है, पार्टी बौखलाई हुई है’

राघव चड्ढा ने दावा किया कि अप्रैल 2026 में आम आदमी पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल होने के बाद से उन्हें और अन्य पूर्व AAP नेताओं को निशाना बनाया जा रहा है। उनका आरोप है कि पंजाब में पुलिस और प्रशासनिक मशीनरी का इस्तेमाल राजनीतिक बदले के लिए किया जा रहा है। चड्ढा ने अपने मोहाली के वोटर रजिस्ट्रेशन का जिक्र करते हुए सवाल उठाया कि उन्हें ‘Permanently Shifted’ किसने चिह्नित किया और इस जानकारी का सत्यापन किस स्तर पर हुआ। उनका कहना है कि इस पूरी प्रक्रिया में राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावी ड्यूटी में लगे अधिकारियों को भविष्य में पोस्टिंग और तबादले के लिए राज्य सरकार के प्रशासनिक नियंत्रण में रहना पड़ता है। इसी वजह से उनके मुताबिक अधिकारियों पर दबाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

SIR के दौरान 20 लाख से ज्यादा नाम हटे

पंजाब में SIR के तहत ड्राफ्ट मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नामों की समीक्षा की गई है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, करीब 20.66 लाख मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची से हटाए गए हैं। यह पुनरीक्षण से पहले राज्य की कुल मतदाता संख्या का लगभग 9.7 फीसदी बताया गया है। राघव चड्ढा का नाम भी हटाए गए मतदाताओं में शामिल है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि अभी यह ड्राफ्ट मतदाता सूची है। अंतिम सूची जारी होने से पहले प्रभावित मतदाताओं को दावा और आपत्ति दर्ज कराने का अवसर दिया गया है।

‘जनप्रतिनिधियों के लिए विशेष प्रावधान का उल्लंघन’

चड्ढा ने चुनाव आयोग के SIR दिशानिर्देशों का हवाला देते हुए प्रक्रिया पर एक और सवाल उठाया है। उनका दावा है कि दिशानिर्देशों में सांसदों और अन्य जनप्रतिनिधियों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। उनके मुताबिक, अगर किसी जनप्रतिनिधि का नाम सत्यापन के दौरान संदिग्ध या फ्लैग किया जाता है, तब भी दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया पूरी होने तक उसका नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची में रहने की व्यवस्था है। चड्ढा का आरोप है कि वर्तमान सांसद होने के बावजूद उनके मामले में इस प्रावधान का पालन नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि वह अब चुनाव आयोग की तय प्रक्रिया के तहत अपना दावा पेश कर रहे हैं और नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए जरूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी करेंगे।

AAP ने आरोपों पर किया पलटवार

राघव चड्ढा के आरोपों पर आम आदमी पार्टी ने भी पलटवार किया है। पार्टी का कहना है कि SIR की प्रक्रिया भारत निर्वाचन आयोग के तहत होती है और मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का निर्णय चुनाव आयोग की प्रक्रिया के अनुसार किया जाता है। AAP ने दावा किया कि राघव चड्ढा वर्तमान में दिल्ली में रहते हैं और पंजाब में निवास नहीं कर रहे हैं। पार्टी के मुताबिक, ऐसी स्थिति में अपने मतदाता पंजीकरण को बनाए रखना या उसे दूसरे स्थान पर स्थानांतरित कराना संबंधित व्यक्ति की जिम्मेदारी है। AAP ने यह भी आरोप लगाया कि चड्ढा दिल्ली के राजेंद्र नगर से बैकडेट के जरिए अपना नाम मतदाता सूची में दर्ज कराने की कोशिश कर रहे हैं। पार्टी ने कहा कि अगर इस तरह की कोई गैरकानूनी प्रक्रिया अपनाई गई है तो इसकी जांच होनी चाहिए और तथ्य जनता के सामने आने चाहिए। हालांकि, बैकडेट से वोटर रजिस्ट्रेशन कराने का यह आरोप फिलहाल AAP के दावे के रूप में ही सामने आया है।

अप्रैल 2026 में BJP में शामिल हुए थे चड्ढा

राघव चड्ढा वर्ष 2022 में आम आदमी पार्टी के टिकट पर पंजाब से राज्यसभा सांसद चुने गए थे। इसके बाद अप्रैल 2026 में उन्होंने बीजेपी का दामन थाम लिया। उनके AAP छोड़ने के बाद से दोनों पक्षों के बीच राजनीतिक बयानबाजी लगातार देखने को मिली है। अब वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने का मुद्दा भी इसी राजनीतिक टकराव का नया केंद्र बन गया है।

12 सितंबर तक दर्ज करा सकते हैं दावा-आपत्ति

ड्राफ्ट मतदाता सूची में नाम नहीं होने वाले मतदाताओं के लिए दावा और आपत्ति दर्ज कराने की प्रक्रिया जारी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 12 सितंबर 2026 तक प्रभावित मतदाता फॉर्म-6 के जरिए अपना नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं। इसलिए राघव चड्ढा का नाम ड्राफ्ट सूची से हटना फिलहाल अंतिम फैसला नहीं है। दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनाव आयोग द्वारा अंतिम मतदाता सूची जारी की जाएगी, जिसके बाद स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी।


मोदी कैबिनेट में जल्द बड़ा फेरबदल? 2027-29 के चुनावी समीकरणों के बीच ‘टीम मोदी’ पर नजरें

by पूजा झा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में जल्द बड़े फेरबदल की अटकलों ने सियासी हलकों में चर्चा तेज कर दी है। बीजेपी संगठन में नई राष्ट्रीय टीम के गठन के बाद अब राजनीतिक नजरें केंद्र सरकार की संभावित नई टीम पर टिक गई हैं। हालांकि कैबिनेट फेरबदल को लेकर सरकार या बीजेपी की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। राजनीतिक चर्चाओं के मुताबिक, यदि मोदी कैबिनेट में बदलाव होता है तो यह सिर्फ खाली पद भरने या सामान्य विस्तार तक सीमित नहीं रह सकता। 2027 के विधानसभा चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए सरकार अपनी टीम में राजनीतिक, सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश कर सकती है।
परफॉर्मेंस, युवा चेहरे और महिला प्रतिनिधित्व पर जोर?

संभावित कैबिनेट फेरबदल में मंत्रियों के प्रदर्शन के साथ युवा नेतृत्व, महिला प्रतिनिधित्व, क्षेत्रीय संतुलन और एनडीए के सहयोगी दलों को अहमियत मिलने की चर्चा है। बीजेपी संगठन में हालिया बदलावों के बाद यह कयास लगाए जा रहे हैं कि सरकार में भी नए चेहरों को मौका मिल सकता है। फिलहाल केंद्रीय मंत्रिपरिषद में नए सदस्यों को शामिल करने की संवैधानिक गुंजाइश मौजूद है। संविधान के अनुच्छेद 75(1A) के तहत मंत्रिपरिषद के सदस्यों की संख्या लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। ऐसे में संभावित फेरबदल के दौरान नए चेहरों की एंट्री के साथ विभागों का पुनर्वितरण भी हो सकता है।

बीजेपी की नई टीम के बाद बढ़ी अटकलें

बीजेपी की नई राष्ट्रीय टीम के ऐलान के बाद कैबिनेट फेरबदल की चर्चाओं को और हवा मिली है। पार्टी ने संगठन में कई नए चेहरों को जिम्मेदारियां दी हैं, जबकि कुछ वरिष्ठ नेताओं को भी अहम पद सौंपे गए हैं। संगठन में बदलाव का फोकस युवा नेतृत्व, महिलाओं, सामाजिक प्रतिनिधित्व और क्षेत्रीय संतुलन पर दिखाई देता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर कैबिनेट में बदलाव होता है तो सरकार भी इसी तरह के संतुलन पर ध्यान दे सकती है। बीजेपी ने अपने डिजिटल और सोशल मीडिया ढांचे में भी बदलाव किए हैं। पार्टी की ऑनलाइन रणनीति और संगठनात्मक ढांचे को आने वाले चुनावों के मद्देनजर मजबूत करने की कवायद के तौर पर इन बदलावों को देखा जा रहा है।

सहयोगी दलों को मिल सकती है ज्यादा हिस्सेदारी

संभावित कैबिनेट विस्तार में एनडीए के सहयोगी दलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। खासकर महाराष्ट्र और अन्य चुनावी रूप से अहम राज्यों के राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चाएं तेज हैं। महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव को देखते हुए केंद्र में सहयोगी दलों की हिस्सेदारी बढ़ने की संभावना पर भी चर्चा हो रही है। श्रीकांत शिंदे समेत कुछ नेताओं के नाम संभावित चेहरों के रूप में राजनीतिक गलियारों में सामने आए हैं, हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। पंजाब भी बीजेपी की आगामी चुनावी रणनीति में अहम माना जा रहा है। राज्य में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी अपने संगठन और राजनीतिक समीकरणों को मजबूत करने में जुटी हुई है।

उम्र, प्रदर्शन और राज्यों का प्रतिनिधित्व भी अहम

संभावित फेरबदल में मंत्रियों का प्रदर्शन एक प्रमुख पैमाना हो सकता है। इसके साथ ही बीजेपी लगातार युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने पर जोर देती रही है। ऐसे में अनुभवी और युवा नेताओं के बीच संतुलन साधने की कोशिश की जा सकती है। उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे चुनावी रूप से महत्वपूर्ण राज्यों के प्रतिनिधित्व पर भी नजर रहेगी। आने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों के आधार पर नए चेहरों का चयन किया जा सकता है।

कई मंत्रियों के पास हैं अतिरिक्त विभाग

केंद्रीय मंत्रिमंडल में कई वरिष्ठ मंत्री एक से अधिक विभागों या अतिरिक्त प्रभार की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। ऐसे में यदि कैबिनेट में नए मंत्रियों को शामिल किया जाता है तो कुछ मंत्रालयों का पुनर्वितरण भी संभव है। इससे सरकार पर अतिरिक्त जिम्मेदारियों का दबाव कम करने के साथ प्रशासनिक कामकाज को अधिक प्रभावी बनाने की कोशिश की जा सकती है।

इस्तीफों और खाली पदों से भी बदल सकता है समीकरण

हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों और मंत्रिपरिषद में हुए बदलावों के बाद कैबिनेट विस्तार की संभावनाओं पर चर्चा तेज है। यदि सरकार नए चेहरों को शामिल करने का फैसला करती है तो खाली पदों को भरने के साथ-साथ विभागों की जिम्मेदारियों में भी बदलाव देखने को मिल सकता है। कुल मिलाकर, बीजेपी संगठन में व्यापक बदलाव के बाद अब सबकी नजरें मोदी सरकार की अगली रणनीति पर हैं। अगर कैबिनेट फेरबदल होता है तो यह केवल नए मंत्रियों की एंट्री या विभागों की अदला-बदली तक सीमित नहीं रहेगा। इसके जरिए बीजेपी 2027 के विधानसभा चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले राजनीतिक, सामाजिक, क्षेत्रीय और गठबंधन समीकरणों को मजबूत करने की कोशिश कर सकती है। 


राजनीति नहीं छोड़ रहे नितिन गडकरी, ‘नई पीढ़ी को जिम्मेदारी’ वाले बयान पर कार्यालय ने दी सफाई

by पूजा झा

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के एक बयान को लेकर राजनीतिक गलियारों में चल रही अटकलों पर अब उनके कार्यालय ने स्थिति साफ कर दी है। गडकरी ने हाल ही में नागपुर के एक कार्यक्रम में कहा था कि वह अब पहले की तरह ज्यादा काम नहीं कर पाते और अब नई पीढ़ी को जिम्मेदारी सौंपने का समय आ गया है। उनके इस बयान के बाद राजनीति से दूरी बनाने को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे थे। हालांकि, नितिन गडकरी के कार्यालय ने स्पष्ट किया है कि उनके बयान का राजनीति से कोई संबंध नहीं था। यह टिप्पणी लक्ष्मणराव मानकर ट्रस्ट के कामकाज और उसके भविष्य के नेतृत्व के संदर्भ में की गई थी।

ट्रस्ट के कामकाज के संदर्भ में दिया था बयान

गडकरी कार्यालय के मुताबिक, केंद्रीय मंत्री नागपुर में एक कार्यक्रम के दौरान लक्ष्मणराव मानकर ट्रस्ट को लेकर बात कर रहे थे। यह संगठन आदिवासी क्षेत्रों में एकल विद्यालयों समेत विभिन्न सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से काम करता है। कार्यालय ने बताया कि गडकरी ने इसी ट्रस्ट के कामकाज के संदर्भ में कहा था कि वह अब पहले की तरह इसके लिए ज्यादा समय और काम नहीं कर पाते हैं। इसलिए नई पीढ़ी को जिम्मेदारी संभालने और संगठन के काम को आगे बढ़ाने का अवसर मिलना चाहिए। स्पष्टीकरण में कहा गया कि गडकरी की टिप्पणी को राजनीतिक संदर्भ में देखना सही नहीं है और उनके बयान का राजनीति छोड़ने या सक्रिय राजनीति से अलग होने से कोई संबंध नहीं है।

विकास और आदिवासी इलाकों को लेकर भी रखी बात

नागपुर के कार्यक्रम में नितिन गडकरी ने विकास कार्यों और आदिवासी क्षेत्रों की बुनियादी सुविधाओं को लेकर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में विकास का दायरा और बढ़ेगा। गडकरी ने महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों के विकास पर जोर देते हुए कहा कि उनका लक्ष्य है कि राज्य का कोई भी आदिवासी गांव बिजली जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित न रहे। उन्होंने राज्य में विकास कार्यों को जमीनी स्तर पर और मजबूत करने की जरूरत पर भी जोर दिया।

क्यों शुरू हुई राजनीति छोड़ने की चर्चा?

दरअसल, गडकरी का यह बयान ऐसे समय सामने आया जब बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन में बड़े बदलाव की चर्चा चल रही थी। हाल ही में पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम का ऐलान हुआ, जिसमें कई नए चेहरों को जिम्मेदारी दी गई। बीजेपी संगठन में बदलाव के बाद केंद्र सरकार में भी संभावित कैबिनेट फेरबदल को लेकर राजनीतिक अटकलें तेज थीं। इसी माहौल में गडकरी के ‘नई पीढ़ी को जिम्मेदारी’ वाले बयान को भी राजनीति से जोड़कर देखा जाने लगा। हालांकि, अब नितिन गडकरी के कार्यालय की ओर से साफ कर दिया गया है कि उनका बयान किसी राजनीतिक भूमिका या भविष्य को लेकर नहीं था। यह पूरी तरह लक्ष्मणराव मानकर ट्रस्ट के संचालन और उसके भविष्य के नेतृत्व से जुड़ी टिप्पणी थी। गडकरी कार्यालय की सफाई के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि केंद्रीय मंत्री के राजनीति छोड़ने से जुड़े कयासों का उनके बयान के वास्तविक संदर्भ से कोई संबंध नहीं है।


‘दिल्ली में काम कराने के लिए धक्के खा रहे सांसद-विधायक’, विजय गोयल ने अपनी ही सरकार पर उठाए सवाल

by पूजा झा

बीजेपी नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद विजय गोयल ने दिल्ली की प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर अपनी ही सरकार पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने राजधानी में सफाई, सड़क, सीवर, बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी समस्याओं को लेकर अधिकारियों की कार्यशैली पर नाराजगी जताई। गोयल ने कहा कि जनता की समस्याओं का समाधान कराने के लिए चुने हुए प्रतिनिधियों को ही अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।

‘अधिकारी काम नहीं कर रहे, नेता चक्कर काट रहे’

विजय गोयल ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए दिल्ली सरकार और एमसीडी के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि अधिकारी काम नहीं कर रहे, जबकि सांसद, विधायक और पार्षद अपने क्षेत्रों में काम कराने के लिए गलियों और सड़कों के चक्कर काट रहे हैं। गोयल ने कहा कि किसी इलाके से कूड़ा उठवा देना भी बड़ी उपलब्धि जैसा माना जा रहा है, जबकि सवाल यह होना चाहिए कि अधिकारियों की मौजूदगी में वहां कूड़ा जमा ही क्यों होने दिया गया। उन्होंने कहा कि नाली, सड़क, सीवर, बिजली और पानी जैसी समस्याओं को लेकर चुने हुए जनप्रतिनिधियों को अधिकारियों से बार-बार अनुरोध करना पड़ता है। इसके बावजूद कई जगहों पर काम नहीं हो पा रहा है। ऐसे में उन्होंने सवाल उठाया कि जब जनप्रतिनिधियों की समस्याएं नहीं सुनी जा रहीं तो आम जनता की कौन सुनेगा?

रेखा गुप्ता ने कहा- दिल्ली अब सक्षम हाथों में

विजय गोयल की टिप्पणी के बीच मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने दिल्ली सरकार की ओर से बुनियादी सुविधाओं को बेहतर करने के लिए किए जा रहे प्रयासों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि दिल्ली अब सक्षम हाथों में है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व तथा केंद्र सरकार के सहयोग से राजधानी की वर्षों पुरानी समस्याओं के समाधान के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम किया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने खास तौर पर पानी और सीवेज की समस्या का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दिल्ली में लंबे समय से पानी की आपूर्ति और सीवर व्यवस्था बड़ी चुनौती रही है। उनके मुताबिक, राजधानी का लगभग आधा हिस्सा पानी के कनेक्शन से वंचित रहा है, जबकि कई इलाकों में लोगों को दशकों पुरानी सीवर लाइनों की समस्या का सामना करना पड़ा।

2,500 करोड़ रुपये के कर्ज का जिक्र

रेखा गुप्ता ने बताया कि इन समस्याओं के समाधान के लिए केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने 2,500 करोड़ रुपये का ऋण मंजूर किया है। इस राशि के तहत दिल्ली जल बोर्ड ने वजीराबाद वाटर ट्रीटमेंट प्लांट (WTP) में जलापूर्ति सुधार परियोजना के ‘पैकेज-1’ के लिए 805 करोड़ रुपये के कार्यों को मंजूरी दी है। इस तरह एक ओर विजय गोयल ने जमीनी स्तर पर अधिकारियों की कार्यप्रणाली और बुनियादी सुविधाओं को लेकर नाराजगी जताई है, वहीं मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता सरकार की ओर से पानी और सीवेज जैसी पुरानी समस्याओं के समाधान के लिए उठाए जा रहे कदमों को सामने रख रही हैं। दोनों बयानों के बीच दिल्ली की प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है।


घुसपैठ रोकने के लिए एजेंसियां उठाएं कड़े कदम, अमित शाह ने दिए निर्देश; AI से खुफिया सूचनाओं के विश्लेषण पर जोर

by पूजा झा

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देश में घुसपैठ और अन्य राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए सुरक्षा एजेंसियों को कड़े और प्रभावी कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। नई दिल्ली में आयोजित नौवें राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति सम्मेलन-2026 का उद्घाटन करते हुए उन्होंने खुफिया सूचनाओं के बेहतर इस्तेमाल और तकनीक के जरिए सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया। अमित शाह ने कहा कि विभिन्न राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए मानक संचालन प्रक्रियाएं (SOP) तैयार करने में मल्टी एजेंसी सेंटर (MAC) के प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सूचनाओं का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित विश्लेषण किया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य अलग-अलग एजेंसियों के बीच सूचनाओं के बेहतर समन्वय और समय पर कार्रवाई को सुनिश्चित करना है।

आतंकवाद और कट्टरपंथ से निपटने पर फोकस

गृह मंत्री ने आतंकवाद और कट्टरपंथ के खिलाफ कार्रवाई को और प्रभावी बनाने पर भी जोर दिया। उन्होंने गृह मंत्रालय की ‘प्रहार’ योजना को प्रभावी ढंग से लागू करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने भगोड़ों को देश वापस लाने, अनुपस्थिति में सुनवाई से जुड़े कानूनी प्रावधानों का इस्तेमाल करने और लंबित मामलों में मुकदमों की प्रक्रिया तेज करने पर बल दिया। साथ ही, गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के मामलों की जांच में व्यापक और एकीकृत दृष्टिकोण अपनाने की बात कही।

सम्मेलन में इन मुद्दों पर हुई चर्चा

राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति सम्मेलन के पहले दिन आतंकवाद से जुड़ी चुनौतियों समेत कई अहम मुद्दों पर मंथन हुआ। इनमें मल्टी एजेंसी सेंटर के जरिए खुफिया सूचनाओं के एकीकरण, विश्लेषण और ऑपरेशनल इस्तेमाल पर विशेष चर्चा हुई। इसके अलावा मादक पदार्थों की तस्करी पर नियंत्रण के लिए रणनीतिक दस्तावेज तैयार करने, अवैध प्रवासियों की पहचान और निर्वासन, साइबर अपराध से निपटने के लिए नीति तैयार करने तथा पाकिस्तान की ओर से किए जा रहे परोक्ष युद्ध से उत्पन्न सुरक्षा चुनौतियों पर भी विचार-विमर्श किया गया। सम्मेलन के उद्घाटन से पहले अमित शाह ने शहीद स्तंभ पर पुष्पांजलि अर्पित की। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की अखंडता की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान देने वाले खुफिया ब्यूरो के बहादुर कर्मियों को श्रद्धांजलि दी। 

850 से ज्यादा प्रतिभागी ले रहे हिस्सा

दो दिवसीय राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति सम्मेलन हाइब्रिड प्रारूप में आयोजित किया जा रहा है। इसमें देशभर से 850 से अधिक प्रतिभागी शामिल हो रहे हैं। दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में गृह राज्य मंत्री, केंद्रीय गृह सचिव, उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के प्रमुख और केंद्रीय पुलिस संगठनों के प्रमुख मौजूद रहे। वहीं राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस महानिदेशक, जमीनी स्तर पर काम करने वाले युवा पुलिस अधिकारी और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सम्मेलन से जुड़े।

दूसरे दिन इन चुनौतियों पर मंथन

सम्मेलन के दूसरे दिन हवाई प्रणालियों से उत्पन्न संभावित खतरों और उनसे निपटने के उपायों पर चर्चा होगी। इसके अलावा समुद्री अर्थव्यवस्था की सुरक्षा, सूचना युद्ध और राष्ट्रीय सुरक्षा पर उसके प्रभाव तथा जैव सुरक्षा ढांचे की जरूरत जैसे मुद्दे भी चर्चा के केंद्र में रहेंगे। यह सम्मेलन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देशों के अनुरूप राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी प्रमुख चुनौतियों के व्यावहारिक समाधान तलाशने के उद्देश्य से आयोजित किया जा रहा है। इसमें जमीनी स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों के अनुभव और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों की विशेषज्ञता को साथ लाकर सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने पर जोर दिया जाता है। राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति सम्मेलन का आयोजन वर्ष 2021 से हर साल हाइब्रिड प्रारूप में किया जा रहा है।


'असंवैधानिक और खतरनाक है वन नेशन, वन इलेक्शन बिल', JPC के सामने पी. चिदंबरम का तीखा विरोध

by पूजा झा

नई दिल्ली: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने संसद की संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के सामने 'वन नेशन, वन इलेक्शन' यानी एक राष्ट्र, एक चुनाव के प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया है। चिदंबरम ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने से जुड़े विधेयकों को असंवैधानिक बताते हुए इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर मुद्दा करार दिया। सूत्रों के मुताबिक, पी. चिदंबरम ने संसद की संयुक्त समिति के सामने संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 पर अपनी राय रखी। इन विधेयकों का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराने की व्यवस्था तैयार करना है।

चिदंबरम ने क्यों जताई आपत्ति?

पी. चिदंबरम का तर्क है कि देश में निर्वाचित लोकसभा और विधानसभाओं को जनता पांच साल के कार्यकाल के लिए चुनती है। ऐसे में किसी चुनावी व्यवस्था को एक साथ लाने के लिए अगर किसी सरकार या विधानसभा का कार्यकाल बीच में कम किया जाता है तो यह संविधान के मूल सिद्धांतों से जुड़ा गंभीर सवाल खड़ा करता है। उन्होंने समिति के सामने कहा कि एक साथ चुनाव कराने का प्रस्ताव बेहद जटिल है और इसे लागू करने के लिए निर्वाचित संस्थाओं के कार्यकाल में बदलाव करना पड़ सकता है। चिदंबरम ने इसे पूरी तरह असंवैधानिक बताते हुए इस प्रस्ताव का विरोध किया।

'अंतरात्मा समर्थन की इजाजत नहीं देती'

कांग्रेस नेता ने समिति से कहा कि उनकी अंतरात्मा उन्हें इन विधेयकों का समर्थन करने की अनुमति नहीं देती। उन्होंने सरकार की संसदीय स्थिति पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इस तरह के बड़े संवैधानिक बदलाव के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। चिदंबरम का मानना है कि इतने बड़े चुनावी और संवैधानिक बदलाव को केवल चुनावी सुविधा या प्रशासनिक तर्क के आधार पर नहीं देखा जा सकता। इसका असर देश के संघीय ढांचे, राज्यों की स्वायत्तता और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर पड़ सकता है।

सागरिका घोष ने भी किया विरोध

संयुक्त संसदीय समिति की सदस्य और तृणमूल कांग्रेस की सांसद सागरिका घोष ने भी 'वन नेशन, वन इलेक्शन' से जुड़े विधेयकों पर आपत्ति जताई। उन्होंने आशंका जताई कि प्रस्तावित कानून चुनाव आयोग की शक्तियों को जरूरत से ज्यादा बढ़ा सकता है। विपक्षी दलों का कहना है कि विधेयक के हर प्रावधान की गहराई से जांच की जानी चाहिए, क्योंकि इसका असर सिर्फ चुनाव की तारीखों पर नहीं बल्कि राज्यों की निर्वाचित सरकारों और देश के संघीय ढांचे पर भी पड़ सकता है।

JPC के सामने समर्थन और विरोध दोनों

बीजेपी सांसद पी.पी. चौधरी की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय समिति इस मुद्दे पर विभिन्न पक्षों की राय ले रही है। समिति के सामने तरलोचन सिंह, नवीन खन्ना, मीनाक्षी जैन और नीरू कुमार समेत करीब 10 पद्म पुरस्कार विजेताओं के एक समूह ने भी अपनी राय रखी। सुनवाई के दौरान कुछ लोगों ने एक साथ चुनाव कराने के प्रस्ताव का समर्थन किया। समर्थकों का तर्क है कि इससे बार-बार होने वाले चुनावों पर होने वाला खर्च कम हो सकता है और सरकारी मशीनरी को लगातार चुनावी प्रक्रिया में व्यस्त रहने से राहत मिल सकती है। वहीं विरोध करने वालों ने इसे व्यावहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण बताया। उनका कहना है कि अगर किसी राज्य सरकार का कार्यकाल समय से पहले समाप्त होता है या विधानसभा भंग हो जाती है तो पूरे चुनावी चक्र को एक साथ बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।

भारत में पहले एक साथ होते थे चुनाव

भारत में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव पहले एक साथ कराए जाते थे। 1951 से 1967 के बीच देश में एक साथ चुनाव की व्यवस्था रही। हालांकि, बाद के वर्षों में कुछ राज्य विधानसभाओं के समय से पहले भंग होने और राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव के कारण यह चुनावी चक्र टूट गया। इसके बाद से लोकसभा और अलग-अलग राज्यों के विधानसभा चुनाव अलग-अलग समय पर होने लगे।


'एक राष्ट्र, एक चुनाव' से जुड़े विधेयकों को दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश किया गया था। इसके बाद इन्हें विस्तृत जांच और सुझावों के लिए संसद की संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया गया। ये विधेयक पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार किए गए थे।
फिलहाल 'वन नेशन, वन इलेक्शन' को लेकर राजनीतिक और संवैधानिक बहस तेज है। एक पक्ष इसे चुनावी खर्च कम करने और प्रशासनिक व्यवस्था को बेहतर बनाने वाला बड़ा सुधार बता रहा है, जबकि विपक्ष इसे संविधान और संघीय ढांचे के लिए चुनौती मान रहा है। अब सबकी नजर JPC की रिपोर्ट और उसके बाद सरकार के अगले कदम पर टिकी है। क्योंकि 'वन नेशन, वन इलेक्शन' सिर्फ चुनाव एक साथ कराने का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था, राज्यों के अधिकार और संविधान के ढांचे से जुड़ी एक बड़ी बहस बन चुका है।


दिल्ली में BJP की नई टीम की पहली बैठक शुरू, ‘Modi@25’ से चुनावी रणनीति तक होगा मंथन

by पूजा झा

नई दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राष्ट्रीय मुख्यालय में शनिवार को पार्टी के संगठन से जुड़ी अहम बैठकों का दौर शुरू हो गया है। पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन की अध्यक्षता में हो रही इन बैठकों में नवनियुक्त राष्ट्रीय पदाधिकारियों के साथ प्रदेश अध्यक्ष, संगठन महामंत्री और प्रदेश प्रभारियों के शामिल होने की जानकारी है। बैठक का एक प्रमुख एजेंडा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने पर प्रस्तावित ‘Modi@25’ अभियान की देशव्यापी रूपरेखा तैयार करना है। यह बैठक 17 अगस्त को घोषित BJP की नई राष्ट्रीय टीम के गठन के बाद पहली महत्वपूर्ण संगठनात्मक बैठक है। नई टीम में वरिष्ठ नेताओं के साथ कई नए चेहरों को भी जिम्मेदारी दी गई है। बैठक के शुरुआती सत्र में नए राष्ट्रीय पदाधिकारियों का परिचय और संगठन की प्राथमिकताओं पर चर्चा होने की संभावना है। साथ ही पार्टी के राज्यों में संगठन को मजबूत करने और आगामी चुनावों की तैयारियों को लेकर भी विचार-विमर्श किया जा सकता है।

‘Modi@25’ अभियान पर खास फोकस

बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 साल पूरे होने के मौके पर BJP की ओर से चलाए जाने वाले राष्ट्रव्यापी कार्यक्रमों की योजना पर विशेष चर्चा होगी। पार्टी ने इस अभियान को ‘सेवा संकल्प महोत्सव’ के रूप में बड़े स्तर पर आयोजित करने की तैयारी की है। इस अभियान के तहत सेवा और जनसंपर्क से जुड़े कार्यक्रमों के अलावा स्वच्छता अभियान, रक्तदान शिविर, पौधरोपण, स्वास्थ्य शिविर, डिजिटल और फोटो प्रदर्शनियों तथा विभिन्न सामाजिक वर्गों के साथ संवाद जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाने की योजना है। पार्टी इन गतिविधियों के जरिए प्रधानमंत्री मोदी के लंबे राजनीतिक सफर और सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाने की रणनीति पर काम कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अक्टूबर 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में संवैधानिक पद संभाला था। 7 अक्टूबर 2026 को इस सफर के 25 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। BJP इसी अवसर को देशभर में बड़े अभियान के रूप में मनाने की तैयारी कर रही है।

नई टीम के साथ संगठन को धार देने की तैयारी

BJP अध्यक्ष नितिन नबीन ने 17 अगस्त को पार्टी की नई राष्ट्रीय टीम की घोषणा की थी। इसमें 13 राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, 8 राष्ट्रीय महामंत्री और 16 राष्ट्रीय सचिव समेत कई संगठनात्मक नियुक्तियां की गई हैं। नई टीम में वसुंधरा राजे सिंधिया, राम माधव, बैजयंत पांडा और तीरथ सिंह रावत जैसे वरिष्ठ नेताओं को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है। वहीं, स्मृति ईरानी, विनोद तावड़े, सुनील बंसल, सतीश पूनिया और बिप्लब कुमार देब समेत कई नेताओं को राष्ट्रीय महामंत्री बनाया गया है। बीएल संतोष राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) के पद पर बने हुए हैं, जबकि पीयूष गोयल को राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी दोबारा दी गई है। 

चुनावी तैयारियों पर भी नजर

नई राष्ट्रीय टीम के गठन के बाद होने वाली यह बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि BJP आने वाले विधानसभा चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए संगठन को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। पार्टी के सामने राज्यों में संगठनात्मक समन्वय बढ़ाने, बूथ स्तर तक पहुंच मजबूत करने और केंद्र की योजनाओं को जनता तक पहुंचाने की चुनौती है। बैठकों में केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर तालमेल, संगठन के विस्तार और आगामी चुनावी रणनीति पर भी चर्चा होने की संभावना है। BJP की नई टीम में अनुभव और युवा नेतृत्व के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की गई है, ऐसे में आज की बैठक को आने वाले महीनों के संगठनात्मक एजेंडे की दिशा तय करने के लिहाज से अहम माना जा रहा है। 

फिलहाल BJP का मुख्य फोकस ‘Modi@25’ अभियान की तैयारियों को अंतिम रूप देने और नई राष्ट्रीय टीम को संगठनात्मक जिम्मेदारियों के साथ सक्रिय करने पर है। आने वाले दिनों में इन बैठकों में तय रणनीति के आधार पर राज्यों में कार्यक्रमों और जनसंपर्क अभियानों को आगे बढ़ाया जाएगा।


‘इस बार आंदोलन करें तो सलवार पहनकर आएं’, बृजभूषण शरण सिंह का बाबा रामदेव पर तंज

by पूजा झा

कैसरगंज से पूर्व सांसद और भारतीय जनता पार्टी (BJP) नेता बृजभूषण शरण सिंह ने योग गुरु बाबा रामदेव की आंदोलन की चेतावनी पर तीखा पलटवार किया है। उन्होंने बाबा रामदेव की पिछली गतिविधियों का जिक्र करते हुए उन पर कटाक्ष किया और कहा कि अगर उन्हें आंदोलन करना है तो मैदान में आकर अपनी क्षमता दिखानी चाहिए। एक कार्यक्रम में शामिल होने के बाद पत्रकारों से बातचीत के दौरान बृजभूषण शरण सिंह से बाबा रामदेव के उस बयान को लेकर सवाल किया गया, जिसमें उन्होंने देश में भ्रष्टाचार और सरकारी भर्तियों में कथित अनियमितताओं के खिलाफ आंदोलन की चेतावनी दी थी। इस पर बृजभूषण ने बाबा रामदेव की आंदोलन करने की क्षमता पर सवाल उठाया। बृजभूषण शरण सिंह ने तंज कसते हुए कहा कि बाबा रामदेव कभी स्वदेशी की बात करते थे, लेकिन अब विदेशी उत्पादों का इस्तेमाल और कारोबार करते हैं। उन्होंने कहा कि रामदेव की बातों को लोग कितनी गंभीरता से लेते हैं, यह भी देखने वाली बात है। इसी दौरान उन्होंने रामदेव के पुराने आंदोलन से जुड़े एक प्रसंग का जिक्र करते हुए कहा कि पिछली बार वह सलवार पहनकर भाग गए थे।

पतंजलि-महर्षि पतंजलि की जन्मस्थली को लेकर भी विवाद

बृजभूषण शरण सिंह और बाबा रामदेव के बीच लंबे समय से जुबानी विवाद देखने को मिलता रहा है। दोनों कई मौकों पर एक-दूसरे के बयानों पर प्रतिक्रिया दे चुके हैं। यह विवाद महर्षि पतंजलि की जन्मस्थली को लेकर भी सामने आया है। बृजभूषण शरण सिंह कई बार आरोप लगा चुके हैं कि बाबा रामदेव महर्षि पतंजलि के नाम का इस्तेमाल कर बड़ा कारोबार करते हैं, लेकिन महर्षि पतंजलि की कथित जन्मस्थली गोंडा के विकास और वहां की सुविधाओं को लेकर पर्याप्त काम नहीं किया गया। हालांकि, ये बृजभूषण शरण सिंह के आरोप हैं और इन पर बाबा रामदेव की ओर से अलग-अलग मौकों पर प्रतिक्रिया सामने आती रही है।

बाबा रामदेव ने क्यों दी थी आंदोलन की चेतावनी?

दरअसल, हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान बाबा रामदेव ने देश में भ्रष्टाचार और सरकारी व्यवस्था में कथित अनियमितताओं को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने स्कूल-कॉलेजों में बिजली-पानी और किताबों जैसी समस्याओं का जिक्र किया। इसके साथ ही उन्होंने सरकारी नौकरियों में भर्ती प्रक्रिया और इंटरव्यू को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए। रामदेव ने दावा किया था कि कई जगहों पर इंटरव्यू के दौरान कथित तौर पर भ्रष्टाचार और पक्षपात होता है तथा योग्य उम्मीदवारों के बजाय अपने संगठन, जाति या वर्ग से जुड़े लोगों को प्राथमिकता दिए जाने की शिकायतें सामने आती हैं। उन्होंने कहा था कि ऐसी व्यवस्था न्याय के खिलाफ है। बाबा रामदेव ने यह भी कहा था कि वह आंदोलन या अराजकता के समर्थक नहीं हैं, लेकिन अगर देश में भ्रष्टाचार और घपले की स्थिति नहीं सुधरी तो उन्हें आंदोलन के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

बयानों से गरमाई सियासत

बाबा रामदेव की इस चेतावनी के बाद बृजभूषण शरण सिंह की टिप्पणी सामने आई है। उनके बयान ने दोनों के बीच पहले से चले आ रहे विवाद को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। फिलहाल, इस मुद्दे पर बाबा रामदेव की ओर से बृजभूषण के ताजा बयान पर कोई नई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। बृजभूषण शरण सिंह और बाबा रामदेव के बीच सार्वजनिक मंचों पर होने वाली बयानबाजी पहले भी राजनीतिक और सामाजिक चर्चाओं का विषय रही है। ऐसे में बृजभूषण का यह ताजा बयान आने वाले दिनों में एक बार फिर विवाद को हवा दे सकता है।


राहुल गांधी के धरने के बाद मानी दिल्ली पुलिस! पेलेट गन मामले में FIR दर्ज

by पूजा झा

नई दिल्ली: पेलेट गन से घायल छात्र साहिल लोचब के मामले में शुक्रवार को दिल्ली में सियासी हलचल तेज हो गई। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने साहिल के साथ संसद मार्ग पुलिस स्टेशन के बाहर धरना दिया और FIR दर्ज होने तक वहां से नहीं हटने की बात कही। इसके बाद सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने साहिल लोचब की शिकायत पर पेलेट गन से चोट लगने के मामले में FIR दर्ज कर ली है। यह मामला 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शन से जुड़ा है। प्रदर्शन के दौरान साहिल लोचब के पेलेट गन से घायल होने का आरोप लगाया गया था। साहिल का दावा है कि पुलिस कार्रवाई के दौरान उसे पेलेट लगे, जिसके बाद उसे इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, उसके शरीर में 200 से ज्यादा छर्रे लगे थे और उसकी एक आंख की रोशनी भी प्रभावित हुई है।

FIR की मांग को लेकर थाने पहुंचे राहुल गांधी

राहुल गांधी शुक्रवार को घायल छात्र साहिल लोचब और उसके परिवार के साथ पहले पुलिस अधिकारियों से मिलने पहुंचे। इसके बाद वह संसद मार्ग पुलिस स्टेशन पहुंचे। कांग्रेस का आरोप था कि साहिल की ओर से शिकायत दिए जाने के बावजूद पुलिस FIR दर्ज नहीं कर रही थी। राहुल गांधी ने पुलिस अधिकारियों से मुलाकात के बाद थाने के बाहर धरना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि जब तक FIR दर्ज नहीं होती, वह वहां से नहीं हटेंगे। इस दौरान कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा समेत कई कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता भी मौके पर पहुंच गए। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि साहिल की शिकायत पर कार्रवाई नहीं की जा रही थी और पुलिस अधिकारियों की ओर से ऊपर से आदेश होने की बात कही गई। उन्होंने कहा कि उनकी मांग केवल FIR दर्ज कराने और मामले में जांच अधिकारी नियुक्त किए जाने की है।

14 अगस्त को दी गई थी शिकायत

कांग्रेस के मुताबिक, साहिल लोचब ने 14 अगस्त को अपने वकीलों के माध्यम से पुलिस को लिखित शिकायत दी थी। पार्टी का आरोप था कि शिकायत के बाद भी उसे FIR या जांच से जुड़ा नंबर और उचित जानकारी नहीं दी गई। 17 अगस्त को भी ईमेल और फोन के जरिए मामले को आगे बढ़ाने की कोशिश की गई, लेकिन कथित तौर पर कोई स्पष्ट कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद राहुल गांधी खुद साहिल के साथ पुलिस अधिकारियों से मिलने पहुंचे। मामला तब और गरमा गया जब FIR की मांग को लेकर राहुल गांधी थाने के बाहर धरने पर बैठ गए।

दिल्ली पुलिस ने क्या कहा?

मामले में दिल्ली पुलिस का पक्ष भी सामने आया है। पुलिस के मुताबिक, 20 जुलाई के प्रदर्शन से जुड़े मामलों की जांच पहले से क्राइम ब्रांच कर रही है और साहिल की शिकायत को भी आगे की जांच के लिए क्राइम ब्रांच को भेजा जाना है। पुलिस ने पेलेट गन चलाने के आरोपों से पहले भी इनकार किया है। यानी FIR दर्ज होने के बाद अब जांच का दायरा महत्वपूर्ण हो गया है। जांच में यह पता लगाने की कोशिश होगी कि साहिल को लगी चोटें किन परिस्थितियों में हुईं और प्रदर्शन के दौरान पेलेट गन का इस्तेमाल किसने किया।

पेलेट गन विवाद पर पहले से घमासान

20 जुलाई के प्रदर्शन के बाद से ही पेलेट गन के इस्तेमाल को लेकर सरकार, पुलिस और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। कांग्रेस का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों पर जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया गया और पेलेट गन का इस्तेमाल किया गया। वहीं दिल्ली पुलिस इस आरोप से इनकार करती रही है। इस पूरे मामले की जांच को लेकर उच्चस्तरीय जांच प्रक्रिया भी चल रही है। ऐसे में साहिल लोचब की शिकायत पर FIR दर्ज होना मामले की कानूनी जांच की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। राहुल गांधी ने धरने के दौरान साफ कहा था कि वह छात्रों के साथ खड़े हैं और मामले में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। अब FIR दर्ज होने के बाद सबकी नजर जांच की अगली कार्रवाई और इस बात पर होगी कि जांच एजेंसियां पेलेट गन के इस्तेमाल और साहिल की चोटों को लेकर क्या निष्कर्ष निकालती हैं।


पैलेट गन मामले में राहुल गांधी का थाने के बाहर धरना, FIR की मांग पर अड़े; प्रियंका समेत कई नेता पहुंचे

by पूजा झा

नई दिल्ली में शुक्रवार को उस वक्त सियासी हलचल बढ़ गई, जब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पैलेट गन से घायल हुए छात्र साहिल लोचब को साथ लेकर संसद मार्ग पुलिस स्टेशन पहुंचे। राहुल गांधी ने 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर पैलेट गन के इस्तेमाल के मामले में FIR दर्ज करने और कार्रवाई की मांग की। पुलिस अधिकारियों से मुलाकात के बाद राहुल गांधी थाने के बाहर ही धरने पर बैठ गए। राहुल गांधी का कहना है कि साहिल लोचब ने मामले में लिखित शिकायत दी थी, लेकिन अब तक FIR दर्ज नहीं की गई। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि छात्र पर पैलेट गन से हमला किया गया और इस मामले में जिम्मेदार लोगों की पहचान कर कार्रवाई होनी चाहिए। राहुल गांधी के साथ धरने पर साहिल और उनकी मां भी मौजूद रहीं। बाद में प्रियंका गांधी वाड्रा समेत कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता भी मौके पर पहुंचे।

DCP से मिलने पहुंचे राहुल गांधी

राहुल गांधी शुक्रवार को मामले की जांच से जुड़ी जानकारी लेने संसद मार्ग पुलिस स्टेशन पहुंचे। यहां उन्होंने पुलिस अधिकारियों से मुलाकात की और कथित पैलेट गन फायरिंग को लेकर कार्रवाई की मांग रखी। राहुल गांधी के थाने पहुंचने के बाद वहां कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं की भीड़ जुटने लगी। पुलिस स्टेशन के बाहर सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई गई और RAF की तैनाती भी की गई। पुलिस अधिकारियों से बातचीत के बाद राहुल गांधी बाहर आए और धरने पर बैठ गए। उनका कहना था कि जब तक मामले में FIR दर्ज नहीं होती, वह वहां से नहीं हटेंगे।

साहिल लोचब कौन हैं?

साहिल लोचब 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन में शामिल थे। प्रदर्शन के दौरान उन्हें कथित तौर पर पैलेट गन से चोट लगने की बात सामने आई थी। राहुल गांधी पहले भी इस मामले को लेकर सरकार और पुलिस पर सवाल उठा चुके हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक साहिल की एक आंख की रोशनी को भी नुकसान पहुंचने की बात सामने आई है। राहुल गांधी ने इस घटना को लेकर जवाबदेही तय करने और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

कांग्रेस ने अमित शाह और दिल्ली पुलिस से मांगा जवाब

कांग्रेस ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए सवाल उठाया कि प्रदर्शनकारियों पर कथित तौर पर पैलेट गन का इस्तेमाल करने का आदेश किसने दिया। पार्टी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और दिल्ली पुलिस से इस मामले में जवाब मांगते हुए कहा कि छात्रों के साथ हुई कथित ज्यादती की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। राहुल गांधी ने भी इस मामले को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। उनका कहना है कि शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई गंभीर मामला है और इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

दिल्ली पुलिस का क्या कहना है?

इस पूरे मामले में दिल्ली पुलिस का पक्ष कांग्रेस के आरोपों से अलग है। पुलिस ने कथित पैलेट गन फायरिंग के आरोपों से इनकार किया है। पुलिस का कहना है कि पैलेट गन उसके हथियारों के जखीरे का हिस्सा नहीं है। वहीं, मामले से जुड़े आरोपों और शिकायत की जांच जारी है। पुलिस ने यह भी बताया है कि प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग से जुड़े आरोपों की जांच के लिए प्रक्रिया चल रही है। इससे पहले दिल्ली पुलिस ने दिल्ली हाई कोर्ट में कहा था कि 20 जुलाई की घटना को लेकर मिली शिकायत को स्वीकार किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट की हाई-पावर्ड कमेटी भी कर रही जांच

मामला सिर्फ पुलिस जांच तक सीमित नहीं है। 20 जुलाई के प्रदर्शन के दौरान पुलिस और सुरक्षा बलों पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की हाई-पावर्ड एक्सपर्ट कमेटी गठित किए जाने की बात सामने आई है। पुलिस की ओर से राहुल गांधी को इसी जांच प्रक्रिया और कमेटी की रिपोर्ट का इंतजार करने की बात बताई गई। यानी एक तरफ राहुल गांधी FIR दर्ज करने की मांग को लेकर थाने के बाहर धरने पर बैठे हैं, वहीं दूसरी तरफ पुलिस का कहना है कि मामले की जांच पहले से चल रही है और हाई-पावर्ड कमेटी भी पूरे घटनाक्रम की जांच कर रही है।

क्यों बढ़ा राजनीतिक विवाद?

20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर पहले से ही राजनीतिक विवाद चल रहा है। प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़प और कथित बल प्रयोग के आरोपों के बाद कांग्रेस ने केंद्र सरकार को घेरना शुरू किया था। अब राहुल गांधी के सीधे पुलिस स्टेशन पहुंचने और धरने पर बैठने से यह मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक केंद्र में आ गया है। उनके साथ प्रियंका गांधी और कई अन्य कांग्रेस नेताओं के पहुंचने के बाद थाने के बाहर सियासी माहौल और गर्म हो गया। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पुलिस इस शिकायत पर FIR दर्ज करेगी, या फिर हाई-पावर्ड कमेटी की जांच पूरी होने का इंतजार किया जाएगा? राहुल गांधी FIR की मांग पर अड़े हैं, जबकि पुलिस मामले की जांच जारी होने की बात कह रही है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह मुद्दा केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और विपक्ष के बीच एक बड़ा राजनीतिक टकराव बन सकता है।


धर्मेंद्र प्रधान फिर एक्टिव, Gen Z के बीच बढ़ी मौजूदगी, सियासी कमबैक की तैयारी?

by पूजा झा

केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफे के बाद धर्मेंद्र प्रधान एक बार फिर सार्वजनिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय नजर आ रहे हैं। हाल के दिनों में उनकी सबसे ज्यादा चर्चा युवाओं और Gen Z के बीच उनकी बढ़ती मौजूदगी को लेकर हो रही है। विश्वविद्यालयों के कार्यक्रमों से लेकर राजनीतिक और सामाजिक आयोजनों तक उनकी सक्रियता ने सियासी हलकों में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या धर्मेंद्र प्रधान किसी नए राजनीतिक रोल या कमबैक की तैयारी कर रहे हैं? पेपर लीक और छात्रों के विरोध प्रदर्शनों के बीच धर्मेंद्र प्रधान ने 25 जुलाई को शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दिया था। इस्तीफे के बाद 9 अगस्त को वे ओडिशा की जीएम यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में पहुंचे। इसके बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी में छात्रों के बीच उनकी मौजूदगी देखी गई। इसके अलावा लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में भी धर्मेंद्र प्रधान शामिल हुए, जहां उनकी मुलाकात भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं से हुई। इन लगातार सार्वजनिक कार्यक्रमों ने उनकी राजनीतिक सक्रियता को लेकर चर्चा तेज कर दी है।

Gen Z को लेकर धर्मेंद्र प्रधान का बदला अंदाज

जीएम यूनिवर्सिटी के कार्यक्रम में धर्मेंद्र प्रधान ने खास तौर पर Gen Z और युवाओं की भूमिका पर बात की। उन्होंने माना कि नई पीढ़ी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और युवाओं की आकांक्षाओं को समझना जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से स्पष्ट रूप से कहा था कि देश के युवाओं के संकल्प और उम्मीदों के सामने शिक्षा मंत्री पद की जिम्मेदारियां बहुत छोटी हैं। धर्मेंद्र प्रधान का यह बयान इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि हाल के छात्र आंदोलनों में बड़ी संख्या में युवा और Gen Z वर्ग की भागीदारी देखने को मिली थी।

DU में छात्रों के बीच पहुंचे

गुरुवार को धर्मेंद्र प्रधान दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रों के बीच नजर आए। यहां उन्होंने छात्र श्रीकृष्णा रंजन पात्रा की किताब 'द भारत मॉडल: नेविगेटिंग द 21st सेंचुरी' का विमोचन किया। यह किताब 21वीं सदी में भारत के विकास और इसमें युवाओं की भूमिका पर केंद्रित है। धर्मेंद्र प्रधान ने कार्यक्रम की तस्वीरें सोशल मीडिया पर भी साझा कीं, जिसमें वे छात्रों के साथ बातचीत करते दिखाई दिए। इस पूरे घटनाक्रम में खास बात यह है कि शिक्षा मंत्री पद छोड़ने के बाद भी प्रधान का फोकस शिक्षा, युवा और Gen Z से जुड़े मुद्दों पर बना हुआ है।

क्या यह सिर्फ कार्यक्रम हैं या रणनीति?

धर्मेंद्र प्रधान की हालिया गतिविधियों में एक पैटर्न साफ दिखाई देता है। वे लगातार युवाओं के बीच पहुंच रहे हैं और सीधे संवाद पर जोर दे रहे हैं। ओडिशा में उन्होंने युवाओं के विरोध को दबाने के बजाय उनकी बात समझने की जरूरत बताई थी। उनका कहना था कि नई पीढ़ी की आकांक्षाओं को समझना और उन्हें सही दिशा देना जरूरी है। यही वजह है कि उनकी मौजूदा गतिविधियों को सिर्फ सामान्य कार्यक्रमों तक सीमित करके नहीं देखा जा रहा। राजनीतिक जानकारों के बीच इसे युवाओं के साथ दोबारा जुड़ने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है।

छात्र राजनीति का पुराना अनुभव

धर्मेंद्र प्रधान की राजनीतिक पृष्ठभूमि को देखें तो छात्र राजनीति उनके लिए नई नहीं है। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से की थी। ऐसे में छात्र राजनीति और युवाओं के बीच काम करने का उनका पुराना अनुभव उनकी मौजूदा रणनीति में अहम भूमिका निभा सकता है। Gen Z की राजनीति और पारंपरिक राजनीति में काफी अंतर है। युवा वर्ग अब केवल भाषणों के बजाय सीधे संवाद, रोजगार, शिक्षा, अवसर और भविष्य से जुड़े मुद्दों पर जवाब चाहता है। धर्मेंद्र प्रधान की हालिया गतिविधियों में भी इन्हीं मुद्दों पर जोर दिखाई दे रहा है।

कमबैक की तैयारी या सिर्फ सक्रियता?

हालांकि अभी तक धर्मेंद्र प्रधान की ओर से किसी नए राजनीतिक पद या जिम्मेदारी को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। इसलिए उनकी मौजूदा गतिविधियों को सीधे सियासी कमबैक कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना जरूर है कि शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफे के बाद भी धर्मेंद्र प्रधान ने सार्वजनिक जीवन से दूरी नहीं बनाई है। वे लगातार कार्यक्रमों में शामिल हो रहे हैं, युवाओं से संवाद कर रहे हैं और अपनी राजनीतिक मौजूदगी बनाए हुए हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या धर्मेंद्र प्रधान सिर्फ युवाओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं, या फिर भाजपा के भीतर किसी नई राजनीतिक भूमिका की तैयारी शुरू हो चुकी है? आने वाले दिनों में उनकी गतिविधियां इस सवाल का जवाब दे सकती हैं।


पीट देगा अहीर...ओमप्रकाश राजभर ने बताया PDA का मतलब, अखिलेश यादव पर साधा निशाना

by पूजा झा

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर गुरुवार को मऊ पहुंचे। यहां सदर विधानसभा क्षेत्र के रतनपुरा बाजार में उन्होंने विभिन्न विकास कार्यों का शिलान्यास किया और 51 फीट ऊंचे राष्ट्रीय ध्वज का उद्घाटन किया। कार्यक्रम के बाद पत्रकारों से बातचीत में राजभर ने समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, कांग्रेस नेता राहुल गांधी और आजम खान से जुड़े कई मुद्दों पर बयान दिए।

‘2027 का सपना इस जन्म में पूरा नहीं होगा’

अखिलेश यादव के 2027 में उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने के दावे पर तंज कसते हुए राजभर ने कहा कि उनका यह सपना इस जन्म में भी पूरा नहीं होगा। उन्होंने अखिलेश यादव को अगले जन्म की तैयारी करने की सलाह तक दे डाली। राजभर ने पूर्वांचल में समाजवादी पार्टी की चुनावी सफलता को लेकर भी निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि पूर्वांचल में सपा को मिली ज्यादातर सीटों पर उनकी पार्टी और सहयोगियों के समर्थन का बड़ा योगदान रहा है। राजभर ने कहा कि उनके अलावा अखिलेश यादव के पास ऐसा कोई चेहरा नहीं है, जो उस वोट बैंक को उनके पक्ष में ला सके।

PDA का राजभर ने बताया अलग मतलब

PDA को लेकर पूछे गए सवाल पर ओमप्रकाश राजभर ने अखिलेश यादव पर कटाक्ष करते हुए इसका अलग ही अर्थ बताया। उन्होंने कहा, “पीट देगा अहीर और पीट देगा अल्पसंख्यक, यही उनका PDA है।” राजभर ने दावा किया कि 2027 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के पास सत्ता में लौटने की संभावना नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि विपक्षी दल अखिलेश यादव के साथ जाने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं।

NDA में सीट बंटवारे पर अखिलेश के पोस्ट पर तंज

NDA में सीटों के बंटवारे को लेकर अखिलेश यादव की ओर से किए गए X पोस्ट पर भी राजभर ने कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि ऐसा लग रहा है जैसे अखिलेश यादव को NDA का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया हो और वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात करके आए हों, तभी वह गठबंधन के सीट बंटवारे की जानकारी दे रहे हैं।

राहुल गांधी पर भी साधा निशाना

राहुल गांधी के ‘वंदे मातरम्’ का पूरा गीत नहीं गाने के मुद्दे पर राजभर ने कांग्रेस नेता पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी सिर्फ वंदे मातरम् के मामले में ही नहीं, बल्कि विदेश यात्राओं के दौरान भी भारत का अपमान करते हैं। उन्होंने चुनाव आयोग पर राहुल गांधी के आरोपों को लेकर भी सवाल उठाया। राजभर ने कहा कि जिस चुनाव प्रक्रिया के जरिए कांग्रेस चुनाव जीतती है, उसी प्रक्रिया पर बाद में सवाल उठाए जाते हैं। उन्होंने कर्नाटक का उदाहरण देते हुए राहुल गांधी को वहां की सरकार से इस्तीफा दिलाने की चुनौती भी दी।

जौहर यूनिवर्सिटी मामले पर आजम खान का जिक्र

रामपुर की जौहर यूनिवर्सिटी पर हो रही कार्रवाई के सवाल पर राजभर ने समाजवादी पार्टी पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी के निर्माण के दौरान प्रदेश में सपा की सरकार थी, इसलिए नक्शा पास होने समेत अन्य प्रक्रियाओं पर उस समय ध्यान क्यों नहीं दिया गया। राजभर ने अखिलेश यादव और आजम खान के राजनीतिक संबंधों का जिक्र करते हुए कहा कि जौहर यूनिवर्सिटी को समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान ही बढ़ावा मिला। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि निर्माण और वित्तीय सहयोग से जुड़े काम उसी दौर में हुए थे, तो उस समय नियमों और अनुमतियों का पालन क्यों नहीं कराया गया।  ओमप्रकाश राजभर के इन बयानों के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर सपा और NDA के बीच बयानबाजी तेज होने के संकेत हैं। खास तौर पर PDA और 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजभर की टिप्पणी राजनीतिक चर्चा का विषय बन गई है।


सज्जन कुमार का निधन, 1984 सिख विरोधी दंगों के मामलों में उम्रकैद काट रहे थे पूर्व कांग्रेस सांसद

by पूजा झा

नई दिल्ली: पूर्व कांग्रेस सांसद और वरिष्ठ नेता सज्जन कुमार का गुरुवार को 80 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वह 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में दोषी ठहराए जाने के बाद तिहाड़ जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे थे। तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। अस्पताल सूत्रों के मुताबिक, उन्हें अस्पताल लाए जाने के समय ही मृत पाया गया। सज्जन कुमार के निधन की खबर मिलते ही उनके बेटे जग प्रवेश कुमार सफदरजंग अस्पताल पहुंचे। पिछले कुछ समय से सज्जन कुमार स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे।

1984 दंगों के मामलों में काट रहे थे उम्रकैद

सज्जन कुमार को 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े दो अलग-अलग मामलों में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। दिसंबर 2018 में दिल्ली हाईकोर्ट ने पालम कॉलोनी से जुड़े मामले में उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी। यह मामला नवंबर 1984 में पांच सिखों की हत्या और एक गुरुद्वारे को जलाए जाने से जुड़ा था। इसके बाद से वह तिहाड़ जेल में बंद थे। फरवरी 2025 में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने उन्हें सरस्वती विहार मामले में भी उम्रकैद की सजा सुनाई। अदालत ने 1 नवंबर 1984 को जसवंत सिंह और उनके बेटे तरुणदीप सिंह की हत्या के मामले में उन्हें दोषी ठहराया था। इस मामले में अदालत ने उन्हें दंगाई भीड़ को उकसाने और हत्या से जुड़ी भूमिका के लिए दोषी माना था। अभियोजन पक्ष और पीड़ित परिवार की ओर से मृत्युदंड की मांग की गई थी, लेकिन अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई। हालांकि, 1984 दंगों से जुड़े सभी मामलों में सज्जन कुमार दोषी नहीं ठहराए गए। जनवरी 2026 में दिल्ली की एक अदालत ने जनकपुरी और विकासपुरी में हिंसा भड़काने से जुड़े एक मामले में उन्हें बरी कर दिया था।

दिल्ली की राजनीति में रहा लंबा प्रभाव

सज्जन कुमार का जन्म 23 सितंबर 1945 को दिल्ली में हुआ था। उन्होंने 1970 के दशक में राजनीति में कदम रखा और धीरे-धीरे दिल्ली की कांग्रेस राजनीति में प्रभावशाली चेहरा बन गए। वह दिल्ली नगर निगम के पार्षद रहे और बाद में दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी में महासचिव की जिम्मेदारी संभाली। सज्जन कुमार ने बाहरी दिल्ली से कांग्रेस के मजबूत नेता के तौर पर अपनी पहचान बनाई। वह 1980, 1991 और 2004 में लोकसभा के लिए चुने गए। उन्हें तत्कालीन कांग्रेस नेता संजय गांधी के करीबी नेताओं में भी गिना जाता था। 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में दोषसिद्धि के बाद उन्होंने दिसंबर 2018 में कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद उनका राजनीतिक जीवन लगभग पूरी तरह न्यायिक मामलों और जेल की सजा के इर्द-गिर्द सिमट गया। सज्जन कुमार का निधन ऐसे समय हुआ है जब 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया के कई अध्याय दशकों बाद भी सामने आते रहे हैं। उनके खिलाफ दर्ज मामलों में कुछ में दोषसिद्धि हुई, जबकि कुछ मामलों में उन्हें अदालतों से राहत भी मिली।


वंदे मातरम् पर अमित शाह का कांग्रेस पर हमला, बोले- दो छंद तक सीमित करना तुष्टीकरण की राजनीति

by पूजा झा

नई दिल्ली: राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर कांग्रेस और बीजेपी के बीच सियासी विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) ने पार्टी के कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के केवल पहले दो छंद गाने के अपने पुराने रुख को दोहराया है। कांग्रेस का यह फैसला 1937 में लिए गए उसके ऐतिहासिक निर्णय से जुड़ा है। इसी मुद्दे पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है और उसके फैसले को तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़ते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं। अमित शाह ने कांग्रेस के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि पार्टी ने ‘वंदे मातरम्’ को केवल दो छंदों तक सीमित करने का निर्णय लेकर पुरानी नीति को ही आगे बढ़ाया है।

शाह के मुताबिक, 1937 में कांग्रेस ने मुस्लिम समुदाय की आपत्तियों को देखते हुए गीत के केवल पहले दो छंदों को राष्ट्रीय आयोजनों में गाने का फैसला किया था।
शाह ने आरोप लगाया कि कांग्रेस का यह फैसला देश के विभाजन की पृष्ठभूमि से भी जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि 1937 में ‘वंदे मातरम्’ को लेकर लिए गए निर्णय से कांग्रेस की तुष्टीकरण की नीति को बढ़ावा मिला और आगे चलकर द्विराष्ट्र सिद्धांत को मजबूती मिली। हालांकि, इतिहास के इस संबंध को लेकर राजनीतिक दलों और इतिहासकारों के बीच अलग-अलग व्याख्याएं रही हैं। ऐतिहासिक रिकॉर्ड के मुताबिक, अक्टूबर-दिसंबर 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने यह तय किया था कि राष्ट्रीय सभाओं में ‘वंदे मातरम्’ के केवल पहले दो छंद गाए जाएं। उस समय गीत के बाद के हिस्सों में धार्मिक प्रतीकों के उल्लेख को लेकर कुछ मुस्लिम नेताओं की आपत्तियों पर विचार किया गया था।

1937 के फैसले की क्या थी वजह?

‘वंदे मातरम्’ मूल रूप से बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचना है और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह राष्ट्रीय चेतना का बड़ा प्रतीक बना। 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में इसे सार्वजनिक रूप से गाया गया था और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह देशभक्ति के नारों में प्रमुख रहा। 1937 में कांग्रेस के भीतर गीत के कुछ छंदों को लेकर चर्चा हुई। पहले दो छंदों में मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता और समृद्धि का वर्णन है, जबकि बाद के छंदों में देवी-देवताओं से जुड़े धार्मिक संदर्भ आते हैं। कांग्रेस कार्यसमिति ने विवाद से बचने और अलग-अलग समुदायों की आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय आयोजनों में पहले दो छंदों को ही अपनाने की सिफारिश की थी। बाद में 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने ‘वंदे मातरम्’ को ‘जन गण मन’ के साथ समान सम्मान दिए जाने की बात कही। इस तरह ‘वंदे मातरम्’ को भारत के राष्ट्रीय गीत का दर्जा मिला।

मोदी सरकार ने क्यों शुरू किया पूरा वंदे मातरम्?

‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर केंद्र सरकार ने इसके पूर्ण संस्करण को लेकर विशेष पहल की है। गृह मंत्रालय ने जनवरी 2026 में राष्ट्रीय गीत को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए। इसके बाद आकाशवाणी ने 26 मार्च 2026 से छह छंदों वाला पूर्ण संस्करण प्रसारित करना शुरू किया। इससे पहले स्वतंत्रता के बाद से आकाशवाणी पर सामान्य तौर पर पहले २ छंदों वाला संस्करण प्रसारित होता रहा था। दिसंबर 2025 में अमित शाह ने राज्यसभा में ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ पर विशेष चर्चा की शुरुआत भी की थी। गृह मंत्रालय की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, इस अवसर पर सरकार ने राष्ट्रीय गीत के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित किया था।
कांग्रेस के फैसले पर शाह ने उठाए सवाल

अमित शाह ने कांग्रेस के मौजूदा रुख को स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ‘वंदे मातरम्’ से जुड़े बलिदानों से जोड़ते हुए कहा कि पार्टी को इस राष्ट्रीय गीत के पूरे स्वरूप को लेकर अपना रुख बदलना चाहिए। उनका कहना है कि आजादी की लड़ाई में ‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा और इसके नाम के साथ अनेक आंदोलनों और बलिदानों की याद जुड़ी हुई है। शाह ने राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस पर तुष्टीकरण की राजनीति को आगे बढ़ाने का आरोप लगाया और कहा कि पार्टी का मौजूदा फैसला उसी राजनीति का उदाहरण है।

कांग्रेस का क्या कहना है?

दूसरी ओर, कांग्रेस अपने फैसले को नया निर्णय नहीं बल्कि 1937 से चली आ रही पार्टी की ऐतिहासिक परंपरा बता रही है। कांग्रेस कार्यसमिति ने हाल में दोहराया कि पार्टी के कार्यक्रमों में पहले दो छंदों का ही इस्तेमाल किया जाएगा। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि पहले दो छंद ऐतिहासिक रूप से राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े रहे हैं और इसी स्वरूप को कांग्रेस ने लंबे समय से अपनाया है। यानी ‘वंदे मातरम्’ को लेकर विवाद सिर्फ गीत के कितने छंद गाए जाएं, इतना भर नहीं है। इसके साथ 1937 का कांग्रेस का फैसला, स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास, धार्मिक संवेदनशीलता और आज की राजनीति—सभी मुद्दे जुड़े हुए हैं। इसी वजह से 90 साल पुराना यह फैसला 2026 में एक बार फिर बीजेपी और कांग्रेस के बीच बड़े राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गया है।


CM पद छोड़ेंगे फडणवीस? दिल्ली पहुंचकर PM मोदी से मिले, अटकलों पर खुद दिया जवाब

मुंबई/नई दिल्ली: महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के मुख्यमंत्री पद छोड़कर केंद्र की राजनीति में जाने की अटकलों के बीच उनका दिल्ली दौरा चर्चा में रहा। सोमवार को फडणवीस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। हालांकि, बैठक के बाद उन्होंने साफ कर दिया कि फिलहाल उनका फोकस महाराष्ट्र पर ही है और वह राज्य की जिम्मेदारी निभाते रहेंगे। फडणवीस ने राष्ट्रीय राजनीति में जाने की चर्चाओं पर तंज कसते हुए कहा कि जिसे जितनी अटकलें लगानी हैं, जितनी पतंग उड़ानी है या जितनी अफवाह फैलानी है, वह ऐसा करता रहे। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र की जनता ने उन्हें चुनकर भेजा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें महाराष्ट्र की जिम्मेदारी सौंपी है। वह इस जिम्मेदारी का निर्वहन करते रहेंगे।

PM मोदी से किन मुद्दों पर हुई चर्चा?

फडणवीस के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी के साथ मुलाकात में महाराष्ट्र से जुड़े विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की समीक्षा की गई। दोनों नेताओं के बीच राज्य में चल रहे और प्रस्तावित प्रोजेक्ट्स को लेकर चर्चा हुई। बैठक में ग्रामीण विकास, मुंबई मेट्रो, रेलवे, एयरपोर्ट, पोर्ट और सड़क परियोजनाओं समेत कई मुद्दे उठे। फडणवीस ने कहा कि केंद्र सरकार ने महाराष्ट्र को हर संभव सहयोग देने का भरोसा दिया है। मुख्यमंत्री ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से भी मुलाकात की। इस दौरान जापान की एजेंसी जायका से जुड़े प्रोजेक्ट को लेकर आगे की रणनीति पर चर्चा हुई। इसके अलावा केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव से मुलाकात के दौरान महाराष्ट्र से जुड़े पर्यावरणीय मुद्दों पर बातचीत हुई। फडणवीस के दिल्ली दौरे में उद्योग विभाग से जुड़े एक कार्यक्रम में भी शामिल होने की योजना है, जिसमें देश के मुख्यमंत्रियों और उद्योग मंत्रियों के साथ औद्योगिक विकास से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होनी है।

जुलाई में संजय राउत ने क्या दावा किया था?

फडणवीस के केंद्र में जाने की अटकलें नई नहीं हैं। 17 जुलाई को शिवसेना (UBT) के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने दावा किया था कि अगर केंद्र में मंत्रिमंडल में फेरबदल होता है तो फडणवीस को राष्ट्रीय राजनीति में जिम्मेदारी दी जा सकती है। उन्होंने यह भी कहा था कि ऐसी स्थिति में महाराष्ट्र में बीजेपी का कोई वरिष्ठ नेता मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। इसके बाद फडणवीस को लेकर महाराष्ट्र से दिल्ली जाने और केंद्र में बड़ी जिम्मेदारी मिलने की चर्चाएं तेज हुई थीं। जुलाई के दौरान ऐसी अटकलों के बीच राज्य सरकार और बीजेपी की राजनीति को लेकर कई तरह के कयास लगाए जाते रहे।

फडणवीस ने क्या कहा?

अब दिल्ली दौरे के दौरान फडणवीस के बयान से इन अटकलों पर फिलहाल विराम लगता दिख रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह महाराष्ट्र में हैं और महाराष्ट्र के लिए काम करते रहेंगे। यानी प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात के बाद फिलहाल मुख्यमंत्री पद छोड़ने या केंद्र में जाने की कोई पुष्टि नहीं हुई है। उलटे फडणवीस ने खुद ऐसी चर्चाओं को खारिज करते हुए संकेत दिया है कि महाराष्ट्र की मुख्यमंत्री के तौर पर उनकी जिम्मेदारी जारी रहेगी।


बीजेपी की नई टीम का ऐलान, नितिन नवीन ने वसुंधरा राजे, स्मृति ईरानी समेत कई चेहरों को एंट्री देकर चौंकाया

नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की नई टीम का ऐलान कर दिया है। 17 अगस्त को जारी सूची में पार्टी ने संगठन में कई बड़े बदलाव किए हैं। नई टीम में अनुभवी चेहरों के साथ-साथ कई नए नेताओं को भी अहम जिम्मेदारियां दी गई हैं। खास बात यह है कि पूर्व राजस्थान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया और बीजेपी के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव राम माधव को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है। बीजेपी ने कुल 13 राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त किए हैं। इनमें वसुंधरा राजे सिंधिया, राम माधव, बैजयंत पांडा, तीरथ सिंह रावत, डी. पुरंदेश्वरी, रेखा वर्मा, वर्षाबेन नरेंद्रभाई दोशी, भारती प्रवीण पवार, मनप्रीत सिंह बादल, लाल सिंह आर्य, एम. नागराजा, तारिक मंसूर और मधुचंद्र कर शामिल हैं।

सबसे ज्यादा चर्चा स्मृति ईरानी की वापसी को लेकर है। अमेठी से 2024 का लोकसभा चुनाव हारने के बाद अब उन्हें बीजेपी संगठन में बड़ी जिम्मेदारी मिली है। स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है। उनके साथ पूर्व केंद्रीय मंत्री विनोद तावड़े और सुनील बंसल को भी महासचिव पद पर बरकरार रखा गया है। नई टीम में कुल 8 राष्ट्रीय महासचिव बनाए गए हैं। इनमें स्मृति ईरानी, विनोद तावड़े, सुनील बंसल, त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब, सतीश पूनिया, गजेंद्र पटेल, हरिश द्विवेदी और संजय भाटिया शामिल हैं। यानी यूपी से स्मृति ईरानी और हरिश द्विवेदी, दो नेताओं को महासचिव की जिम्मेदारी मिली है। इसके अलावा संगठन में बड़ा बदलाव राष्ट्रीय सचिवों के स्तर पर भी हुआ है। पार्टी ने 16 राष्ट्रीय सचिव नियुक्त किए हैं। वहीं बीएल संतोष राष्ट्रीय महासचिव संगठन के पद पर बने रहेंगे। शिवप्रकाश और सौदान सिंह को राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव संगठन की जिम्मेदारी दी गई है। नई टीम में महिलाओं की मौजूदगी भी नजर आती है। 13 राष्ट्रीय उपाध्यक्षों में वसुंधरा राजे, डी. पुरंदेश्वरी, रेखा वर्मा, वर्षाबेन दोशी और भारती प्रवीण पवार समेत कई महिला चेहरे शामिल हैं। हालांकि मूल दावे में 6 महिला उपाध्यक्ष बताए गए थे, उपलब्ध जारी सूची के मुताबिक 13 उपाध्यक्षों में 5 महिलाएं हैं। इसलिए इसे करीब 50 फीसदी कहना सही नहीं होगा।

पार्टी ने संगठन के दूसरे मोर्चों में भी बदलाव किए हैं। हेमंग जोशी को युवा मोर्चा, रूप कुमारी चौधरी को महिला मोर्चा, अमरपाल मौर्य को ओबीसी मोर्चा और कुंवर बासित अली को अल्पसंख्यक मोर्चे की जिम्मेदारी दी गई है। अनिल बलूनी को मीडिया संयोजक और दीपक म्हास्के को सोशल मीडिया संयोजक बनाया गया है। कुल मिलाकर नितिन नबीन की नई टीम में एक तरफ वसुंधरा राजे और राम माधव जैसे अनुभवी चेहरे हैं, तो दूसरी तरफ स्मृति ईरानी, बिप्लब देब और दूसरे नेताओं को संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है। इस बदलाव को ऐसे समय में अहम माना जा रहा है जब बीजेपी के सामने अगले विधानसभा चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारियों की चुनौती है। नई टीम अब संगठन को जमीन पर कितना मजबूत करती है और पार्टी की चुनावी रणनीति में कितना बदलाव दिखता है, इस पर सबकी नजर रहेगी।


'दिमागी नक्सल' पर सियासी घमासान, PM मोदी के बयान पर भड़का विपक्ष

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले के प्राचीर से कहा था कि दिमागी नक्सल अब भी मौके की तलाश में है. दिमागी नक्सल को लेकर सियासत अभी भी चल रही है. विपक्ष के नेता सरकार पर निशाना साध रहे हैं. विपक्ष का कहना है कि पीएम मोदी ने उन्हें दिमागी नक्सल कहा है. इसके बाद से सरकार और विपक्ष एक-दूसरे पर निशाना साध रहा है.
क्या है दिमागी नक्सल

केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने दिमागी नक्सल को 3 प्वाइंट्स में बताया है. उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट शेयर किया है.  रिजिजू ने लिखा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने विपक्ष के नेताओं को दिमागी नक्सल नहीं कहा है. उन्होंने कहा कि दिमागी नक्सल वो लोग हैं, जो माओवादियों का समर्थन करते हैं और भारत के संविधान को मानने से इनकार करते हैं, जो अलगाववादियों के साथ खड़े होते हैं और संविधान के अनुच्छेद 370 का समर्थन करते हैं और जो भारत से उत्तर पूर्व हिस्से को अलग करने के लिए चिकन नेक को काटने की बात करते हैं.’ 

चिदंबरम के बयान पर बीजेपी का पलटवार

पीएम मोदी के दिमागी नक्सल के बयान पर कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर लिखा था- "मुझे 'दिमागी नक्सल' होने पर गर्व है.'' बीजेपी प्रवक्ता आरपी सिंह ने कहा, "वह खुद को 'दिमागी नक्सल' कह रहे हैं क्योंकि मुझे लगता है कि वह ऐसे लोगों को कवर देना चाहते हैं जो 'दिमागी नक्सल' और 'अर्बन नक्सल' हैं. 
सैयद शाहनवाज हुसैन ने कहा- "प्रधानमंत्री ने सीधे तौर पर कांग्रेसियों को 'दिमागी नक्सल' नहीं कहा था, लेकिन अगर कांग्रेस नेता खुद ही उस लेबल को स्वीकार कर रहे हैं, तो यह उनकी अपनी समस्या है." बीजेपी के राज्यसभा सदस्य दिनेश शर्मा ने सवाल किया, "विपक्ष को नक्सलवाद से जुड़ी हिंसा और मानसिकता पर प्रधानमंत्री की चेतावनी की चिंता क्यों नहीं है? विपक्ष 'नक्सल' शब्द को लेकर उलझ रहा है, लेकिन ऐसी मानसिकता से होने वाले नुकसान पर कभी बात नहीं करता.''

कांग्रेस नेताओं ने साधा निशाना

पीएम मोदी के बयान के बाद कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने पलटवार किया था. उन्होंने लिखा, "पहले उन्होंने अपने विरोधियों को 'अर्बन नक्सल' कहा. अब वे उन्हें 'दिमागी नक्सल' कर रहे हैं. ये उनकी हताशा का निश्चित संकेत है. ये अलग बात है कि आखिरकार वे वही करते हैं जिसकी ये तथाकथित 'अर्बन नक्सल' या अब 'दिमागी नक्सल' मांग या वकालत करते हैं. कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने लिखा, "मोदी जी आप देश के युवाओं को 'दिमागी नक्सल' बुला रहे हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि वह आपसे सवाल करते हैं? 75 मिनट के उबाऊ भाषण में एक हारा हुआ, थका हुआ आदमी नजर आया जिसको जमीनी हकीकत का कोई अंदाजा नहीं. पंडित नेहरू को महापुरुष बुलाना अच्छा था.


राहुल गांधी ने PM मोदी की विदेश नीति पर कसा तंज, मेलोनी के जिक्र से विवाद; BJP ने लगाया महिला अपमान का आरोप

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति को लेकर कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के एक बयान ने राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री की विदेश नीति पर तंज कसते हुए विदेशी नेताओं से मुलाकात और उन्हें गले लगाने की शैली पर सवाल उठाया। इसके बाद मंच पर इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी का संदर्भ आने से विवाद और तेज हो गया। राहुल गांधी ने 13 अगस्त को नई दिल्ली में आयोजित कांग्रेस के रचनात्मक कांग्रेस सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति पर कटाक्ष किया। उन्होंने मंच पर कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित के साथ गले मिलने का अभिनय करते हुए पीएम मोदी की कूटनीति पर सवाल उठाया। राहुल का कहना था कि सरकार की जिम्मेदारी देश के हितों की रक्षा करना है, न कि केवल विदेशी नेताओं को गले लगाना।

इसी दौरान संदीप दीक्षित ने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी का नाम लेते हुए एक टिप्पणी की, जिसके बाद राजनीतिक घमासान शुरू हो गया। बीजेपी ने इस टिप्पणी को महिला और एक विदेशी राष्ट्राध्यक्ष के प्रति आपत्तिजनक बताते हुए कांग्रेस से माफी की मांग की। बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया कि राजनीतिक विरोध के नाम पर भाषा की मर्यादा नहीं लांघी जानी चाहिए। हालांकि, कांग्रेस की ओर से यह तर्क दिया गया कि राहुल गांधी ने अपने बयान में सीधे तौर पर मेलोनी का नाम लेकर कोई आपत्तिजनक टिप्पणी नहीं की। विवाद का बड़ा हिस्सा संदीप दीक्षित की ओर से मेलोनी के संदर्भ में की गई टिप्पणी को लेकर है। यही वजह है कि इस पूरे घटनाक्रम को राहुल गांधी के बयान और उसके बाद मंच पर हुई टिप्पणी—दो अलग हिस्सों में देखना जरूरी है।

बीजेपी ने राहुल गांधी पर प्रधानमंत्री की विदेश नीति जैसे गंभीर मुद्दे को व्यक्तिगत और हास्यात्मक अंदाज में पेश करने का आरोप लगाया है। पार्टी नेताओं ने इसे राजनीतिक संवाद के गिरते स्तर से जोड़ते हुए राहुल गांधी से माफी मांगने की मांग की। वहीं, कांग्रेस का कहना है कि विपक्ष को सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाने और प्रधानमंत्री की कूटनीतिक शैली की आलोचना करने का पूरा अधिकार है। दिलचस्प बात यह है कि भारत और इटली के संबंधों को लेकर विदेश मंत्रालय के आधिकारिक दस्तावेजों में दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी, व्यापार, सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी सहयोग का उल्लेख है। ऐसे में मेलोनी के संदर्भ वाली राजनीतिक बयानबाजी ने विदेश नीति की बहस को भी व्यक्तिगत टिप्पणियों के घेरे में ला दिया है।


राहुल गांधी का PM और शाह पर हमला, बोले- हम इनको पागल कर देंगे

नई दिल्ली: कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को लेकर तीखे बयान दिए हैं। नई दिल्ली के मावलंकर हॉल में आयोजित ‘रचनात्मक कांग्रेस कन्वेंशन’ में राहुल गांधी ने पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए केंद्र सरकार और बीजेपी पर कई गंभीर आरोप लगाए। राहुल गांधी ने कहा कि विपक्ष का काम सरकार पर दबाव बनाना है और कांग्रेस ऐसा करती रहेगी। उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दबाव में हैं। राहुल ने कहा, “हमारा काम बहुत सिंपल है, हम इनको पागल कर देंगे।”

‘अमित शाह 20 दिन संसद में नहीं घुस पाए’

राहुल गांधी ने गृह मंत्री अमित शाह को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि जो लोग चाणक्य और सरदार पटेल का नाम लेते थे, वे अब कहां हैं। राहुल ने दावा किया कि अमित शाह करीब 20 दिन तक संसद भवन में नहीं आ पाए। राहुल गांधी ने कहा कि सत्ता पक्ष पहली बार भारत की बदलती अभिव्यक्ति को महसूस कर रहा है और उसे समझ में आ रहा है कि देश में लोग अपनी बात खुलकर रखने लगे हैं।

‘लोग कायरों जैसा व्यवहार कर रहे हैं’

कांग्रेस सांसद ने केंद्र सरकार के खिलाफ विपक्ष और अन्य लोगों के रवैये पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि देश में कई लोग कथित तौर पर ताकत के सामने कायरों जैसा व्यवहार कर रहे हैं। राहुल ने कहा कि भारत को समझने के लिए देश के इतिहास, दर्शन और समाज से जुड़ाव जरूरी है। उनके मुताबिक, जो व्यक्ति भारत से जुड़ नहीं सकता, वह भारत को पूरी तरह नहीं समझ सकता।

RSS को लेकर राहुल गांधी का बड़ा आरोप

राहुल गांधी ने RSS और बड़े उद्योगपतियों को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि बड़े पूंजीपति समूहों ने RSS पर कब्जा कर लिया है और आज संगठन का इस्तेमाल कारोबारी हितों के लिए किया जा रहा है। राहुल ने कहा कि पहले RSS में छोटे कारोबारी, दुकानदार और अलग-अलग व्यवसायों से जुड़े लोग बड़ी संख्या में शामिल होते थे। उन्होंने आरोप लगाया कि नोटबंदी और GST जैसी नीतियों ने छोटे कारोबारियों को नुकसान पहुंचाया। उन्होंने दावा किया कि समय के साथ RSS में बड़े पूंजी का प्रभाव बढ़ा और अब संगठन को उद्योगपतियों के प्रभाव में बताया जा सकता है।

‘गले लगाना ही विदेश नीति नहीं’

राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति पर भी तंज कसा। उन्होंने कहा कि उन्हें समझ नहीं आया कि कुछ लोगों को यह क्यों लगा कि किसी नेता को गले लगाना ही विदेश नीति है। इसी दौरान राहुल गांधी ने मंच पर मौजूद कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित को गले लगाकर अपनी बात का उदाहरण भी दिया। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करने को लेकर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि पहले उन्हें लगता था कि यह कोई मार्केटिंग रणनीति हो सकती है, लेकिन प्रधानमंत्री के साथ कमरे में बैठक के अनुभव के बाद उनकी सोच बदल गई। राहुल ने कहा कि देश में किसी को अपनी अभिव्यक्ति दबानी नहीं चाहिए। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का अधिकार होना चाहिए, चाहे वह RSS से जुड़ा व्यक्ति ही क्यों न हो।  उन्होंने कहा कि अगर किसी की बात पसंद नहीं आती है तो उसका जवाब तर्क और बातचीत के जरिए दिया जा सकता है, लेकिन किसी की अभिव्यक्ति को खत्म करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।

‘कांग्रेस किसी की अभिव्यक्ति नहीं दबाएगी’

राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस का उद्देश्य किसी की आवाज दबाना नहीं है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में अलग-अलग विचारों का सामने आना जरूरी है। उनके मुताबिक, किसी विचार से असहमति होने पर उसका विरोध किया जा सकता है, लेकिन बोलने के अधिकार को खत्म नहीं किया जाना चाहिए। राहुल गांधी के इन बयानों के बाद बीजेपी और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है। उनके भाषण में प्रधानमंत्री मोदी, अमित शाह, RSS और केंद्र सरकार की नीतियां प्रमुख निशाने पर रहीं।


रांची के छात्र आंदोलन पर पुलिसिया एक्शन, 600 प्रदर्शनकारियों पर FIR दर्ज |

रांची में छात्रों के विधानसभा मार्च के दौरान हुई उग्र झड़प को लेकर पुलिस ने सख्त कार्रवाई की है. पुलिस ने कुल 600 प्रदर्शनकारियों के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज की है, जिनमें 100 नामजद और 500 अज्ञात छात्र व अन्य प्रदर्शनकारी शामिल हैं. पुलिस से मिली जानकारी के मुताबिक, दर्ज एफआईआर में आंदोलन का नेतृत्व कर रहे 100 प्रमुख प्रदर्शनकारियों को नामजद किया गया है. इसके अलावा 500 अज्ञात छात्रों व अन्य उपद्रवियों को आरोपी बनाया गया है. आपको बता दें कि 10 अगस्त को JPSC और JSSC भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं के विरोध में छात्रों ने 'विधानसभा घेराव' का आह्वान किया था. इस दौरान जब प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा घेरा तोड़कर आगे बढ़ने की कोशिश की, तो पुलिस के साथ भारी तीखी झड़प हुई थी. भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज, वाटर कैनन और आंसू गैस के गोलों का प्रयोग करना पड़ा था. वहीं छात्र अपनी मांगों को लेकर अभी भी अड़े हुए हैं और छात्रों का आंदोलन रांची के जयपाल मुंडा स्टेडियम में जारी है. इस मुद्दे को लेकर सरकार और छात्र प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की लंबी वार्ता हो चुकी है, लेकिन JSSC-CGL परीक्षा और नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर अब तक कोई सहमति नहीं बन पाई है.

सरकार का दावा

इस बीच, झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) को भंग कर दिया गया है और उसके तीनों सदस्य अपने पद से इस्तीफा दे चुके हैं. वहीं, आयोग की सदस्य डॉ. अजिता भट्टाचार्य से 10 अगस्त को पूछताछ की जानी है. दूसरी ओर, छात्र पूरे मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग पर अड़े हुए हैं. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने स्वयं छात्रों को पत्र लिखकर उनकी चिंताओं को दूर करने और भरोसा दिलाने का प्रयास किया. सरकार का दावा है कि छात्रों की 98 प्रतिशत मांगों को स्वीकार कर लिया गया है, लेकिन कुछ प्रमुख मुद्दों पर अब भी गतिरोध बना हुआ है. वहीं प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उनकी मांगे अभी भी नहीं मानी गई हैं.


हंगामे के बीच JPC के पास भेजा गया बिल, विपक्ष ने अल्पसंख्यकों और NGOs को लेकर उठाए सवाल

नई दिल्ली: संसद के मॉनसून सत्र में विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 यानी FCRA Amendment Bill 2026 को लेकर लोकसभा में बुधवार को जोरदार हंगामा हुआ। विपक्ष की आपत्तियों और विरोध के बीच केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजने का प्रस्ताव रखा, जिसे सदन ने ध्वनिमत से स्वीकार कर लिया। अब विधेयक की विस्तृत समीक्षा JPC करेगी। विधेयक को लेकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी समेत विपक्षी दलों ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाए। कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि प्रस्तावित कानून का इस्तेमाल अल्पसंख्यकों और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है। उन्होंने सरकार से विधेयक वापस लेने की मांग की।

केसी वेणुगोपाल के आरोप पर रिजिजू का पलटवार

केसी वेणुगोपाल के आरोपों पर संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने पलटवार किया। उन्होंने विपक्ष से कहा कि सदन को गुमराह नहीं किया जाना चाहिए। रिजिजू ने कहा कि कांग्रेस समेत विपक्षी दल पहले ही विधेयक को JPC के पास भेजने की मांग कर रहे थे, इसलिए अब समिति के सामने अपनी आपत्तियां और सुझाव रखे जा सकते हैं। रिजिजू ने यह भी कहा कि विधेयक में अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने वाली कोई व्यवस्था नहीं है। उन्होंने विपक्षी दलों को चुनौती देते हुए कहा कि अगर विधेयक की किसी धारा में अल्पसंख्यकों के खिलाफ प्रावधान है तो उसे सामने रखा जाए।

अखिलेश यादव ने सरकार पर साधा निशाना

बहस के दौरान समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने विपक्ष के विरोध का जिक्र करते हुए सवाल उठाया कि अल्पसंख्यकों को शामिल किए बिना सरकार किस तरह का विधेयक लेकर आई है। अखिलेश यादव के आरोपों पर रिजिजू ने कहा कि विधेयक को JPC में भेजा जा रहा है और समिति में सभी पक्ष अपनी बात रख सकते हैं। सदन की कार्यवाही के दौरान सभापति की भूमिका निभा रहे जगदंबिका पाल ने सभी दलों से निष्पक्ष और व्यवस्थित चर्चा की अपील की।
राज्यसभा में अमित शाह की गैरमौजूदगी पर हंगामा

FCRA विधेयक को लेकर राज्यसभा में भी विपक्ष ने सरकार को घेरा। विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने गृह मंत्री अमित शाह की सदन में मौजूदगी को लेकर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि जिस मंत्रालय से संबंधित विधेयक है, उसके मंत्री को सदन में मौजूद रहना चाहिए। वहीं, बीजेपी अध्यक्ष और राज्यसभा में सदन के नेता जेपी नड्डा ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि सरकार सभी मुद्दों पर चर्चा के लिए तैयार है और विपक्ष को सदन को गुमराह नहीं करना चाहिए।

क्या है FCRA Amendment Bill 2026?

FCRA Amendment Bill 2026 का उद्देश्य विदेशी योगदान प्राप्त करने वाले संगठनों के लिए नियामकीय व्यवस्था को और मजबूत करना है। प्रस्तावित बदलावों में ऐसे मामलों से जुड़े प्रावधान शामिल हैं, जहां किसी संगठन का FCRA पंजीकरण रद्द, समाप्त या सरेंडर हो जाता है। ऐसे मामलों में विदेशी अंशदान से हासिल संपत्तियों के प्रबंधन और नियंत्रण के लिए एक नामित प्राधिकरण की व्यवस्था प्रस्तावित है। विधेयक को अब JPC के पास भेजे जाने के बाद समिति इसके प्रावधानों की समीक्षा करेगी और अपनी रिपोर्ट संसद के सामने रखेगी। विपक्ष की आपत्तियों और सरकार के तर्कों के बीच अब इस बिल पर आगे की प्रक्रिया JPC की समीक्षा के बाद तय होगी।


अमित शाह का विपक्ष को चैलेंज- ‘चर्चा के लिए तैयार’, राहुल गांधी बोले- ‘लेक्चर नहीं सुनना’

संसद के मानसून सत्र में छात्रों के प्रदर्शन, कथित पुलिस कार्रवाई और परीक्षा में अनियमितताओं को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच टकराव जारी है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष को चर्चा की चुनौती देते हुए कहा कि सरकार हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है और वह खुद छात्रों से जुड़े सवालों का जवाब देंगे। वहीं, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने अमित शाह के बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि उन्हें ‘लेक्चर’ नहीं सुनना है, बल्कि छात्रों पर हुई कार्रवाई को लेकर जवाब चाहिए।

अमित शाह ने कहा- सरकार हर सवाल का जवाब देगी

अमित शाह ने विपक्ष से संसद की कार्यवाही चलने देने की अपील की। उन्होंने कहा कि सरकार किसी भी मुद्दे पर चर्चा से पीछे नहीं हट रही है। उनके मुताबिक, विपक्ष को लोकसभा अध्यक्ष को चर्चा के लिए नोटिस देना चाहिए और तय प्रक्रिया के तहत इस मुद्दे पर विस्तार से बहस होनी चाहिए। गृह मंत्री ने कहा कि सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि वह खुद चर्चा में मौजूद रहेंगे और छात्रों के प्रदर्शन, परीक्षा से जुड़े सवालों समेत विपक्ष की ओर से उठाए जाने वाले मुद्दों का जवाब देंगे। सरकार का कहना है कि संसद में किसी भी गंभीर विषय पर निर्धारित नियम और प्रक्रिया के तहत विस्तृत चर्चा होती है। केवल बयानबाजी के बजाय चर्चा के दौरान सरकार अपना पक्ष रखने के लिए तैयार है।

NEET और छात्र प्रदर्शन को लेकर विपक्ष हमलावर

विपक्ष NEET और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के साथ-साथ दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई का मुद्दा लगातार उठा रहा है। संसद के मानसून सत्र की शुरुआत से ही इस मामले को लेकर दोनों सदनों में हंगामा देखने को मिला है। बता दें कि 2026 में केंद्र ने सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों पर रोक से जुड़े कानून में संशोधन वाला विधेयक भी लोकसभा में पारित कराया है। सरकार का दावा है कि नए प्रावधान परीक्षा में गड़बड़ी करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करेंगे।

राहुल गांधी का अमित शाह पर पलटवार

अमित शाह के चर्चा के प्रस्ताव पर राहुल गांधी ने तीखा पलटवार किया। राहुल ने कहा कि युवाओं को भाषण या लेक्चर नहीं, बल्कि अपने सवालों के जवाब चाहिए। राहुल गांधी ने छात्रों पर कथित बल प्रयोग को लेकर गृह मंत्री से जवाबदेही तय करने की मांग दोहराई। उन्होंने आरोप लगाया कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ पैलेट गन और कीलों वाली लाठियों का इस्तेमाल किया गया। राहुल गांधी ने यह भी सवाल उठाया कि यदि छात्रों पर पैलेट गन चलाने की अनुमति दी गई थी तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है। उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग तक की है।

पैलेट गन के आरोप पर सरकार का क्या कहना है?

इस पूरे विवाद में सबसे अहम मुद्दा पैलेट गन के इस्तेमाल का है। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर पैलेट गन से हमला किया गया और एक छात्र की आंख को गंभीर नुकसान पहुंचने का खतरा है। हालांकि, सरकार और बीजेपी ने इन आरोपों को खारिज किया है। केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में कहा कि दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने पैलेट गन या गोलीबारी का इस्तेमाल नहीं किया और केवल आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया। दिल्ली पुलिस की ओर से भी राहुल गांधी के आरोपों पर तथ्य-जांच की बात सामने आई है। ऐसे में पैलेट गन के इस्तेमाल का दावा फिलहाल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का हिस्सा है और इस पर दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग हैं।

संसद में आगे क्या होगा?

सरकार चर्चा के लिए तैयार होने की बात कह रही है, जबकि विपक्ष छात्रों से जुड़े मुद्दों पर सरकार से जवाबदेही और कार्रवाई की मांग कर रहा है। ऐसे में अब निगाहें संसद में होने वाली संभावित चर्चा पर हैं। अगर चर्चा होती है तो NEET और परीक्षा व्यवस्था में कथित गड़बड़ियों के अलावा जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई भी बहस का प्रमुख मुद्दा बन सकती है।


रांची में छात्रों का विधानसभा घेराव, बैरिकेडिंग तोड़कर आगे बढ़े प्रदर्शनकारी

रांची: झारखंड की राजधानी रांची में भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और छात्रों की विभिन्न मांगों को लेकर चल रहा आंदोलन सोमवार को और तेज हो गया। रविवार को राज्य सरकार की विशेष कमेटी और प्रदर्शन कर रहे छात्र प्रतिनिधियों के बीच करीब पांच घंटे तक तीन दौर में बातचीत हुई, लेकिन किसी ठोस समाधान पर सहमति नहीं बन सकी। इसके बाद छात्र संगठनों ने सोमवार, 10 अगस्त को पहले से घोषित विधानसभा घेराव का कार्यक्रम जारी रखने का फैसला किया... छात्र संगठनों ने प्रदर्शनकारियों से किसी भी तरह की अफवाह या बहकावे में नहीं आने की अपील की थी। सोमवार सुबह बड़ी संख्या में छात्र पुरानी विधानसभा के पास जुटे, जहां से नई विधानसभा की ओर मार्च शुरू किया गया। प्रदर्शनकारी अपनी मांगों को लेकर नारेबाजी करते हुए विधानसभा की तरफ बढ़े...प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए प्रशासन ने विधानसभा के आसपास सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए थे। रास्ते में बैरिकेडिंग के साथ कंटीले तार भी लगाए गए थे। कई जगह प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव की स्थिति बनी और छात्रों ने बैरिकेडिंग पार कर आगे बढ़ने की कोशिश की।

पुलिस ने किया लाठीचार्ज, आंसू गैस और वाटर कैनन का इस्तेमाल

विधानसभा की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों को रोकने के दौरान पुलिस ने वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। कुछ स्थानों पर लाठीचार्ज और आंसू गैस के इस्तेमाल की भी खबर सामने आई। इसके बाद प्रदर्शन स्थल पर कुछ समय के लिए अफरा-तफरी की स्थिति बनी.. इसके बावजूद बड़ी संख्या में छात्र विधानसभा के गेट के पास तक पहुंच गए। मौके पर भारी पुलिस बल तैनात रहा और प्रदर्शनकारी अपनी मांगों पर अड़े रहे.... छात्रों का यह आंदोलन मुख्य रूप से JPSC और JSSC से जुड़ी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, भर्ती प्रक्रिया और परीक्षा व्यवस्था को लेकर है। प्रदर्शनकारी कई परीक्षाओं को रद्द करने और कथित गड़बड़ियों की स्वतंत्र जांच की मांग कर रहे हैं।
आंदोलन से जुड़े छात्र नेताओं का कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर सरकार की ओर से ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा.........

छात्र नेता बोले- अब बातचीत नहीं

प्रदर्शन के दौरान छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि अब सरकार के साथ कोई बातचीत नहीं होगी। उन्होंने सरकार को लेकर तीखी टिप्पणी की और आंदोलन जारी रखने की बात कही..... वहीं प्रदर्शन में शामिल कुछ छात्रों ने भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के कारण नियुक्ति और जॉइनिंग में हो रही देरी का मुद्दा भी उठाया। उनका कहना है कि परीक्षाएं और प्रमाणपत्र सत्यापन पूरा होने के बावजूद कई अभ्यर्थियों को अब तक नियुक्ति नहीं मिल पाई है। छात्र आंदोलन के बीच झारखंड CID ने JPSC के पूर्व चेयरमैन एल. खियांगते को कथित भर्ती अनियमितताओं के मामले में गिरफ्तार किया है। इस कार्रवाई के बाद आंदोलन को लेकर सियासी और प्रशासनिक हलकों में भी हलचल बढ़ गई है। फिलहाल रांची में विधानसभा के आसपास सुरक्षा व्यवस्था कड़ी है और छात्र संगठनों का प्रदर्शन जारी है। आंदोलनकारियों और सरकार के बीच बातचीत से कोई समाधान नहीं निकलने के बाद अब टकराव की स्थिति ने सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी 


चंदा चोरी पर राहुल-खड़गे ने PM मोदी को लिखा पत्र, स्वतंत्र जांच की मांग

नई दिल्ली: अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे और दान की कथित हेराफेरी को लेकर सियासी विवाद और तेज हो गया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मामले में स्वतंत्र और व्यापक जांच कराने की मांग की है। दोनों नेताओं ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री की कथित चुप्पी को लेकर भी सवाल उठाए हैं। राहुल गांधी और खड़गे ने अपने संयुक्त पत्र में कहा कि राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा आस्था और विश्वास के साथ दिए गए दान में कथित चोरी की खबरों ने लोगों का भरोसा प्रभावित किया है। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि इस मामले में जवाबदेही तय करना और नुकसान की भरपाई सुनिश्चित करना जरूरी है। उन्होंने प्रधानमंत्री से इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की। कांग्रेस नेताओं ने जांच को निष्पक्ष रखने के लिए स्वतंत्र जांच कराने और जांच के निष्कर्षों को सार्वजनिक करने की मांग की है। उनका कहना है कि श्रद्धालुओं को यह स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए कि मंदिर में आने वाले दान और चढ़ावे की व्यवस्था में कथित गड़बड़ी कैसे हुई और इसके लिए कौन जिम्मेदार है।

क्या है राम मंदिर चढ़ावा विवाद?

मामला उस समय सामने आया जब मंदिर में दान के रूप में आने वाली नकदी और अन्य कीमती वस्तुओं की कथित हेराफेरी के आरोप लगे। उत्तर प्रदेश सरकार ने मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय विशेष जांच दल यानी SIT गठित किया था। SIT ने जून में अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। रिपोर्ट में दान की रकम और कीमती वस्तुओं की निगरानी, रखरखाव और गिनती की प्रक्रिया में कथित लापरवाही और निगरानी की कमी की बात सामने आई थी। इसके बाद अयोध्या पुलिस ने आठ लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की। आरोपों में दान की रकम और कीमती वस्तुओं की चोरी, गबन और हेराफेरी शामिल है। पुलिस ने सभी आठ आरोपियों को गिरफ्तार किया था। जांच आगे बढ़ने के साथ करीब 30 अन्य कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आने की खबर सामने आई। इनमें कई कर्मचारी मंदिर में चढ़ावे की नकदी गिनने के काम से जुड़े थे।

सुप्रीम कोर्ट ने भी मांगी SIT रिपोर्ट

मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी उत्तर प्रदेश की SIT से जांच की स्थिति बताने वाली रिपोर्ट मांगी है। अदालत ने SIT की संरचना और जांच की प्रगति से जुड़ी जानकारी भी मांगी है और राम मंदिर ट्रस्ट को नोटिस जारी किया है। ऐसे में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे का प्रधानमंत्री को पत्र लिखना इस पूरे मामले को संसद और राष्ट्रीय राजनीति में और बड़ा मुद्दा बना सकता है। कांग्रेस लगातार मंदिर के चढ़ावे की कथित हेराफेरी पर सरकार और ट्रस्ट से जवाबदेही की मांग कर रही है, जबकि जांच एजेंसियां मामले में अपनी कार्रवाई आगे बढ़ा रही हैं।


ढाई साल में कैसे खत्म होता गया अतीक अहमद का कुनबा, असद से आबान तक... जानिए कौन जिंदा,

माफिया डॉन और पूर्व सांसद अतीक अहमद, जिसका नाम कभी उत्तर प्रदेश के सबसे खौफनाक अपराधियों में लिया जाता था. आज उसका पूरा परिवार लगातार त्रासदियों और कानूनी कार्रवाई के बीच बिखरता जा रहा है। साल 2023 में बेटे असद का एनकाउंटर... फिर पुलिस हिरासत में अतीक और अशरफ की हत्या और अब सड़क हादसे में छोटे बेटे आबान अहमद की मौत। क्या है अतीक अहमद के परिवार पर पिछले तीन साल में आई मौतों और घटनाओं की पूरी टाइमलाइन

24 फरवरी २०२३

प्रयागराज में बसपा विधायक रहे राजू पाल हत्याकांड के मुख्य गवाह उमेश पाल और उनके दो सरकारी गनर की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई थी. इस हत्याकांड का आरोप अतीक अहमद और उसके गैंग पर लगा. इसके बाद उत्तर प्रदेश पुलिस और एसटीएफ ने आरोपियों के खिलाफ बड़ा अभियान शुरू किया. इसी कार्रवाई ने अतीक के पूरे आपराधिक नेटवर्क को झकझोर कर रख दिया और अगले कुछ महीनों में कई अहम घटनाएं सामने आईं.

27 फरवरी २०२३

उमेश पाल हत्याकांड के महज तीन दिन बाद प्रयागराज पुलिस ने आरोपी अरबाज़ को नेहरू पार्क के पास घेर लिया. पुलिस का दावा था कि उसने पुलिस टीम पर फायरिंग की, जिसके जवाब में हुई मुठभेड़ में वह मारा गया. जांच एजेंसियों के मुताबिक, उमेश पाल हत्याकांड में इस्तेमाल की गई क्रेटा कार वही चला रहा था. इस एनकाउंटर के बाद पुलिस ने अन्य आरोपियों की तलाश और तेज कर दी. अरबाज़ अतीक के परिवार का बहुत करीबी था
उमेश पाल हत्याकांड का एक और आरोपी विजय चौधरी उर्फ उस्मान भी 6 मार्च 2023 को पुलिस मुठभेड़ में मारा गया. पुलिस का दावा था कि उसी ने उमेश पाल पर पहली गोली चलाई थी. उस पर भी इनाम घोषित था. इस कार्रवाई के बाद पुलिस का फोकस सीधे अतीक अहमद के परिवार और उसके करीबी शूटरों पर आ गया.

13 अप्रैल २०२३

करीब 50 दिनों तक फरार रहने के बाद अतीक अहमद के तीसरे बेटे असद अहमद और उसके साथी गुलाम को उत्तर प्रदेश एसटीएफ ने झांसी में घेर लिया. पुलिस के मुताबिक दोनों ने टीम पर फायरिंग की, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई में दोनों मारे गए. असद पर पांच लाख रुपये का इनाम घोषित था और उसे उमेश पाल हत्याकांड का मुख्य आरोपी माना गया था. मौके से विदेशी पिस्टल, कारतूस और मोटरसाइकिल भी बरामद की गई थी.
एसटीएफ की इसी कार्रवाई में असद का करीबी साथी गुलाम भी मारा गया. पुलिस के अनुसार वह भी उमेश पाल हत्याकांड का प्रमुख आरोपी था और लंबे समय से फरार चल रहा था. उस पर भी पांच लाख रुपये का इनाम घोषित था. असद और गुलाम के एनकाउंटर ने पूरे मामले को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया था.

15 अप्रैल २०२३

असद के एनकाउंटर के दो दिन बाद 15 अप्रैल 2023 की रात प्रयागराज में सबसे सनसनीखेज वारदात हुई. पुलिस अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ अहमद को मेडिकल जांच के लिए कॉल्विन अस्पताल ले जा रही थी. दोनों हथकड़ी में थे और मीडिया के कैमरे लाइव कवरेज कर रहे थे. तभी पत्रकार बनकर भीड़ में घुसे तीन हमलावरों ने बेहद करीब से दोनों पर ताबड़तोड़ गोलियां चला दीं. कुछ ही सेकेंड में अतीक और अशरफ की मौके पर मौत हो गई. पूरी घटना कैमरों में कैद हुई और देशभर में सुर्खियां बनी. अतीक और अशरफ की हत्या के तुरंत बाद पुलिस ने तीनों हमलावरों को गिरफ्तार कर लिया. उनकी पहचान लवलेश तिवारी, अरुण मौर्य और सनी सिंह के रूप में हुई. पुलिस जांच में सामने आया कि तीनों पहले भी आपराधिक मामलों में शामिल रहे थे. इस हाई-प्रोफाइल हत्याकांड की जांच के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने न्यायिक आयोग का गठन भी किया था.

सड़क हादसे में आबान की मौत

अतीक अहमद के परिवार पर मौत का सिलसिला यहीं नहीं रुका. अब उसके बेटे आबान की सड़क हादसे में मौत हो गई. बताया गया कि हादसे के समय वह जेल में बंद अपने भाई अली अहमद से मिलने जा रहा था. साल 2023 में आबान और उसका भाई एहजम, दोनों नाबालिग थे. अतीक और शाइस्ता के खिलाफ कार्रवाई के बाद उन्हें बाल संरक्षण गृह में रखा गया था. बाद में अक्टूबर 2023 में दोनों रिहा हुए और परिजनों के साथ रहने लगे थे.

अतीक के परिवार में अब कौन-कौन बचा?

अतीक अहमद की पत्नी शाइस्ता परवीन अब भी उमेश पाल हत्याकांड में वांछित मानी जाती हैं और लंबे समय से फरार हैं. अतीक का बड़ा बेटा उमर अहमद लखनऊ जेल में न्यायिक हिरासत में है, जबकि अली अहमद नैनी सेंट्रल जेल में बंद है. तीसरे बेटे असद अहमद की अप्रैल 2023 में एनकाउंटर में मौत हो चुकी है. चौथे बेटे आबान की अब सड़क हादसे में जान चली गई है. सबसे छोटे बेटे एहजम के बारे में जानकारी है कि वह अक्टूबर 2023 में बाल संरक्षण गृह से रिहा होने के बाद अपनी बुआ के साथ रह रहा है.

टूटता गया अतीक अहमद का कुनबा

पिछले तीन वर्षों की घटनाओं पर नजर डालें तो साफ है कि अतीक अहमद का परिवार लगातार बड़े झटकों से गुजरता रहा है. पहले पुलिस कार्रवाई में बेटे की मौत, फिर पुलिस हिरासत में खुद अतीक और उसके भाई की हत्या, और अब सड़क हादसे में बेटे आबान की मौत ने इस परिवार को लगभग पूरी तरह बिखेर दिया है. फिलहाल परिवार के कुछ सदस्य जेल में हैं, एक सदस्य फरार है और कुछ पर अलग-अलग मामलों की कानूनी कार्रवाई अब भी जारी है.


एक्ट्रेस तृषा कृष्णन पर विवादित टिप्पणी मामले में उदयनिधि स्टालिन गिरफ्तार, DMK ने बताया बदले की कार्रवाई

by न्यूज डेस्क

चेन्नई: तमिलनाडु विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और डीएमके (DMK) नेता उदयनिधि स्टालिन को मंगलवार को पुलिस ने हिरासत में लेकर गिरफ्तार कर लिया। यह कार्रवाई अभिनेत्री तृषा कृष्णन से जुड़े कथित आपत्तिजनक बयान और मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय पर की गई टिप्पणियों के बाद दर्ज एफआईआर के आधार पर की गई। मामले ने राज्य की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है।

क्या है पूरा मामला?

विवाद की शुरुआत सोमवार को तंजावुर में कावेरी जल विवाद को लेकर आयोजित एक रैली से हुई। रैली के दौरान उदयनिधि स्टालिन मुख्यमंत्री विजय की सरकार पर हमला बोल रहे थे। इसी बीच भीड़ से अभिनेत्री तृषा कृष्णन के नाम के नारे लगे। आरोप है कि इसके जवाब में उदयनिधि ने एक ऐसी टिप्पणी की, जिसे विपक्षी दलों ने डबल मीनिंग और महिलाओं का अपमान करने वाला बताया। इसके बाद शिकायत दर्ज कराई गई और पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया।  हालांकि उदयनिधि स्टालिन ने सफाई देते हुए कहा कि उनका इशारा किसी व्यक्ति की ओर नहीं, बल्कि कावेरी नदी के पानी की ओर था। उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज मामले को "झूठा" बताते हुए आरोप लगाया कि यह कार्रवाई राजनीतिक बदले की भावना से की जा रही है।

अग्रिम जमानत की याचिका, फिर गिरफ्तारी

गिरफ्तारी की आशंका के बीच उदयनिधि स्टालिन ने मद्रास हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दायर की थी। अदालत ने याचिका पर तत्काल सुनवाई के लिए सहमति जताई थी और पुलिस से जल्दबाजी में कार्रवाई नहीं करने की मौखिक टिप्पणी भी की थी। इसके बावजूद पुलिस ने उन्हें हिरासत में लेकर पूछताछ के लिए तंजावुर ले गई।

सरकार ने कोर्ट में क्या कहा?

मद्रास हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार की ओर से कहा गया कि उदयनिधि स्टालिन को न्यायिक हिरासत (रिमांड) में भेजने का इरादा नहीं है। सरकारी पक्ष ने अदालत को बताया कि पूछताछ पूरी होने के बाद उन्हें स्टेशन बेल पर रिहा कर दिया जाएगा। 

वहीं DMK ने गिरफ्तारी को राजनीतिक प्रतिशोध करार दिया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि उदयनिधि स्टालिन ने अपने भाषण में अभिनेत्री तृषा का नाम नहीं लिया था और उनके बयान को गलत संदर्भ में पेश किया गया। पार्टी का आरोप है कि विपक्ष की आवाज दबाने के लिए सरकार इस तरह की कार्रवाई कर रही है। फिलहाल मामले की जांच जारी है और आगे की कानूनी प्रक्रिया मद्रास हाईकोर्ट और पुलिस की कार्रवाई के आधार पर आगे बढ़ेगी।


चढ़ावा चोरी पर संसद में हंगामा, लोकसभा शुरू होते ही 2 बजे तक स्थगित

नई दिल्ली। संसद के मानसून सत्र के 12वें दिन मंगलवार को राम मंदिर चढ़ावा से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितता के मुद्दे पर विपक्ष और सरकार के बीच तीखी तनातनी देखने को मिली। कार्यवाही शुरू होने से पहले विपक्षी दलों के सांसदों ने संसद परिसर के मकर द्वार पर प्रदर्शन किया और सरकार से मामले में जवाब की मांग की। प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा समेत कई विपक्षी नेताओं ने नारेबाजी की। 

सुबह 11 बजे जैसे ही लोकसभा की कार्यवाही शुरू हुई, विपक्षी सांसद अपने स्थानों से उठकर सदन के वेल में पहुंच गए और राम मंदिर चढ़ावा मामले पर चर्चा की मांग करते हुए नारे लगाने लगे। लगातार शोर-शराबे के कारण सदन की कार्यवाही सामान्य रूप से नहीं चल सकी। हंगामा बढ़ने पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने महज तीन मिनट के भीतर कार्यवाही दोपहर 2 बजे तक के लिए स्थगित कर दी। वहीं, राज्यसभा में भी इसी मुद्दे को लेकर विपक्ष ने सरकार को घेरने की कोशिश की। विपक्षी सांसदों ने चढ़ावे से जुड़े कथित मामले पर सरकार से स्पष्टीकरण और विस्तृत चर्चा की मांग उठाई। हंगामे के बीच उच्च सदन की कार्यवाही जारी रही, हालांकि कई बार व्यवधान भी देखने को मिला। 

दूसरी ओर, संसद परिसर स्थित जीएमसी बालयोगी ऑडिटोरियम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में एनडीए संसदीय दल की साप्ताहिक 'मंगल मिलन' बैठक आयोजित हुई। बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह तथा एनडीए के अन्य वरिष्ठ नेता और सांसद शामिल हुए। बैठक में संसद के मौजूदा सत्र और विभिन्न विधायी कार्यों को लेकर रणनीति पर चर्चा हुई।


दिल्ली में बिहार के एक युवक की हत्या के बाद राजनीतिक पारा चढ़ गया है।

by newsdesk

दिल्ली में बिहार के एक युवक की हत्या के बाद राजनीतिक पारा चढ़ गया है। विपक्ष ने इस घटना को लेकर केंद्र, दिल्ली और बिहार सरकार तीनों को घेरा है। 

आज कांग्रेस सड़क पर उतरी। प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम के नेतृत्व में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने जोरदार प्रदर्शन किया और सरकार विरोधी नारे लगाए। 

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम ने कहा कि युवक से बिहार का होने का सवाल पूछकर की गई हत्या सिर्फ एक शख्स की हत्या नहीं, बल्कि बिहारियों के सम्मान और अस्मिता पर हमला है। इसी के विरोध में कांग्रेस सड़कों पर है। 

राजेश राम ने केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी और चिराग पासवान से भी इस मुद्दे पर चुप्पी तोड़ने की मांग की। 

वरिष्ठ नेता शकील अहमद खान ने भी सरकार को घेरते हुए दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की। 


अमित शाह ने बिहार में किससे किया था बड़ा बाबू बनाने का वादा विजय सिन्हा ही नहीं मंत्री पद की रेस में कई और बड़े भूमिहार नेता

by newsdesk

दरभंगा जिले का जाले विधानसभा क्षेत्र एक मुस्लिम बहुल सीट के रूप में जाना जाता है, जहाँ भारतीय जनता पार्टी के लिए जीत हासिल करना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। यह भी कहा जाता है कि यहाँ के इतिहास में  कोई विधायक लगातार दूसरी बार जीत दर्ज नहीं कर पाया लेकिन जीवेश कुमार लगातार तीसरी बार जीत दर्ज कर ये कारनामा कर चुके हैं। तीसरी बार जाले से चुनाव मैदान में उतरे पूर्व मंत्री जीवेश मिश्रा के लिए चुनाव प्रचार करने दरभंगा आए अमित शाह को भी कहना पड़ा कि आप जीवेश कुमार को तीसरी बार जीताकर सदन में भेजेंगे तो हम इन्हें और बड़ा बनाएंगे। 
 
जाले में जीत बीजेपी के लिए हमेशा बड़ी चुनौती रहा है लेकिन कठिन ऐसे कठिन राजनीतिक समीकरणों के बीच जीवेश कुमार ने अपनी मजबूत पकड़ और कुशल नेतृत्व का परिचय देते हुए जाले में लगातार तीसरी बार कमल खिलाकर एक नया इतिहास रच दिया। जीवेश कुमार पेशे से एक वकील हैं,  और एक विद्वान तथा प्रभावशाली वक्ता के रूप में अपनी पहचान रखते हैं। उनके नेतृत्व और लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब अमित शाह जाले में चुनावी सभा को संबोधित करने पहुँचे, तो उन्होंने मंच से ही लोगों के उत्साह को देखते हुए कहा—“जीवेश बाबू को जिताइए, इन्हें बड़ा बाबू बनाएंगे।”
 भूमिहार समाज में वे एक सशक्त और स्थापित नेता के रूप में जाने जाते हैं। साथ ही, उन्हें एक कुशल संगठनकर्ता के रूप में भी जाना जाता है। पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने बिहार की सभी 40 सीटों पर संयोजक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जहाँ उनकी मॉनिटरिंग सीधे केंद्रीय नेतृत्व द्वारा की जा रही थी। सदस्यता अभियान में भी उन्हें बिहार प्रदेश का प्रभारी बनाया गया, और उनके नेतृत्व में रिकॉर्ड सदस्यता दर्ज की गई। उनकी राजनीतिक यात्रा छात्र जीवन से ही शुरू हुई, जब वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सक्रिय कार्यकर्ता रहे। उनके पारिवारिक पृष्ठभूमि में भी संगठन की मजबूत जड़ें रही हैं। उनके पिता जिला संघ चालक रह चुके हैं। सरकार में रहते हुए जीवेश कुमार ने कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली है। श्रम मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल में बिहार, उत्तर प्रदेश के बाद ई-श्रम कार्ड बनाने वाला देश का दूसरा राज्य बना। उन्होंने श्रमिकों के भुगतान की ऑफलाइन व्यवस्था को ऑनलाइन कर दिया, जिससे बिहार देश में सबसे कम समय में श्रमिकों का भुगतान करने वाला राज्य बना। इसके साथ ही, छात्रों के हित में उन्होंने टाटा टेक्नोलॉजी के सहयोग से लगभग 5000 करोड़ रुपये के निवेश द्वारा 149 आईटीआई संस्थानों को सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के रूप में विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की। आईटी मंत्री के रूप में उन्होंने विभाग को पेपरलेस बनाने की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया। खान एवं भूतत्व विभाग में रहते हुए उन्होंने K लाइसेंस जारी कर राज्य में रोजगार सृजन को बढ़ावा दिया। पर्यटन मंत्री के रूप में उन्होंने पटना में फाइव-स्टार होटल की रूपरेखा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहीं, शहरी विकास मंत्री के रूप में उन्होंने पटना मेट्रो परियोजना की शुरुआत कर राज्यवासियों को एक बड़ी सौगात दी। अपनी कार्यशैली, त्वरित निर्णय क्षमता और परिणामोन्मुख दृष्टिकोण के कारण उन्हें सरकार में “टास्क मास्टर” के रूप में भी जाना जाता है। जाले के लोगों को भी उम्मीद है कि गृहमंत्री अपना वादा निभाएंगे और जीवेश कुमार को मंत्री बनाएंगे। 


नीतीश कुमार 30 मार्च को बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देंगे, राज्यसभा जाने के बाद नई सरकार पर देंगे पूर्ण सहयोग

समृद्धि यात्रा के दौरान विकास कार्यों की समीक्षा जारी, बेटे निशांत कुमार JD(U) में शामिल; BJP को मिल सकता है पहला मुख्यमंत्री

by KhabarCafe

पटना: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 30 मार्च 2026 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे देंगे। 16 मार्च को राज्यसभा के लिए निर्विरोध चुने जाने के बाद नियम के अनुसार उन्हें 14 दिनों के अंदर इस्तीफा देना है। नीतीश कुमार ने कहा है कि नई सरकार को उनका पूरा सहयोग और मार्गदर्शन मिलता रहेगा।

नीतीश कुमार ने 5 मार्च को राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया था। उन्होंने बिहार की जनता को भावुक संदेश देते हुए कहा, "बीस वर्षों तक आपने मुझे विश्वास दिया, अब राज्यसभा जाना मेरा पुराना इच्छा पूरी करेगा।" उन्होंने स्पष्ट किया कि वे बिहार नहीं छोड़ रहे हैं और दिल्ली-बिहार दोनों जगह समय बांटकर विकास कार्यों में सक्रिय रहेंगे।

समृद्धि यात्रा जारी राज्यसभा चुनाव जीतने के अगले दिन नीतीश कुमार ने समृद्धि यात्रा के चौथे चरण की शुरुआत की। भगलपुर और बांका में उन्होंने 641 परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया, जिनकी कुल लागत 1151 करोड़ रुपये है। नालंदा में समीक्षा बैठक की और अधिकारियों को निर्देश दिया कि सभी विकास और कल्याणकारी योजनाओं को तेजी से पूरा करें तथा लाभार्थियों तक पहुंच सुनिश्चित करें।

निशांत कुमार का JD(U) में प्रवेश नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार ने 8 मार्च को पटना में जनता दल (यूनाइटेड) की सदस्यता ग्रहण की। उन्होंने पिता की दो दशक से अधिक की नेतृत्व क्षमता की सराहना की। पार्टी सूत्रों के अनुसार निशांत कुमार को नई सरकार में उपमुख्यमंत्री बनाए जाने की संभावना है। JD(U) ने स्पष्ट किया है कि नीतीश कुमार 2030 तक पार्टी और सरकार का मार्गदर्शन करते रहेंगे।

राजनीतिक बदलाव नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री बनने की संभावना है। वर्तमान डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी को अगले मुख्यमंत्री के रूप में सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है। NDA सरकार नई व्यवस्था में भी नीतीश कुमार के मार्गदर्शन में काम करती रहेगी।

विपक्षी RJD ने इस बदलाव पर सवाल उठाए हैं और NDA पर 'परिवारवाद' का आरोप लगाया है, खासकर निशांत कुमार के राजनीतिक प्रवेश के बाद।

संक्षेप में: नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद से जाना बिहार की राजनीति में एक बड़े परिवर्तन का संकेत है। वे विकास कार्यों पर फोकस बनाए रखते हुए राज्यसभा में बिहार का प्रतिनिधित्व करेंगे। नई सरकार के गठन और निशांत कुमार की भूमिका पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।


यूपी में SIR अभियान पूरा, 3.26 करोड़ मतदाताओं की जांच हो चुकी; 10 अप्रैल को जारी होगी फाइनल वोटर लिस्ट

12.55 करोड़ से बढ़कर 13.25 करोड़ से अधिक वोटर होने की संभावना; 97% नाम बरकरार रहने की उम्मीद, बिना सुनवाई के कोई नाम नहीं कटेगा

by KhabarCafe

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में मुख्य निर्वाचन आयोग के विशेष intensive revision (SIR) अभियान के तहत 3.26 करोड़ मतदाताओं की सुनवाई और जांच पूरी कर ली गई है। चुनाव आयोग ने दावा किया है कि सभी जारी नोटिसों पर 100 प्रतिशत कार्रवाई की गई है। अब अंतिम मतदाता सूची 10 अप्रैल 2026 को जारी की जाएगी, जिसमें 13.25 करोड़ से अधिक वोटरों के नाम होने की संभावना है।

इससे पहले पुरानी वोटर लिस्ट में 12.55 करोड़ मतदाताओं के नाम दर्ज थे। SIR प्रक्रिया के दौरान एक करोड़ से अधिक नाम 2003 की पुरानी सूची से मिलान नहीं होने के कारण चिन्हित किए गए थे, जबकि दो करोड़ से अधिक नामों में लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी पाई गई थीं।

मुख्य आंकड़े:

  • 2.22 करोड़ मामलों में ब्लॉक लेवल अधिकारी (BLO) ने घर-घर जाकर सत्यापन किया
  • नए नाम जोड़ने के लिए 86.69 लाख आवेदन प्राप्त हुए
  • नाम काटने के लिए 3.18 लाख आवेदन आए
  • 97 प्रतिशत से अधिक नाम सूची में बने रहने की उम्मीद है

आयोग ने प्रक्रिया को मतदाता-अनुकूल बनाने के लिए विशेष इंतजाम किए थे। दस्तावेज मांगने वाले नोटिस पर घर के पास ही सुनवाई का प्रबंध किया गया। मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने स्पष्ट किया कि बिना उचित प्रक्रिया और सुनवाई के किसी भी मतदाता का नाम सूची से नहीं काटा जाएगा। पूरी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से पूरी की गई है।

SIR अभियान का उद्देश्य मतदाता सूची को स्वच्छ, सटीक और अपडेट रखना है। इसमें डुप्लिकेट, मृत, स्थानांतरित या अयोग्य मतदाताओं को हटाया जाएगा और योग्य नए मतदाताओं को शामिल किया जाएगा।

राजनीतिक प्रतिक्रिया: SIR प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों ने लगातार संदेह जताया है। उनका आरोप है कि जानबूझकर उनके समर्थकों के नाम काटे जा रहे हैं। अब 10 अप्रैल को फाइनल लिस्ट जारी होने के बाद दावों और आपत्तियों का नया दौर शुरू हो सकता है।

संक्षेप में: चुनाव आयोग SIR अभियान को सफल बताते हुए कह रहा है कि यह प्रक्रिया मतदाता सूची को और अधिक शुद्ध और विश्वसनीय बनाने के लिए की गई है। अंतिम सूची के प्रकाशन के बाद ही वास्तविक स्थिति साफ हो पाएगी।

(अपडेट: 28 मार्च 2026 — उत्तर प्रदेश मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के अनुसार)

यह संस्करण मूल समाचार को अधिक संरचित, स्पष्ट और संतुलित बनाते हुए सभी महत्वपूर्ण आंकड़ों और बिंदुओं को शामिल करता है।


बिहार के सीएम बनने से पहले दूल्हा बन सकते हैं तेजस्वी यादव, इनसे करेंगे शादी

लालू प्रसाद यादव जेल से बाहर आते ही छोटे बेटे की शादी कराना चाहते हैं और बेटे की राजनीतिक पारी की चिंता वो बाद में करेंगे.

पटना/नई दिल्ली: बिहार में डिप्टी सीएम रह चुके तेजस्वी यादव की शादी की चर्चाएं चल रही हैं. सूत्रों का कहना है कि लालू प्रसाद यादव जेल से बाहर आते ही छोटे बेटे की शादी कराना चाहते हैं और बेटे की राजनीतिक पारी की चिंता वो बाद में करेंगे. बता दें कि लालू प्रसाद यादव को सीबीआई कोर्ट से भी जमानत मिल चुकी है. 

सूत्रों के मुताबिक लालू प्रसाद को तेजस्वी यादव की बहुत चिंता है. उन्होंने जिस तरह तेजस्वी का राजनीतिक कॅरियर बनाया, उसी जिम्मेदार अभिभावक की तरह बाहर आते ही तेजस्वी की शादी फाइनल करने में लग जाएंगे. हालांकि लालू यादव अभी एम्स में रहकर अपना इलाज करा रहे हैं. 

कई जगहों पर चल रही है बात
सूत्रों का कहना है कि तेजस्वी की शादी को लेकर ४-५ जगहों पर बातचीत चल रही है. जल्द ही कोई एक लड़की फाइनल कर ली जाएगी. इसमें एक नाम लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक करीबी का भी आ रहा है. 

राबड़ी देवी ने किया था मजाक
बता दें कि कुछ माह पहले राबड़ी देवी ने कहा था कि नीतीश कुमार के पुत्र निशांत और रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान की शादी पहले होनी चाहिए. इन दोनों के कारण ही तेजस्वी की शादी रुकी हुई है, लेकिन यह बयान राबड़ी देवी ने मजाकिया लहजे में दे दिया था.


Exit Polls : तमिलनाडु में डीएमके के हाथ बागडोर, AIDMK का बुरा हाल, केरल और पुडेचेरी का भी जानिए मिजाज

एग्जिट पोल्स की मानें तो इस बार तमिलनाडु में सत्ता बदलती हुई दिख रही है।



चेन्नई: तमिलनाडु में उम्मीदवारों की किस्मत और सत्ता की चाबी EVM में बंद हो चुकी है और ताला 2 मई को मतगणना के बाद खुलेगा। हालांकि एग्जिट पोल्स की मानें तो इस बार राज्य में सत्ता बदलती हुई दिख रही है। टीवी9-पोलस्ट्रैट के सर्वे के मुताबिक इसबार भारी बहुमत के साथ द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम यानी DMK सरकार बनाते हुए दिख रही है। सर्वे के मुताबिक एम. के स्टालिन के नेतृत्व में DMK राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बन रही है।

वहीं सर्वे में सत्तारूढ़ AIDMK के हाथ से सत्ता फिसलते हुए दिख रही है। टीवी9-पोलस्ट्रैट सर्वे के मुताबिक फिलहाल राज्य की सत्ता में काबिज AIDMK को महज 75 से 85 सीटें ही मिल रही हैं, जो कि बहुमत के आंकड़े से कहीं ज्यादा दूर हैं। अन्य पार्टियों की ओर देखें तो उन्हें 2 से 12 के बीच सीटें मिल सकती हैं। राज्य में कुल 234 सीटें हैं, ऐसे में सरकार बनानी है तो 117 का जादूई आंकड़ा पार करना होगा। हालांकि BJP की सहयोगी इस आंकड़े के आस-पास भी नहीं है।

पोल ऑफ एक्जिट पोल्स के अनुसार तमिलनाडु में डीएमके की जीत हो सकती है। एम के स्टालिन की पार्टी डीएमके को राज्य में कम से कम 171 सीटें मिल सकती हैं जबकि एआईएडीएमके व सहयोगियों को 58 सीटों से संतोष करना पड़ सकता है।


तमिलनाडु के लिए ABP News-C Voter का अनुमान..

कुल सीट : 234
ADMK+ : 58-71
DMK+: 160-172
AMMK+ : 0
अन्य : 0-७


बंपर वोट के साथ DMK ने हासिल किया जादूई आंकड़ा

हालांकि चुनावी सर्वे ये साफ बता रहा है कि राज्य में सरकार DMK की बन रही है। DMK को 143 से 153 सीटें मिलने का दावा सर्वे में किया जा रहा है। ये आंकड़ा जादूई आंकड़े से कहीं ज्यादा है। यानी ये साफ है कि 2 मई को DMK पूर्ण बहुमत के साथ स्टालिन के नेतृत्व में सत्ता में वापसी कर रही है।

सर्वे के मुताबिक DMK को न सिर्फ बंपर सीट मिल रही हैं, बल्कि उसका वोट प्रतिशत भी काफी ज्यादा है, जो उसे राज्य में सबसे बड़ी पार्टी भी बना रहा है। DMK को 44।90 फीसदी वोट मिलते दिख रहे हैं, वहीं AIDMK के खाते में 36.80 फीसदी वोट ही हैं। अन्य पार्टियों को 18.30 फीसदी वोट मिले हैं। यानी टीवी9-पोलस्ट्रैट सर्वे का दावा साफ है कि तमिलनाडु में भारी बहुमत के साथ DMK सरकार बना रही है। हालांकि चुनाव आयोग के आधिकारिक ऐलान के बाद ही ये साफ होगा।

केरल और पुडुचेरी का भी मिजाज जानिए

दक्षिण भारत के राज्‍य केरल के विधानसभा चुनाव में सत्‍ताधारी लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) गठबंधन और कांग्रेस नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) के बीच टक्‍कर की स्थिति है, हालांकि एलडीएफ को कुछ बढ़त हासिल है जबकि यूडीएफ दूसरे स्‍थान पर हैं। बीजेपी को भी राज्‍य में कुछ सीटें मिल सकती हैं। पोल ऑफ एक्ज‍िट पोल्स के अनुसार राज्य की 140 विधानसभा सीटों में एलडीएफ के खाते में 76 सीटें जा सकती हैं जो कि बहुमत के आंकड़े 71 सीटों से ज्यादा ही है।

पुदुच्चेरी की अगर बात करें तो यहां की 30 सीटों में NRC व सहयोगियों को 18 सीटें मिल सकती हैं जबकि बहुमत का आंकड़ा 16 का है।


असम, केरल, पुदुच्चेरी, तमिलनाडु और पश्च‍िम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए मतदान संपन्न हो चुके हैं। केरल, पुदुच्चेरी और तमिलनाडु में जहां एक ही चरण में मतदान संपन्न हुआ था वहीं असम में तीन और पश्च‍िम बंगाल में 8 चरणों में चुनाव कराए गए।


Exit Polls : प. बंगाल में फिर से दीदी की सरकार, असम में BJP की हो सकती है वापसी

नतीजे २ मई को आएंगे।

कोलकाता/गुवाहटी: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव हेतु आज मतदान का आखिरी दिन था। लोगों को मतदान को लेकब गजब का उत्साह देखने को मिला। छिटपुट हिंसा के बीच मतदान संपन्न हुए। तमाम एजेंसियों और न्यूज चैनलों दारा जारी किए गए एक्जिट पोल में पश्चिम बंगाल में फिर से ममता बनर्जी की सरकार बनती दिख रही है। वहीं दूसरी तरफ, असम में भाजपा की सरकार बनने के पूरे पूरे आसार हैं। बता दें कि असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में मतदान प्रक्रिया पहले ही संपन्न हो चुकी है जिनके नतीजे दो मई को आने हैं



असम में भाजपा की सरकार


असम विधानसभा चुनाव को लेकर ज्यादातर एग्जिट पोल में भारतीय जनता पार्टी को आगे दिखाय जा रहा है। टाइम्स नाउ एग्जिट पोल के मुताबिक, भाजपा+ को 65 सीटें मिलने का अनुमान है वहीं, कांग्रेस+ के पास 59 सीटें जा सकती हैं जबकि अन्य को दो सीटें मिल सकती हैं।


आज तक एग्जिट पोल के अनुसार, असम में भाजपा को 75-84 सीटें मिल सकती हैं, वहीं कांग्रेस को 40-50 सीटें मिल सकती हैं, जबकि अन्य के पास 1-4 सीटें जा सकती हैं। वहीं, रिपब्लिक भारत के मुताबिक, असम में भाजपा आगे नजर आ रही है। यहां भाजपा+ को 74 से 84 सीटें मिलने का अनुमान है, कांग्रेस+ को 40 से 50 और अन्य के पास एक से तीन सीटें जा सकती हैं। एबीपी एग्जिट पोल के अनुसार, भाजपा+ के पाले में 58 से 71 सीटें जा सकती हैं। वहीं कांग्रेस+ को 53 से 66 सीटें मिल सकती हैं व अन्य को 0-5 सीटें मिल सकती हैं।




पश्चिम बंगाल दीदी के साथ


पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर एग्जिट पोल के रुझान आने लगे हैं। फिलहाल एबीपी और टाइम्स नाउ के एग्जिट पोल के अनुसार राज्य में तृणमूल कांग्रेस (TMC) फिर से सरकार बनाती दिखाई दे रही है। वहीं  रिपब्लिक भारत के अनुसार भाजपा को बढ़त मिलता दिखाई दे रहा है। बता दें कि राज्य में आठ चरणों में विधानसभा चुनाव हुआ। आठवें और अंतिम चरण का मतदान आज संपन्न हुआ। नतीजे दो मई को आएंगे। चुनाव आयोग ने मीडिया संस्थानों को शाम 7:30 बजे के बाद एग्जिट पोल के आंकड़े जारी करने का दिशानिर्देश दिया था।  


एबीपी के एग्जिट पोल के अनुसार के अनुसार राज्य में तृणमूल कांग्रेस सत्ता में वापस आती दिखाई दे रही है। इसके अनुसार टीएमसी को 152-164 सीट मिल सकती है। भाजपा को 109-121 सीट मिल सकती है। कांग्रेस + को 14-25 सीट मिल सकती है। वहीं, टाइम्स नाउ के एग्जिट पोल के अनुसार टीएमसी हैट्रिक लगाती दिखाई दे रही है। इसके अनुसार टीएमसी को  158, भाजपा को 115 और कांग्रेस+ 19 सीट मिलती दिख रही है। 

हालांकि, रिपब्लिक भारत के अनुसार भाजपा को बढ़त मिलता दिखाई दे रहा है। इसके अनुसार टीएमसी को 126-136, भाजपा को 138-148 और कांग्रेस + को 11-21 सीट मिल सकती है। 


आठ चरणों में हुए पश्चिम बंगाल में मतदान


बता दें कि पश्चिम बंगाल में आठ चरणों में मतदान हुए। 27 मार्च को प्रथम चरण में 84.13 फीसद, एक अप्रैल को दूसरे चरण में 86.11 फीसद, छह अप्रैल को तीसरे चरण में 84.61 फीसद, 10 अप्रैल को चौथे चरण में 79.90 फीसद, 17 अप्रैल को पांचवें चरण में 82.49 फीसद, 22 अप्रैल को छठे चरण में 82 फीसद, 26 अप्रैल को सातवें चरण में 76.90 फीसद और 29 अप्रैल को आठवें चरण में 76.07 फीसद मतदान हुआ। सूबे में पूरा चुनाव हिंसा से प्रभावित रहा। दो मई को नतीजे घोषित होंगे। 


तीन चरणों में असम में हुई थी वोटिंग


असम में विधानसभा चुनावों के लिए तीन चरणों में वोटिंग हुई थी, जो 27 मार्च, 01 अप्रैल और 06 अप्रैल को हुई थी। असम की 126 विधानसभा सीटों पर तीन चरणों में हुए चुनावों में कुल 82.04 फीसद मतदान दर्ज किया गया था। अंतिम चरण में सबसे अधिक 85.20 फीसद मतदान हुआ था। एक अप्रैल को दूसरे चरण में 80.96 फीसद जबकि पहले चरण में 79.33 फीसद मतदाताओं ने वोट डाले थे।



Bengal: Corona के कहर के बीच मतदान, सुबह-सुबह लगीं लंबी लाइनें! देखें ग्राउंड रिपोर्ट

by केशर

कोरोना महामारी के बीच आज बंगाल में छठे चरण की 43 सीटों पर मतदान चल रहा है. मतदाता 306 प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला कर रहे हैं. इसके बाद बंगाल में दो ही चरणों की वोटिंग रह जाएगी. बंगाल में बीते चौबीस घंटे में कुल 10,784 नए कोरोना मामले सामने आए हैं, बावजूद इसके वहां के लोगों में मतदान को लेकर जुनून है. ज्यादा जानकारी के लिए देखें ये रिपोर्ट.


Corona के खतरे के बीच Bengal में 6वें दौर की वोटिंग जारी, दांव पर बड़े नेताओं की किस्मत

by राजन सिंह

पश्चिम बंगाल में इंफेक्शन और इलेक्शन को लेकर जंग है. कोरोना का इंफेक्शन भी 24 घंटे में करीब दस हजार तक नए केस लेकर आया है और कोरोना काल में आज राज्य में छठे दौर की वोटिंग जारी है. बड़े नेताओं की किस्मत दांव पर लगी है. नेताओं ने इससे पहले दौरे रैलियां छोटी तो कर दी लेकिन कोरोना तब तक विकराल रुप अख्तियार कर चुका था. सवाल है कि नेता तो इलेक्शन लड़ कर चले जाएंगे और आम लोग इंफेक्शन से कैसे लड़ेगे. देखें वीडियो.


Assembly Elctions: बीजेपी ने की ममता बनर्जी के खिलाफ कार्रवाई की मांग, लगाया ये आरोप

बीजेपी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ चुनाव आयोग से शिकायत की है. बीजेपी ने कहा कि ममता ने सीएपीएफ को लेकर गलत बयानबाजी की है. बीजेपी ने ममता के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है.


कोलकाता. बीजेपी ने सोमवार को निर्वाचन आयोग से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की शिकायत की है. बीजेपी ने आरोप लगाया कि टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने एक बयान दिया है, जो पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए तैनात केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) में 'विद्रोह' पैदा करने के प्रयास के समान है.


बीजेपीने एक समाचार पत्र में प्रकाशित बनर्जी की टिप्पणी को लेकर उनपर आरोप लगाते हुए निर्वाचन आयोग से उनके खिलाफ कार्रवाई करने की अपील की. बीजेपी भाजपा ने दावा किया कि मुख्यमंत्री ने नदिया जिले में एक जनसभा में सीएपीएफ कर्मियों से 'बीजेपी के आदेश पर गोलियां नहीं चलाने' की अपील की और कहा कि 'वे आज हैं कल नहीं होंगे.'


"सुरक्षाबलों की तैनाती का अधिकार नहीं"
बीजेपी ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी को दी गई शिकायत में आरोप लगाया कि उनका बयान निर्वाचन आयोग की शक्तियों पर आक्षेप लगाने वाला है. पार्टी ने कहा, 'चुनाव ड्यूटी के दौरान सीएपीएफ कर्मी आयोग की निगरानी में काम करते हैं और उनके आला अधिकारी जमीन पर काम करते हैं.' चुनाव लड़ रही किसी भी पार्टी के पास बलों की तैनाती का कोई अधिकार नहीं है. बनर्जी के कथित बयान को लेकर बीजेपी की शिकायत में कहा गया है, 'यह दबी जुबान में विद्रोह भड़काने के समान है.'