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'ब्‍याज कम करो, वरना रोक दूंगा व्‍यापार...', डोनाल्ड ट्रंप अपने ही केंद्रीय बैंक को क्‍यों धमका रहे?

by न्यूज डेस्क

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर फेडरल रिजर्व पर ब्याज दरों में कटौती के लिए दबाव बनाया है। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि अगर केंद्रीय बैंक ब्याज दरें कम नहीं करता तो अमेरिका उन देशों के साथ कारोबार रोकने पर विचार कर सकता है, जिनके साथ उसका व्यापार घाटा है। ट्रंप ने शुक्रवार, 4 सितंबर को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक पोस्ट के जरिए फेड से ब्याज दर कम करने की मांग की। उन्होंने तर्क दिया कि अमेरिका में ऊंची ब्याज दरों की वजह से अर्थव्यवस्था को नुकसान हो रहा है। ट्रंप का कहना है कि अमेरिका को दुनिया के सबसे कम उधारी खर्च वाले देशों में होना चाहिए।

व्यापार रोकने की धमकी कितनी बड़ी बात?

अगर अमेरिका वास्तव में व्यापार घाटे वाले देशों से आयात या कारोबार सीमित करता है, तो इसका असर केवल टैरिफ तक सीमित नहीं रहेगा। अमेरिका कई जरूरी उत्पादों और सामानों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर है। ऐसे में आपूर्ति प्रभावित होने पर कीमतों में अचानक बढ़ोतरी हो सकती है और महंगाई का दबाव बढ़ सकता है। 
इसका सीधा असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर पड़ने के साथ-साथ वैश्विक व्यापार पर भी देखने को मिल सकता है। यही वजह है कि ट्रंप की इस टिप्पणी को सामान्य राजनीतिक बयान के बजाय आर्थिक नीति को लेकर बढ़ते दबाव के तौर पर देखा जा रहा है।

ब्याज दर को लेकर फेड के सामने चुनौती

ट्रंप के लगातार दबाव के बीच फेडरल रिजर्व के सामने भी मुश्किल स्थिति है। अगर केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कटौती करता है तो उस पर राजनीतिक दबाव में फैसला लेने के आरोप लग सकते हैं। वहीं, अगर फेड ट्रंप की मांग को नजरअंदाज करता है तो राष्ट्रपति के साथ टकराव और बढ़ने की आशंका है। फेडरल रिजर्व की अगली बैठक 15 और 16 सितंबर को प्रस्तावित है। ऐसे में ट्रंप के ताजा बयान ने बैठक से पहले ब्याज दरों को लेकर बहस को और तेज कर दिया है।

उम्मीद से बेहतर आया अमेरिकी रोजगार डेटा

ट्रंप की यह टिप्पणी अमेरिका की उम्मीद से बेहतर रोजगार रिपोर्ट सामने आने के कुछ ही घंटों बाद आई। अगस्त में अमेरिकी अर्थव्यवस्था में 1.62 लाख नई नौकरियां जुड़ने की जानकारी सामने आई, जबकि अर्थशास्त्रियों का अनुमान करीब 53,000 से 55,000 नौकरियों का था। बेरोजगारी दर 4.1 फीसदी पर बनी रही। मजबूत रोजगार आंकड़ों ने फेड के सामने ब्याज दरों में तत्काल कटौती का फैसला और मुश्किल बना दिया है। बाजार में अब यह चर्चा भी तेज हो गई है कि केंद्रीय बैंक आगे की नीति में किस दिशा में कदम उठाता है।

ट्रंप क्यों चाहते हैं ब्याज दरों में कटौती?

डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से कम ब्याज दरों की वकालत करते रहे हैं। उनका तर्क है कि ब्याज दर कम होने से कंपनियों और आम लोगों के लिए कर्ज लेना सस्ता होगा। इससे निवेश और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है और अमेरिकी अर्थव्यवस्था की रफ्तार तेज हो सकती है। ट्रंप का यह भी मानना है कि मजबूत आर्थिक विकास का मतलब जरूरी नहीं कि महंगाई अपने आप बढ़े। उनके मुताबिक, अमेरिका जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था कम ब्याज दरों के साथ भी मजबूती से आगे बढ़ सकती है। हालांकि, फेडरल रिजर्व ब्याज दर तय करते समय महंगाई, रोजगार और आर्थिक विकास जैसे कई संकेतकों को ध्यान में रखता है। यही वजह है कि राष्ट्रपति की इच्छा और केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति के बीच मतभेद दिखाई दे रहे हैं।

चीन, मेक्सिको और वियतनाम से अमेरिका का बड़ा व्यापार घाटा

अमेरिका का कई प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों के साथ बड़ा व्यापार घाटा है। इनमें चीन सबसे ऊपर है। पिछले साल अमेरिका का चीन के साथ व्यापार घाटा 200 अरब डॉलर से अधिक रहा। इसके बाद मेक्सिको और वियतनाम जैसे देश प्रमुख व्यापार घाटे वाले साझेदारों में शामिल रहे। कुल मिलाकर अमेरिका ने पिछले साल अपने व्यापारिक साझेदारों के साथ करीब 1.2 ट्रिलियन डॉलर का व्यापार घाटा दर्ज किया था। ऐसे में अगर ट्रंप अपनी धमकी को वास्तव में व्यापार नीति का हिस्सा बनाते हैं, तो इसका असर अमेरिका के साथ-साथ वैश्विक सप्लाई चेन और अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर भी पड़ सकता है। अब सबकी नजर फेडरल रिजर्व की सितंबर बैठक पर है, जहां ब्याज दरों को लेकर होने वाला फैसला यह संकेत देगा कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक राष्ट्रपति ट्रंप के दबाव के बीच अपनी मौद्रिक नीति को किस दिशा में ले जाता है।


नेपाल में फ्लैश फ्लड के 9 दिन बाद सुरंग से मिलीं जिंदा होने की आवाजें, दो कर्मचारी सुरक्षित निकाले गए

by न्यूज डेस्क

नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड के नौ दिन बाद राहत और बचाव अभियान में बड़ी कामयाबी मिली है। त्रिशूली-3A हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की सुरंग में फंसे दो कर्मचारियों को रेस्क्यू टीम ने सुरक्षित बाहर निकाल लिया है। दोनों की पहचान मैकेनिकल फोरमैन संजय साह और मैकेनिकल सुपरवाइजर कबीर महार्जन के रूप में हुई है। रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान सुरंग के भीतर से इंसानी आवाज सुनाई देने के बाद बचाव दल ने तुरंत वहां अपना अभियान तेज किया। टीम ने अंदर फंसे लोगों को भरोसा दिलाते हुए कहा कि घबराने की जरूरत नहीं है और उन्हें बाहर निकालने के लिए टीम पहुंच चुकी है। इसके बाद अंदर से जवाब मिलने पर रेस्क्यू टीम को पता चला कि वहां लोग जिंदा मौजूद हैं। शुक्रवार को बचाव दल ने सबसे पहले संजय साह को सुरंग से बाहर निकाला। इसके बाद टीम ने दूसरे कर्मचारी कबीर महार्जन को भी सुरक्षित बाहर निकाल लिया। करीब नौ दिनों तक सुरंग के अंदर फंसे रहने के बाद दोनों के जिंदा मिलने की खबर ने उनके परिवारों और राहत टीमों में उम्मीद जगा दी है।

फ्लैश फ्लड ने मचाई थी भारी तबाही

26 अगस्त को नेपाल में आई अचानक बाढ़ ने त्रिशूली नदी के आसपास के इलाकों में बड़े पैमाने पर तबाही मचाई थी। बाढ़ के पानी और मलबे ने हाइड्रोपावर परियोजनाओं, सड़कों और दूसरे अहम बुनियादी ढांचों को भारी नुकसान पहुंचाया। इस आपदा में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई, जबकि कई लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। हादसे के बाद से राहत और बचाव टीमें क्षतिग्रस्त हाइड्रोपावर परियोजनाओं और सुरंगों में लगातार तलाशी अभियान चला रही हैं।

900 से ज्यादा हाइड्रोपावर कर्मचारी लापता

फ्लैश फ्लड के बाद नेपाल के करीब 12 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स से जुड़े 900 से ज्यादा कर्मचारियों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। इनमें बड़ी संख्या ऐसे कर्मचारियों की है, जिनके सुरंगों या जमीन के नीचे बने हिस्सों में फंसे होने की आशंका जताई जा रही है। रसुवा और नुवाकोट में प्रभावित हाइड्रोपावर परियोजनाओं से जुड़े करीब 500 कर्मचारियों के सुरंगों के अंदर फंसे होने की आशंका बताई गई है। बाढ़ के दौरान कुछ कर्मचारियों ने मदद के लिए आवाज भी लगाई थी। वहीं, जो कर्मचारी किसी तरह सुरंगों से बाहर निकल पाए, उन्होंने भी अपने कई साथियों के अंदर फंसे होने की जानकारी दी थी।

सुरंगों में ऑक्सीजन की कमी बनी बड़ी चुनौती

लंबे समय से जारी रेस्क्यू ऑपरेशन के बीच सुरंगों के भीतर ऑक्सीजन का स्तर बचाव दल के लिए बड़ी चिंता बना हुआ है। लंबे समय तक बंद जगह में फंसे लोगों के लिए ऑक्सीजन की कमी स्थिति को और गंभीर बना सकती है। हालांकि, त्रिशूली-3A परियोजना की सुरंग से दो लोगों के जीवित मिलने के बाद बचाव अभियान में नई उम्मीद जगी है। नेपाली सेना और सशस्त्र पुलिस बल की टीमें अब सुरंगों और क्षतिग्रस्त हिस्सों में अन्य संभावित जीवित लोगों की तलाश में जुटी हैं।


SCO Summit में क्रॉप फोटो पर घिरा पाकिस्तान, अब शहबाज शरीफ ने शेयर की पूरी फैमिली फोटो

by न्यूज डेस्क

नई दिल्ली: शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन के दौरान पाकिस्तान एक बार फिर सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया। वजह बनी SCO समिट की एक ग्रुप फोटो, जिसे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से पहले क्रॉप करके सोशल मीडिया पर साझा किया गया था। तस्वीर सामने आने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने पाकिस्तान के पीएमओ पर सवाल उठाने के साथ जमकर प्रतिक्रियाएं दीं। इसके बाद अब प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की ओर से पूरी ग्रुप फोटो साझा की गई है।
किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित SCO शिखर सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और संगठन के अन्य सदस्य देशों के नेता शामिल हुए। सम्मेलन के दौरान पीएम मोदी की कई नेताओं से मुलाकात भी हुई।

पीएम मोदी, पुतिन और जिनपिंग की मुलाकात

SCO बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ नजर आए। तीनों नेताओं ने एक-दूसरे से गर्मजोशी से मुलाकात की और हाथ मिलाया। इस दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी आसपास मौजूद दिखाई दिए। इसके बाद सभी नेताओं के साथ फोटो सेशन हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने SCO की पूरी फैमिली फोटो सोशल मीडिया पर शेयर की, जिसमें संगठन के सदस्य देशों के प्रमुख एक साथ नजर आए।

पाकिस्तान के PMO ने शेयर की थी क्रॉप तस्वीर

इसी बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय के आधिकारिक एक्स हैंडल से भी SCO समिट की एक ग्रुप फोटो पोस्ट की गई। हालांकि, इस तस्वीर में पूरी फैमिली फोटो के बजाय कुछ नेताओं को ही दिखाया गया था। क्रॉप की गई तस्वीर में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, कजाखस्तान के राष्ट्रपति कसीम-जोमार्ट तोकायेव, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, ताजिकिस्तान के राष्ट्रपति इमोमाली रहमोन और उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शवकत मिर्जियोयेव दिखाई दे रहे थे। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई अन्य नेताओं को तस्वीर से बाहर कर दिया गया था। पूरी तस्वीर पहले ही प्रधानमंत्री मोदी की ओर से साझा की जा चुकी थी, इसलिए पाकिस्तान पीएमओ की ओर से पोस्ट की गई क्रॉप तस्वीर को लेकर सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे।

विवाद बढ़ा तो सामने आई पूरी तस्वीर

क्रॉप फोटो को लेकर सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं तेज होने के बाद अब शहबाज शरीफ की ओर से SCO समिट की पूरी ग्रुप फोटो साझा की गई है। इस तस्वीर में सभी प्रमुख नेता एक साथ दिखाई दे रहे हैं। पूरी तस्वीर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा शहबाज शरीफ, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, किर्गिस्तान के राष्ट्रपति सदिर जापारोव, बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान समेत अन्य नेता नजर आ रहे हैं।

सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के पीएमओ की खिंचाई

पहली क्रॉप की गई तस्वीर सामने आते ही सोशल मीडिया यूजर्स ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय को निशाने पर लेना शुरू कर दिया। कई यूजर्स ने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा साझा की गई पूरी तस्वीर को कमेंट में पोस्ट करते हुए दोनों तस्वीरों की तुलना की। एक यूजर ने पूरी तस्वीर साझा करते हुए इसे 'फुल पिक्चर' बताया, जबकि कुछ अन्य यूजर्स ने पाकिस्तान पीएमओ के रवैये पर तंज कसा। एक यूजर ने क्रॉप की गई तस्वीर को लेकर 'टिपिकल पाकिस्तान माइंडसेट' जैसी टिप्पणी भी की। मामला इतना बढ़ गया कि सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने शहबाज शरीफ की तस्वीरों के साथ भी एडिटिंग कर मजाक किया। इस तरह SCO सम्मेलन की सामान्य ग्रुप फोटो पाकिस्तान की ओर से शेयर की गई तस्वीर के चलते सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गई।


SCO Summit 2026: पीएम मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति पेजेशकियन से की मुलाकात, पश्चिम एशिया के हालात पर हुई चर्चा

by न्यूज डेस्क

बिश्केक: किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में चल रहे शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच यह बैठक ऐसे समय हुई है, जब पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बना हुआ है। करीब दो साल बाद पीएम मोदी और ईरानी राष्ट्रपति की आमने-सामने मुलाकात हुई है। बैठक को भारत-ईरान संबंधों के लिहाज से अहम माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच व्यापार, ऊर्जा, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय सहयोग जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर लंबे समय से सहयोग रहा है। ऐसे में पश्चिम एशिया की मौजूदा परिस्थितियों के बीच दोनों नेताओं की बातचीत पर विशेष नजर रही।
पीएम मोदी ने आर्मेनिया के राष्ट्रपति से भी की मुलाकात

ईरानी राष्ट्रपति से मुलाकात से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने सोमवार सुबह आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पशिनयान के साथ द्विपक्षीय बैठक की। दोनों नेताओं ने भारत और आर्मेनिया के बीच सहयोग को और मजबूत करने के तरीकों पर चर्चा की। बैठक में रक्षा, व्यापार और अर्थव्यवस्था, फार्मास्युटिकल्स, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, संस्कृति और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर विचार किया गया। इसके अलावा पश्चिम एशिया की स्थिति समेत कई क्षेत्रीय और वैश्विक घटनाक्रमों पर भी दोनों नेताओं ने अपने विचार साझा किए। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत आर्मेनिया के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत एवं व्यापक बनाने के लिए मिलकर काम करने को इच्छुक है।
क्यों अहम है पीएम मोदी और पेजेशकियन की मुलाकात?

पीएम मोदी और मसूद पेजेशकियन की बैठक ऐसे वक्त हुई है, जब पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव ने क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित किया है। इस पूरे घटनाक्रम का असर ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक व्यापार पर भी पड़ा है। ईरान के साथ भारत के पुराने और रणनीतिक संबंध हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार और ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग के अलावा क्षेत्रीय कनेक्टिविटी से जुड़े हित भी जुड़े हुए हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी परिस्थितियां भी भारत समेत दुनिया के कई देशों के लिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि यह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख समुद्री मार्ग है। इससे पहले जून में भी प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पेजेशकियन के बीच फोन पर बातचीत हुई थी। ऐसे में SCO सम्मेलन के दौरान दोनों नेताओं की आमने-सामने हुई मुलाकात को द्विपक्षीय और क्षेत्रीय दोनों नजरिए से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

पुतिन से मुलाकात और वर्ल्ड नोमैड गेम्स में शामिल होंगे पीएम मोदी

SCO शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी की कई महत्वपूर्ण द्विपक्षीय मुलाकातें प्रस्तावित हैं। सोमवार शाम उनकी रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात होने की भी उम्मीद है। इसके अलावा पीएम मोदी किर्गिस्तान के राष्ट्रपति सदिर जापारोव के निमंत्रण पर छठे वर्ल्ड नोमैड गेम्स के उद्घाटन समारोह में भी शामिल होंगे।

पेजेशकियन ने युद्ध को लेकर क्या कहा?

बिश्केक रवाना होने से पहले ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने कहा था कि ईरान युद्ध नहीं चाहता, लेकिन किसी भी हमले का जवाब मजबूती और दृढ़ संकल्प के साथ देगा। उन्होंने क्षेत्र में अस्थिरता को सभी देशों के लिए नुकसानदायक बताया और आर्थिक तथा सुरक्षा लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए देशों के बीच सहयोग की जरूरत पर जोर दिया। SCO बैठक को लेकर पेजेशकियन ने इसे महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि ऐसे समय में जब अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के जरिए वैश्विक स्तर पर प्रभाव बनाने की कोशिशें हो रही हैं, यह बैठक अलग-अलग और स्वतंत्र आवाजों के लिए एक महत्वपूर्ण मंच का प्रतीक है। उन्होंने यह भी कहा कि इस क्षेत्र का इतिहास और सभ्यता हजारों साल पुरानी है और यहां के देशों के बीच लंबे समय से संवाद, सह-अस्तित्व और विकास की परंपरा रही है। उनके मुताबिक, शांति, सुरक्षा, आर्थिक विकास और सभ्यतागत सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए क्षेत्रीय देशों के बीच संवाद जरूरी है।


SCO Summit 2026: किर्गिस्तान पहुंचे पीएम मोदी, SCO शिखर सम्मेलन में वैश्विक मुद्दों पर रखेंगे भारत का पक्ष

by न्यूज डेस्क

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों किर्गिस्तान के दौरे पर हैं, जहां वह शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के 26वें शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। राष्ट्रपति सादिर झापारोव के निमंत्रण पर पहुंचे पीएम मोदी शिखर सम्मेलन के अलावा SCO प्लस फॉर्मेट की बैठक और छठे वर्ल्ड नोमैड गेम्स के उद्घाटन समारोह में भी शामिल होंगे।
किर्गिस्तान इस वर्ष SCO की रोटेटिंग प्रेसिडेंसी संभाल रहा है। यह अध्यक्षता ऐसे समय में है, जब संगठन अपनी 25वीं वर्षगांठ मना रहा है। भारत साल 2017 में SCO का पूर्ण सदस्य बना था और तब से संगठन के मंच पर क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद, कनेक्टिविटी, व्यापार और सहयोग से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाता रहा है।

बिश्केक में जुटेंगे कई देशों के नेता

किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में 31 अगस्त और 1 सितंबर को SCO शिखर सम्मेलन समेत कई महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, करीब 21 देशों के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री इन कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के लिए बिश्केक पहुंच सकते हैं। बड़ी संख्या में विदेशी नेताओं की मौजूदगी को देखते हुए राजधानी में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए हैं। SCO का राष्ट्राध्यक्षों और ऑब्जर्वर देशों का शिखर सम्मेलन 1 सितंबर को आयोजित होगा। बैठक में सदस्य देशों के बीच सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व के विभिन्न मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है।

SCO बैठक में पीएम मोदी का क्या है कार्यक्रम?

पीएम मोदी अपने दौरे के दौरान SCO नेताओं के साथ कई द्विपक्षीय मुलाकातें भी करेंगे। इन बैठकों में भारत के विभिन्न देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों, आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। दौरे के दौरान प्रधानमंत्री SCO के राष्ट्राध्यक्षों की परिषद की बैठक में हिस्सा लेने के साथ SCO प्लस फॉर्मेट की बैठक में भी शामिल होंगे। इसके अलावा वह छठे वर्ल्ड नोमैड गेम्स के उद्घाटन समारोह में भी शिरकत करेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार को SCO शिखर सम्मेलन को संबोधित करेंगे। माना जा रहा है कि अपने संबोधन में वह भारत की प्राथमिकताओं और क्षेत्रीय सहयोग को लेकर देश का पक्ष रख सकते हैं।

भारत के लिए क्यों अहम है SCO?

SCO भारत के लिए मध्य एशिया और व्यापक यूरेशियाई क्षेत्र के साथ रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा सहयोग का एक महत्वपूर्ण मंच है। भारत की सदस्यता के बाद संगठन में उसकी भूमिका लगातार महत्वपूर्ण हुई है। SCO के जरिए भारत आतंकवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों के साथ व्यापार, ऊर्जा, परिवहन और कनेक्टिविटी से जुड़े विषयों पर भी सहयोग बढ़ाने की कोशिश करता है। पीएम मोदी का यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है, जब SCO की अध्यक्षता किर्गिस्तान के पास है और संगठन अपनी 25 वर्षों की यात्रा को भी रेखांकित कर रहा है। ऐसे में शिखर सम्मेलन के दौरान भारत की भागीदारी पर सभी की नजरें रहेंगी।


नेपाल में बाढ़ से तबाही में 4,250 लोग लापता, मृतकों का आंकड़ा 903, सामूहिक अंतिम संस्कार से बढ़ी चिंता!

by न्यूज डेस्क

काठमांडू: नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन के पांच दिन बाद भी हालात बेहद गंभीर बने हुए हैं। आपदा में अब तक 903 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि करीब 4,250 लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। बड़ी संख्या में परिवार अपनों की तलाश में जुटे हैं। दूसरी ओर, कई शव ऐसे मिले हैं जिनकी पहचान नहीं हो सकी है। ऐसे मामलों में जरूरी साक्ष्य सुरक्षित रखने के बाद सामूहिक रूप से अंतिम संस्कार किए जा रहे हैं। राहत और बचाव दल लगातार प्रभावित क्षेत्रों में अभियान चला रहे हैं। हालांकि कई जगह पानी का स्तर दोबारा बढ़ने, मलबा जमा होने और सड़क व पुल टूटने से रेस्क्यू टीमों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। भोटेकोशी नदी का जलस्तर बढ़ने के बाद आसपास के लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है।

9,435 लोगों को सुरक्षित निकाला गया

नेपाल सरकार के मुताबिक, अब तक 9,435 लोगों को प्रभावित इलाकों से निकालकर सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया गया है। राहत अभियान में सेना, पुलिस और सशस्त्र बलों के 20,618 जवान तैनात हैं। रविवार तक बचाव कार्य के लिए 394 हवाई उड़ानें संचालित की गईं, जिनमें 72 उड़ानें अकेले रविवार को हुईं। हाइड्रोपावर परियोजनाओं वाले इलाकों से भी बड़ी संख्या में लोगों को हेलीकॉप्टर के जरिए निकाला गया है। सेना के हेलीकॉप्टरों ने 279 लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया।

आठ जिलों से मिले सैकड़ों शव

नेपाल के सभी आठ प्रभावित जिलों में शव बरामद किए गए हैं। चितवन में 272, नवलपरासी ईस्ट में 207, नवलपरासी वेस्ट में 151, गोरखा में 62, नुवाकोट में 95, धादिंग में 55, तनहूं में 37 और रसुवा में 24 शव मिलने की जानकारी सामने आई है। शुरुआती जांच में माना जा रहा है कि नेपाल-तिब्बत सीमा के आसपास बर्फ और चट्टानों के खिसकने की घटनाओं ने इस आपदा को और भयावह बनाया। इसके बाद तेज पानी और मलबे ने बड़े इलाके को अपनी चपेट में ले लिया।

त्रिशूली नदी में उफान, 130 मीटर लंबा पुल बहा

मध्य नेपाल में त्रिशूली नदी का जलस्तर बढ़ने से एक और बड़ा नुकसान हुआ है। करीब तीन घंटे तक चले तेज बहाव में घ्यालचोक-चारौदी पुल बह गया। लगभग 130 मीटर लंबा यह पुल गोरखा के घ्यालचोक क्षेत्र को पृथ्वी हाईवे से जोड़ता था। पुल टूटने से आसपास के करीब 400 परिवारों का मुख्य संपर्क मार्ग बाधित हो गया है। इसका सीधा असर स्थानीय किसानों पर भी पड़ा है। किसान इसी रास्ते से दूध और सब्जियां चारौदी की कृषि सहकारी संस्था तक पहुंचाते थे। अब वैकल्पिक रास्ते के अभाव में उनकी उपज को बाजार तक ले जाना मुश्किल हो गया है। इससे पहले 26 अगस्त को आई बाढ़ में धवादिघाट का पुल भी बह गया था। ऐसे में स्थानीय लोगों के लिए उपलब्ध वैकल्पिक रास्ते भी अब बंद हो गए हैं।

रसुवा में सड़क बहने से राहत अभियान प्रभावित

बाढ़ के साथ आई गाद और मलबे ने रसुवा समेत कई इलाकों में भारी तबाही मचाई है। कई मकान पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। चीन सीमा की ओर जाने वाला महत्वपूर्ण मार्ग भी बाढ़ में क्षतिग्रस्त हुआ था, जिससे राहत अभियान और सीमावर्ती आवाजाही प्रभावित हुई। सड़क बहाली के काम में जुटी टीमों ने करीब 150 मीटर हिस्से को दोबारा यातायात के लिए खोल दिया है। बाकी हिस्से की मरम्मत अभी जारी है।

हाइड्रोपावर सुरंगों में जिंदगी की तलाश

सबसे चुनौतीपूर्ण बचाव अभियानों में से एक हाइड्रोपावर परियोजनाओं की सुरंगों में चल रहा है। रसुवा स्थित अपर त्रिशूली-1 परियोजना में फंसे लोगों को बाहर निकालने के लिए नेपाली सेना के साथ भारत, चीन और दक्षिण कोरिया के विशेषज्ञ भी काम कर रहे हैं। भारतीय विशेषज्ञों की मदद से रसुवा में दो दिनों के भीतर करीब 250 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाले जाने की जानकारी है। भारतीय टीम सुरंग के लगभग तीन किलोमीटर अंदर तक जाकर तलाश अभियान चला रही है। चिलिमे और लांगटांग क्षेत्रों में भी नेपाली सेना के साथ संयुक्त बचाव अभियान जारी है। नुवाकोट स्थित अपर त्रिशूली-3ए परियोजना की सुरंग में भी रेस्क्यू ऑपरेशन चल रहा है। रास्ते में जमा मलबा हटाने के लिए सेना के इंजीनियर नियंत्रित विस्फोट तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। मौके पर सेना, सशस्त्र पुलिस के स्निफर डॉग्स और नेपाल पुलिस के विशेषज्ञों समेत करीब 90 लोगों की टीम तैनात है। सुरंग के अंदर पहुंचने के लिए शुरुआत में करीब दो बाई तीन फीट का रास्ता बनाया गया था। हालांकि अंदर से किसी तरह की आवाज या हलचल नहीं मिलने के बाद भारी मशीनों से रास्ता चौड़ा करने का काम शुरू किया गया है।

पहचान नहीं हो पाने वाले शवों का सामूहिक अंतिम संस्कार

आपदा के बाद नेपाल के सामने अब शवों की पहचान करना भी बड़ी चुनौती बन गया है। कई शवों की पहचान नहीं हो सकी है। ऐसे मामलों में पहचान से जुड़े जरूरी साक्ष्य और नमूने सुरक्षित रखने के बाद अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की जा रही है। लापता लोगों के परिवार अब भी अपने रिश्तेदारों की तलाश कर रहे हैं। ऐसे में बरामद शवों की पहचान करना राहत अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।

राहत शिविरों में हजारों लोगों को मिल रही मदद

रसुवा और नुवाकोट में बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए 26 अस्थायी राहत केंद्र बनाए गए हैं। रविवार को इन केंद्रों के जरिए 3,454 लोगों को आश्रय और जरूरी राहत सामग्री उपलब्ध कराई गई। बाढ़ में घायल 267 लोगों को अस्पतालों तक पहुंचाया गया है। इनमें स्थानीय अस्पतालों के साथ काठमांडू के अस्पताल भी शामिल हैं। इलाज के बाद 156 लोगों को छुट्टी दी जा चुकी है। प्रभावित क्षेत्रों में मेडिकल टीमों को भी भेजा गया है, ताकि लोगों को तत्काल इलाज के साथ मानसिक सहयोग भी मिल सके।

भारत ने भेजी राहत सामग्री की चौथी खेप

नेपाल की मदद के लिए भारत लगातार राहत सामग्री भेज रहा है। शनिवार रात भारतीय वायुसेना का C-१ 30 विमान करीब 11 टन राहत सामग्री लेकर नेपाल पहुंचा। इस खेप में सुरंगों में बचाव के उपकरण, तकनीकी सामग्री और डीएनए जांच से जुड़े उपकरण शामिल हैं। भारत की ओर से अब तक करीब 68.5 टन राहत सामग्री नेपाल भेजी जा चुकी है। इसमें दवाएं, पोर्टेबल जनरेटर, खाद्य सामग्री, पानी शुद्ध करने वाली गोलियां, कंबल, स्लीपिंग बैग, तिरपाल और हाइजीन किट शामिल हैं। क्षतिग्रस्त संपर्क मार्गों को दोबारा जोड़ने के लिए स्टील और बेली ब्रिज से जुड़ी सामग्री भी भेजी जा रही है।

मोबाइल नेटवर्क बहाल करने की कोशिश

बाढ़ में नेपाल टेलीकॉम और एनसेल के कई मोबाइल टावर भी प्रभावित हुए थे। अब तक नेपाल टेलीकॉम के 106 और एनसेल के 75 टावर दोबारा चालू किए जा चुके हैं। जिन इलाकों में मोबाइल नेटवर्क अभी भी उपलब्ध नहीं है, वहां बचाव टीमों के संपर्क के लिए 20 सैटेलाइट फोन भेजे गए हैं। फिलहाल नेपाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती हजारों लापता लोगों तक पहुंचना है। कहीं मलबा रास्ता रोक रहा है तो कहीं नदियों का बढ़ता जलस्तर बचाव कार्य में बाधा डाल रहा है। वहीं, हाइड्रोपावर सुरंगों में फंसे लोगों की तलाश भी युद्धस्तर पर जारी है। राहत और बचाव दल कई मोर्चों पर एक साथ काम कर रहे हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को सुरक्षित निकाला जा सके और प्रभावित परिवारों तक जरूरी मदद पहुंचाई जा सके।


50 करोड़ का सोना, करोड़ों की नकदी और चांदी... नेपाल की बाढ़ में डूबे बैंक से निकला ‘खजाना’

by न्यूज डेस्क

नेपाल में भोटेकोशी नदी की विनाशकारी बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। इसी बीच नुवाकोट जिले के त्रिशूली इलाके में बाढ़ में डूबी कृषि विकास बैंक की शाखा से करोड़ों रुपये मूल्य का सोना, नकदी, चांदी और जरूरी दस्तावेज सुरक्षित बाहर निकाले गए हैं। करीब 8 घंटे तक चले इस चुनौतीपूर्ण रेस्क्यू ऑपरेशन में लगभग 50 करोड़ नेपाली रुपये मूल्य का सोना बरामद किया गया। नेपाल में भोटेकोशी नदी में आई भीषण बाढ़ ने कई इलाकों में जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। तेज बहाव के चलते नुवाकोट जिले के त्रिशूली क्षेत्र में स्थित कृषि विकास बैंक की त्रिशूली-ढुंगे शाखा भी पूरी तरह पानी और मलबे की चपेट में आ गई थी। बैंक परिसर में पानी भर जाने के बाद वहां रखी करोड़ों की संपत्ति की सुरक्षा प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गई थी। हालात कुछ सामान्य होने के बाद पुलिस और संबंधित बचाव टीमों ने बैंक के अंदर फंसे सोने, नकदी, चांदी और महत्वपूर्ण दस्तावेजों को सुरक्षित निकालने के लिए अभियान शुरू किया। अधिकारियों के मुताबिक, करीब 8 घंटे तक चले इस अभियान में लगभग 50 करोड़ नेपाली रुपये मूल्य का सोना, करीब डेढ़ करोड़ नेपाली रुपये नकद, चांदी और अन्य कीमती सामान बरामद किया गया।

पानी-मलबे के बीच बैंक में चला 8 घंटे का रेस्क्यू ऑपरेशन

पुलिस के मुताबिक, 10 भाद्र को आई भीषण बाढ़ के दौरान कृषि विकास बैंक की त्रिशूली-ढुंगे शाखा बुरी तरह प्रभावित हुई थी। बैंक के भीतर पानी और मलबा भर जाने के कारण लॉकर और अन्य हिस्सों तक पहुंचना बेहद मुश्किल था। इसके बावजूद पुलिस और संबंधित टीमों ने जोखिम उठाते हुए बैंक के अंदर अभियान चलाया। बचावकर्मियों ने बैंक में रखी कीमती धातुओं, नकदी और जरूरी दस्तावेजों को एक-एक करके सुरक्षित बाहर निकाला। अधिकारियों के अनुसार, बरामद सामान को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया है। करोड़ों रुपये की संपत्ति सुरक्षित निकलने के बाद बैंक अधिकारियों और प्रशासन ने राहत की सांस ली है।

भोटेकोशी की बाढ़ से नेपाल में भारी तबाही

भोटेकोशी नदी में आई बाढ़ ने नेपाल के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया है। तेज बहाव के कारण सड़कें और आसपास के इलाके जलमग्न हो गए हैं। कई स्थानों पर मलबा जमा होने से राहत और बचाव अभियान भी प्रभावित हुआ है। इसी बीच बाढ़ प्रभावित इलाकों में फंसे लोगों को निकालने के लिए नेपाली सेना, नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल बड़े पैमाने पर अभियान चला रहे हैं।

9,435 लोगों को सुरक्षित निकाला गया

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने प्राकृतिक आपदा के बीच चल रहे राहत, बचाव और पुनर्वास अभियानों की जानकारी साझा की है। उन्होंने कहा कि रसुवा की भोटेकोशी नदी में आई विनाशकारी बाढ़ से हुई जन-धन और भौतिक क्षति का पूरा आकलन करना अभी चुनौतीपूर्ण है। प्रधानमंत्री के मुताबिक, अब तक 9,435 लोगों को हवाई और सड़क मार्ग के जरिए सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। राहत एवं बचाव कार्यों के लिए कुल 394 उड़ानें संचालित की जा चुकी हैं, जिनमें रविवार को 72 उड़ानें शामिल हैं। प्रभावित इलाकों में नेपाली सेना, नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल के 20,618 सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं।

भारतीय टीम भी चला रही रेस्क्यू ऑपरेशन

बाढ़ प्रभावित जलविद्युत परियोजना क्षेत्रों से नेपाली सेना के हेलीकॉप्टरों के जरिए 279 लोगों को सुरक्षित निकाला गया है। वहीं भारतीय विशेषज्ञ दल की मदद से रसुवा में अपर त्रिशूली-1 परियोजना के आसपास दो दिनों में करीब 250 लोगों का उद्धार किया गया। भारत के अलावा चीन और दक्षिण कोरिया के विशेषज्ञ दल भी नेपाली सेना के साथ मिलकर राहत और बचाव अभियान में जुटे हैं। भारतीय टीम सुरंग के भीतर करीब तीन किलोमीटर तक खोज अभियान चला रही है। प्राकृतिक आपदा के बीच बैंक से करोड़ों की संपत्ति सुरक्षित निकालना राहत और बचाव टीमों के लिए बड़ी कामयाबी मानी जा रही है। वहीं भोटेकोशी की बाढ़ ने नेपाल में आपदा प्रबंधन और राहत अभियानों के सामने मौजूद गंभीर चुनौतियों को भी उजागर किया है।


विदेशी मदद पर नेपाल का यू-टर्न! भारत-चीन से मांगी सहायता, दिल्ली ने तुरंत भेजी राहत सामग्री

by न्यूज डेस्क

काठमांडू: नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद सरकार ने विदेशी सहायता को लेकर अपने रुख में बदलाव किया है। पहले अंतरराष्ट्रीय खोज और बचाव टीमों की मदद लेने से इनकार करने वाली नेपाल सरकार अब सीमित स्तर पर विदेशी विशेषज्ञों और तकनीकी सहायता को अनुमति देने के लिए तैयार हो गई है। बताया जा रहा है कि आपदा में कई विदेशी नागरिकों के लापता होने के बाद नेपाल पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग लेने का दबाव बढ़ा। भारत ने इस मुश्किल घड़ी में नेपाल की मदद के लिए तेजी से कदम उठाए हैं। भारतीय तकनीकी टीम राहत और बचाव कार्यों में सहयोग के लिए काठमांडू पहुंच चुकी है। वहीं भारतीय वायु सेना भी राहत अभियान में सक्रिय है। भारत ने दवाइयों, खाद्य सामग्री और अन्य जरूरी सामानों समेत करीब 10 टन राहत सामग्री नेपाल भेजी है। भारतीय वायु सेना का सी-130 विमान आवश्यक राहत सामग्री लेकर नेपाल पहुंचा।

नेपाल सरकार ने शुरुआत में कहा था कि उसके अपने बचावकर्मी खोज अभियान चलाने में सक्षम हैं और विदेशी सर्च एंड रेस्क्यू टीमों की जरूरत नहीं है। हालांकि अब सरकार ने डीएनए परीक्षण, फॉरेंसिक जांच और अन्य तकनीकी क्षेत्रों में सीमित अंतरराष्ट्रीय सहयोग लेने का फैसला किया है। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, सरकार पर उन देशों की ओर से भी दबाव बढ़ा, जिनके नागरिक इस आपदा के बाद से लापता हैं। नेपाल सरकार का कहना है कि कुछ ऐसे तकनीकी क्षेत्र हैं, जहां विदेशी विशेषज्ञों की मदद उपयोगी हो सकती है, हालांकि मुख्य खोज और बचाव अभियान स्थानीय एजेंसियां ही संभालेंगी।

चीन-नेपाल सीमा के आसपास आई अचानक बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। रिपोर्टों के अनुसार, बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता हैं, जिनमें विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। इस आपदा के बाद भारत और चीन दोनों देशों से तकनीकी और अन्य आवश्यक सहयोग की मांग की गई है। बाढ़ की चपेट में कई भारतीय नागरिक भी आए हैं। कई लोगों से संपर्क नहीं हो पाने की खबर है, जबकि राहत और बचाव एजेंसियां लगातार प्रभावित इलाकों में लोगों की तलाश कर रही हैं। तिब्बत क्षेत्र में मौजूद कई भारतीय नागरिकों से संपर्क स्थापित किए जाने और उनके सुरक्षित होने की जानकारी भी सामने आई है।

इस बीच, रसुवा क्षेत्र की भोटेकोशी नदी में आई बाढ़ के बाद लापता लोगों की तलाश लगातार जारी है। तेज बहाव के कारण शव नदी के रास्ते दूर-दराज के इलाकों तक पहुंच रहे हैं। नवलपरासी पूर्व से होकर गुजरने वाली नारायणी नदी के अलग-अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में शव बरामद किए गए हैं। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, बरामद शवों को पहचान और पोस्टमार्टम की प्रक्रिया के लिए विभिन्न अस्पतालों और सुरक्षित स्थानों पर रखा गया है। कुछ शव अब भी नदी किनारे मौजूद हैं, जिन्हें सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने की तैयारी की जा रही है। नेपाल में जारी इस आपदा ने राहत और बचाव कार्यों को बेहद चुनौतीपूर्ण बना दिया है। लगातार बदलते हालात के बीच नेपाल सरकार अब अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की सीमित मदद लेकर लापता लोगों की पहचान, फॉरेंसिक जांच और अन्य तकनीकी कार्यों को तेज करने की कोशिश में जुटी है।


नेपाल-चीन सीमा पर बड़ा खतरा, 50 लाख क्यूबिक मीटर पानी से भर सकती है बैरियर लेक, अगले 72 घंटे अहम

नेपाल और चीन की सीमा के पास प्राकृतिक आपदा का खतरा अभी टला नहीं है। चीन के जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार, नेपाल सीमा के नजदीक छोचेन खोला और पुरेपु सांगपो नदियों के संगम क्षेत्र में एक बड़ा प्राकृतिक बैरियर लेक बन गया है। गुरुवार सुबह तक इस झील में करीब 20 लाख घन मीटर पानी जमा हो चुका था और झील से पानी ओवरफ्लो होने की स्थिति बताई गई है। अधिकारियों के अनुमान के मुताबिक अगले तीन दिनों में इस क्षेत्र में करीब 30 लाख घन मीटर अतिरिक्त पानी पहुंच सकता है। ऐसे में झील में कुल पानी की मात्रा करीब 50 लाख घन मीटर तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है। इससे प्राकृतिक रूप से बने इस बांध के टूटने और अचानक बाढ़ आने का खतरा बढ़ गया है।

प्राकृतिक बांध टूटने पर नेपाल की ओर बढ़ सकता है खतरा

यह बैरियर लेक छोचेन खोला और पुरेपु सांगपो नदियों के संगम के पास बनी है। यह इलाका चीन-नेपाल सीमा के करीब और ग्यीरोंग पोर्ट के ऊपरी क्षेत्र में स्थित बताया गया है। चीन के जल संसाधन विभाग के मुताबिक झील की स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। आशंका है कि यदि पानी का दबाव बढ़ने के कारण प्राकृतिक बांध टूटता है तो बड़ी मात्रा में पानी अचानक नीचे की ओर बह सकता है। इसका असर ग्यीरोंग पोर्ट और नेपाल की दिशा में पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

चीन कर रहा है बाढ़ का रियल-टाइम विश्लेषण

ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, चीन के जल संसाधन मंत्रालय ने झील की स्थिति को लेकर चेतावनी जारी की है। अधिकारी संभावित बाढ़ की स्थिति का सिमुलेशन और विश्लेषण कर रहे हैं, ताकि किसी आपात स्थिति में बचाव कार्यों की योजना बनाई जा सके। चाइना सेंट्रल टेलीविजन की रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारी नदी के निचले हिस्सों में संभावित खतरे का आकलन करने के लिए रियल-टाइम बाढ़ सिमुलेशन कर रहे हैं। इसका उद्देश्य झील के अचानक टूटने की स्थिति में संभावित नुकसान को कम करने और राहत-बचाव कार्यों में मदद करना है।

ग्लेशियर ढहने के बाद शुरू हुआ संकट

इससे पहले 26 अगस्त को तिब्बत क्षेत्र में ग्लेशियर ढहने की घटना के बाद ल्हेंडे नदी के अवरुद्ध होने और फिर पानी के बहाव से हालात बिगड़ गए थे। इसके बाद तिब्बत का ग्यीरोंग पोर्ट लैंडस्लाइड और फ्लैश फ्लड की चपेट में आ गया था। बाढ़ और भूस्खलन की घटनाओं के बाद चीन-नेपाल सीमा से सटे इलाकों में बड़े पैमाने पर नुकसान की खबरें सामने आईं। प्रभावित क्षेत्रों में राहत और बचाव अभियान चलाया जा रहा है।

ग्यीरोंग पहुंचे चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग

इस बीच चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग ने गुरुवार को तिब्बत में नेपाल सीमा के पास स्थित ग्यीरोंग टाउनशिप का दौरा किया। यह इलाका हाल में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन से प्रभावित हुआ है। सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, ली कियांग ने संबंधित विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ आपदा प्रभावित इलाकों का दौरा किया। अधिकारियों को राहत और बचाव कार्यों की निगरानी तथा प्रभावित लोगों की मदद के लिए लगाया गया है। इसके अलावा, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के वेस्टर्न थिएटर कमांड का एक डायरेक्टिंग ग्रुप भी प्रभावित क्षेत्र में भेजा गया है। इसका उद्देश्य ग्यीरोंग काउंटी में सेना और अन्य एजेंसियों द्वारा चलाए जा रहे संयुक्त राहत एवं बचाव अभियानों में समन्वय स्थापित करना बताया गया है।

अगले 72 घंटे बेहद अहम

फिलहाल सबसे बड़ी चिंता बैरियर लेक में लगातार बढ़ रहे पानी को लेकर है। गुरुवार सुबह तक करीब 20 लाख घन मीटर पानी जमा होने और अगले तीन दिनों में करीब 30 लाख घन मीटर अतिरिक्त पानी पहुंचने के अनुमान ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। यदि प्राकृतिक बांध पानी के बढ़ते दबाव को नहीं झेल पाया तो अचानक बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है। ऐसे में चीन के अधिकारी लगातार झील की गतिविधियों पर नजर रखे हुए हैं और संभावित आपात स्थिति से निपटने के लिए बाढ़ संबंधी विश्लेषण और बचाव तैयारियां की जा रही हैं।


अब US क्या करेगा? भारत-चीन की बढ़ती नजदीकी से बदलेगा खेल, टैरिफ के दबाव के बीच बड़ा निवेश प्लान

by पूजा झा

अमेरिका के साथ व्यापार और टैरिफ को लेकर भारत के रिश्तों में लगातार खींचतान के बीच भारत और चीन के बीच आर्थिक संबंधों में नई हलचल दिखाई दे रही है। दोनों देश कारोबार और निवेश को बढ़ावा देने के लिए एक नए फ्रेमवर्क पर काम कर रहे हैं। अगर यह योजना आगे बढ़ती है तो इसका असर सिर्फ भारत-चीन व्यापार पर नहीं, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन पर भी पड़ सकता है। मामले से जुड़े सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि सितंबर में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान चीन भारत के लिए संभावित निवेश पैकेज का ऐलान कर सकता है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल होने की संभावना है। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात भी हो सकती है।

भारत-चीन के बीच नए निवेश ढांचे की तैयारी

द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत और चीन बिजनेस-टू-बिजनेस संपर्क बढ़ाने और चीनी निवेश को भारत में आसान बनाने के लिए नए निवेश ढांचे पर विचार कर रहे हैं। इसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच कारोबार और पूंजी के प्रवाह को गति देना है। रिपोर्ट के अनुसार, इस पहल की नींव राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की हालिया बीजिंग यात्रा के दौरान हुई बातचीत से जुड़ी बताई जा रही है। हालांकि, भारत और चीन के बीच सीमा विवाद समेत कई संवेदनशील मुद्दे अभी भी मौजूद हैं, इसलिए आर्थिक सहयोग को रणनीतिक हितों के साथ संतुलित करने की कोशिश की जा रही है।

चीन ला सकता है निवेश पैकेज

प्रस्तावित फ्रेमवर्क के तहत चीन भारत में एक विशेष आर्थिक क्षेत्र स्थापित करने में निवेश कर सकता है, जहां समुद्री मार्गों तक आसान पहुंच उपलब्ध हो। इसके अलावा चीनी इलेक्ट्रिक वाहन कंपनियों, जिनमें BYD भी शामिल है, के लिए भारतीय बाजार में कारोबार के अवसर बढ़ाने पर भी चर्चा होने की बात कही गई है। एक अन्य प्रस्ताव भारत में चीनी फंडिंग से एक्सपोर्ट प्रोसेसिंग जोन स्थापित करने का है। इसका उद्देश्य भारत में तैयार होने वाले सामान को तीसरे देशों तक निर्यात करने की सुविधा बढ़ाना हो सकता है।

क्या भारत-चीन मिलकर सप्लाई चेन बदलेंगे?

भारत के लिए चीन के साथ आर्थिक रिश्तों में सुधार का एक बड़ा पहलू टेक्नोलॉजी और महत्वपूर्ण कच्चे माल की सप्लाई है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत चीन से इन क्षेत्रों में अधिक भरोसेमंद और सुगम आपूर्ति की गारंटी चाहता है। अगर दोनों देशों के बीच निवेश और व्यापार बढ़ता है तो इससे कंपनियों की सप्लाई चेन रणनीति पर असर पड़ सकता है। खासकर ऐसे समय में जब दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं चीन पर निर्भरता कम करने और वैकल्पिक सप्लाई चेन तैयार करने की कोशिश कर रही हैं।

बड़ा पैकेज आने की उम्मीद कम

हालांकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि शुरुआती निवेश पैकेज बहुत बड़ा होने की संभावना नहीं है। दोनों देश करीब छह साल के तनाव के बाद धीरे-धीरे आर्थिक और राजनयिक रिश्तों को सामान्य करने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए फिलहाल जोर बड़े समझौते के बजाय छोटे लेकिन व्यावहारिक कदमों पर है। भारत गैर-रणनीतिक क्षेत्रों में चीनी निवेश की मंजूरी प्रक्रिया को और आसान बनाने पर विचार कर रहा है। हालांकि, वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC), रक्षा और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों से जुड़े निवेश पर प्रतिबंध जारी रहने की बात कही गई है।

भारत चाहता है चीन से ज्यादा निवेश और ज्यादा आयात

भारत की तरफ से चीन से ज्यादा निवेश आकर्षित करने के साथ-साथ भारत से चीनी बाजार में आयात बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है। इसका मकसद दोनों देशों के बीच मौजूद बड़े व्यापार घाटे को कम करना है। हाल ही में भारत ने कुछ चीनी हिस्सेदारी वाली कंपनियों के लिए निवेश नियमों में भी ढील दी है। इसके बाद करीब 29 एफडीआई प्रस्तावों के तहत लगभग 4,895 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव सामने आए हैं। यानी एक तरफ अमेरिका के साथ टैरिफ और व्यापार को लेकर दबाव बना हुआ है, तो दूसरी तरफ भारत और चीन आर्थिक रिश्तों को धीरे-धीरे पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, इसे किसी बड़े रणनीतिक गठबंधन के तौर पर देखना अभी जल्दबाजी होगी। दोनों देशों के बीच सीमा और सुरक्षा से जुड़े मतभेद अब भी महत्वपूर्ण मुद्दे बने हुए हैं।


भोटेकोशी आपदा में करीब 100 चीनी नागरिक लापता, नेपाल में 100 भारतीय पर्यटक सुरक्षित मिले

by पूजा झा

बीजिंग/काठमांडू: नेपाल-चीन सीमा से सटे हिमालयी क्षेत्र में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने दोनों देशों में भारी तबाही मचाई है। चीन के विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को बताया कि प्रभावित इलाके में चीन के करीब 100 नागरिक लापता हैं। इनमें पर्यटक, तीर्थयात्री और अन्य नागरिक शामिल बताए जा रहे हैं। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने बीजिंग में नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि चीन नेपाल के साथ लगातार संपर्क में है और दोनों देशों की एजेंसियां खोज एवं बचाव अभियान को लेकर समन्वय कर रही हैं।

पर्यटक और तीर्थयात्री भी लापता लोगों में शामिल

लिन जियान ने बताया कि लापता चीनी नागरिकों में पर्यटक और तीर्थयात्री भी शामिल हैं। हालांकि, जब अन्य लापता विदेशी नागरिकों की राष्ट्रीयता को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि इस संबंध में विस्तृत जानकारी की पुष्टि की जा रही है। चीन के विदेश मंत्रालय के मुताबिक, संबंधित दूतावासों के साथ भी लगातार संपर्क बनाए रखा गया है और प्रभावित लोगों की स्थिति की जानकारी जुटाई जा रही है।

जिनपिंग ने दिए राहत और बचाव के निर्देश

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने दक्षिण-पश्चिम चीन के शिजैंग ऑटोनॉमस रीजन में गिरोंग सीमा क्षेत्र में मडस्लाइड और बाढ़ से हुए नुकसान के बाद बड़े स्तर पर राहत एवं बचाव अभियान चलाने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि खतरे में फंसे लोगों को जल्द से जल्द सुरक्षित निकाला जाए और घायलों को समय पर चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जाए, ताकि जनहानि और नुकसान को कम किया जा सके। चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग ने भी अधिकारियों को लापता और प्रभावित लोगों की संख्या की जल्द पुष्टि करने तथा राहत एवं बचाव कार्यों में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं।

नेपाल के साथ बेहतर तालमेल पर जोर

चीन की सरकार ने विदेश मंत्रालय और संबंधित एजेंसियों को प्रभावित क्षेत्रों से जुड़े देशों के साथ समन्वय बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। अधिकारियों से कहा गया है कि आपदा से संबंधित जानकारी तेजी से साझा की जाए और राहत-बचाव अभियान में आपसी सहयोग को मजबूत किया जाए। इस बीच चीन के उप-प्रधानमंत्री झांग गुओकिंग ने भी संबंधित अधिकारियों के साथ प्रभावित क्षेत्र का दौरा किया और बचाव तथा आपदा प्रबंधन कार्यों की समीक्षा की।

भारत के लिए राहत की खबर

इस भीषण आपदा के बीच नेपाल से भारत के लिए राहत भरी खबर भी सामने आई है। नेपाली अधिकारियों के अनुसार, बाढ़ के बाद लापता बताए जा रहे करीब 100 भारतीय पर्यटकों का पता लगा लिया गया है और उन्हें सुरक्षित पाया गया है। इसके अलावा, करीब 25 चीनी कामगारों को भी खोजे जाने की जानकारी सामने आई है। 
नेपाल और चीन के सीमा क्षेत्रों में आई इस प्राकृतिक आपदा के बाद राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है। दोनों देशों की एजेंसियां लापता लोगों की तलाश में जुटी हैं और प्रभावित इलाकों में फंसे लोगों तक सहायता पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।


संकट की घड़ी में भारत ने निभाई दोस्ती, नेपाल को भेजी 35 टन से ज्यादा राहत सामग्री की दूसरी खेप

by पूजा झा

नई दिल्ली/काठमांडू: नेपाल में तिब्बत सीमा के पास आई भीषण फ्लैश फ्लड के बाद भारत ने मानवीय सहायता अभियान तेज कर दिया है। तबाही से जूझ रहे नेपाल के लिए भारत ने राहत सामग्री की दूसरी बड़ी खेप भेजने की तैयारी की है। गुरुवार सुबह हिंडन एयरबेस से भारतीय वायुसेना के C-17 सैन्य परिवहन विमान के जरिए 35 टन से ज्यादा राहत सामग्री नेपाल भेजी जा रही है। यह सहायता भारत की ओर से नेपाल के लिए चलाए जा रहे व्यापक मानवीय राहत अभियान का हिस्सा है। विमान के जरिए जरूरी राहत सामग्री, आपदा प्रभावित लोगों के लिए आवश्यक सामान और अन्य मानवीय सहायता पहुंचाई जा रही है।

पहली खेप में भेजी गई थी 10 टन राहत सामग्री

भारत ने इससे पहले बुधवार रात नेपाल को राहत सामग्री की पहली खेप भेजी थी। भारतीय वायुसेना के C-130J विमान के जरिए करीब 10 टन मानवीय सहायता और जरूरी मेडिकल सामग्री काठमांडू पहुंचाई गई थी। इस खेप में अस्थायी आश्रय से जुड़ा सामान, कंबल, हाइजीन किट, सोलर लैंप और जरूरी दवाइयां शामिल थीं। आपदा प्रभावित इलाकों में इन सामग्रियों का इस्तेमाल राहत और बचाव कार्यों के लिए किया जा रहा है। नेपाल में आई इस भीषण फ्लैश फ्लड ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है। कई इलाकों में सड़कें, पुल और अन्य बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है। बड़ी संख्या में लोगों के प्रभावित होने और कई लोगों के लापता होने की भी खबरें हैं। प्रभावित क्षेत्रों में राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है।

पीएम मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री से की बात

नेपाल को राहत सामग्री भेजने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह से फोन पर बातचीत की थी। प्रधानमंत्री मोदी ने आपदा की इस घड़ी में नेपाल के लोगों के प्रति एकजुटता जताई और हर संभव मानवीय सहायता उपलब्ध कराने का भरोसा दिया। पीएम मोदी ने कहा कि भारत की संबंधित एजेंसियां नेपाल में राहत और बचाव प्रयासों के लिए स्थानीय प्रशासन और अन्य एजेंसियों के साथ करीबी समन्वय में काम कर रही हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी नेपाल के लिए भारत की मानवीय सहायता की जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि भारत ने नेपाल को HADR यानी Humanitarian Assistance and Disaster Relief के तहत राहत सामग्री और जरूरी दवाइयां भेजी हैं।

आगे भी जारी रहेगा राहत अभियान

भारतीय वायुसेना के अनुसार, जरूरत के हिसाब से C-17 और C-130 जैसे सैन्य परिवहन विमानों के जरिए आगे भी राहत सामग्री भेजी जाएगी। इसके अलावा, जरूरत पड़ने पर हेलीकॉप्टरों को रेस्क्यू और इवैक्यूएशन ऑपरेशन के लिए भी तैयार रखा गया है। नेपाल में भारतीय दूतावास भी राहत अभियान में सक्रिय रूप से सहयोग कर रहा है। भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव ने नेपाल सरकार के संबंधित अधिकारियों को मानवीय सहायता सामग्री सौंपी है। भारत ने साफ किया है कि संकट की इस घड़ी में वह अपने पड़ोसी और करीबी मित्र नेपाल के साथ मजबूती से खड़ा है। राहत और बचाव अभियान के लिए आवश्यकतानुसार हर संभव सहायता जारी रखी जाएगी।


अचानक आया सैलाब और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स-गाड़ियों को बहाता चला गया, नेपाल में तबाही

by पूजा झा

नेपाल के रसुवा जिले में तिब्बत की ओर से अचानक आई भीषण बाढ़ ने भारी तबाही मचा दी है। लेन्दे खोला यानी भोटेकोशी नदी में आए तेज सैलाब ने टिमुरे बाजार, रसुवागढ़ी सीमा क्षेत्र और कस्टम इलाके को बुरी तरह प्रभावित किया। बाढ़ के तेज बहाव में बड़ी संख्या में वाहन, सामान और कई ढांचों के बह जाने की खबर है। जलविद्युत परियोजनाओं और आसपास की बस्तियों को भी गंभीर नुकसान पहुंचा है। स्थानीय प्रशासन के मुताबिक, बुधवार सुबह अचानक आए सैलाब ने देखते ही देखते पूरे इलाके में अफरातफरी मचा दी। बाढ़ की भयावहता को देखते हुए राहत और बचाव अभियान तेज कर दिया गया है। नेपाली सेना के हेलीकॉप्टर प्रभावित इलाकों के लिए रवाना किए गए हैं, जबकि कई जिलों में नदी किनारे रहने वाले लोगों को हाई अलर्ट पर रहने को कहा गया है।

टिमुरे बाजार और कस्टम क्षेत्र में भारी नुकसान

रसुवा के सहायक प्रमुख जिला अधिकारी ध्रुव प्रसाद अधिकारी के अनुसार, टिमुरे बाजार समेत आसपास के दो बाजार बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। रसुवा सीमा क्षेत्र के कस्टम इलाके में खड़े कई वाहन और बड़ी मात्रा में सामान तेज पानी के बहाव में बह गए। बताया जा रहा है कि पिछले साल की बाढ़ में क्षतिग्रस्त हुए स्थान पर हाल ही में बनाया गया नया पुल भी इस बार बाढ़ के तेज बहाव को नहीं झेल सका और बह गया। इससे सीमा क्षेत्र और आसपास के इलाकों में आवाजाही प्रभावित हुई है। जिला पुलिस कार्यालय रसुवा के मुताबिक, सुबह करीब 9 बजे अचानक आई बाढ़ ने टिमुरे बाजार की बस्ती को अपनी चपेट में ले लिया। प्रशासन को निचले तटीय इलाकों में जलविद्युत परियोजनाओं के क्षतिग्रस्त होने और कई बस्तियों में पानी घुसने की सूचना मिली है।

हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट भी प्रभावित

रसुवा के प्रमुख जिला अधिकारी नरेन्द्र परियार ने बताया कि भोटेकोशी नदी के निचले इलाकों में कई जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान पहुंचने की जानकारी मिली है। हालांकि नुकसान का पूरा आकलन राहत और बचाव कार्य के बाद ही किया जा सकेगा। नेपाल के पहाड़ी इलाकों में हाइड्रोपावर परियोजनाएं स्थानीय अर्थव्यवस्था और बिजली उत्पादन के लिए बेहद अहम मानी जाती हैं। ऐसे में बाढ़ से इन परियोजनाओं को हुए नुकसान ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है।

तीन पुलिस कार्यालयों पर भी बाढ़ का असर

अचानक आई बाढ़ ने नेपाल पुलिस के तीन कार्यालयों को भी प्रभावित किया है। पुलिस प्रधान कार्यालय के अनुसार, इलाका प्रहरी कार्यालय टिमुरे, प्रहरी चौकी स्याफ्रुबेसी और प्रहरी चौकी रसुवागढ़ी बाढ़ की चपेट में आए हैं। बाढ़ का असर केवल रसुवा तक सीमित नहीं रहा। प्रशासन के मुताबिक, इसका प्रभाव नुवाकोट तक पहुंचने की भी सूचना है। कई निचले इलाकों में नदी के जलस्तर और तेज बहाव को लेकर लगातार निगरानी की जा रही है।

चार जिलों की ओर जाने वाले वाहन रोके गए

बाढ़ और संभावित खतरे को देखते हुए काठमांडू उपत्यका ट्रैफिक पुलिस ने कई इलाकों की ओर जाने वाले वाहनों की आवाजाही रोक दी है। काठमांडू से रसुवा, नुवाकोट, चितवन और धादिङ जाने वाले वाहनों को एहतियातन रोकने का फैसला किया गया है। काठमांडू उपत्यका ट्रैफिक पुलिस कार्यालय के एसपी नरेशराज सुवेदी के मुताबिक, बाढ़ की स्थिति और सड़क मार्गों की सुरक्षा को देखते हुए यह कदम उठाया गया है। प्रशासन ने लोगों से अनावश्यक यात्रा से बचने की अपील की है।

राहत-बचाव के लिए सेना के हेलीकॉप्टर रवाना

बाढ़ प्रभावित इलाकों में फंसे लोगों को सुरक्षित निकालने और राहत सामग्री पहुंचाने के लिए नेपाली सेना के दो हेलीकॉप्टर रसुवा भेजे गए हैं। नेपाली सेना के प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल राजाराम बस्नेत ने बताया कि दोनों हेलीकॉप्टर प्रभावित क्षेत्र की स्थिति का आकलन करने और जरूरत पड़ने पर राहत-बचाव अभियान चलाने के लिए रवाना किए गए हैं। भोटेकोशी नदी में अचानक आई बाढ़ के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय ने निजी हेलीकॉप्टर कंपनियों को भी तैयार रहने का निर्देश दिया है, ताकि जरूरत पड़ने पर तत्काल राहत अभियान शुरू किया जा सके।

पांच जिलों में नदी किनारे रहने वालों को अलर्ट

भोटेकोशी नदी में आई बाढ़ के बाद रसुवा, नुवाकोट, धादिङ, गोरखा और चितवन के नदी तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों को सतर्क रहने की अपील की गई है। नेपाल सरकार ने चेतावनी दी है कि भोटेकोशी और त्रिशूली नदी के किनारे कई इलाके हाई रिस्क जोन में हैं। लोगों से अगले आदेश तक सुरक्षित स्थानों पर रहने और प्रशासन के निर्देशों का पालन करने को कहा गया है। गृह मंत्री सुदन गुरुंग ने नदी किनारे रहने वाले परिवारों से तत्काल सुरक्षित स्थानों की ओर जाने की अपील की है। सरकार ने पृथ्वी राजमार्ग, गल्छी-नुवाकोट-रसुवा-स्याफ्रुबेसी सड़क और मुग्लिन-नारायणगढ़ मार्ग पर यात्रा न करने की भी सलाह दी है।

आपात बैठक में राहत और बचाव पर मंथन

रसुवा में बड़े पैमाने पर हुई तबाही के बाद गृह मंत्री की मौजूदगी में मानसून प्रतिकार्य कमान्ड पोस्ट की आपात बैठक बुलाई गई है। बैठक में बाढ़ से हुए नुकसान का आकलन, लापता या फंसे लोगों की तलाश और राहत सामग्री पहुंचाने को लेकर रणनीति बनाई जा रही है। सरकार की प्राथमिकता फिलहाल प्रभावित इलाकों में फंसे लोगों को सुरक्षित निकालना, नदी किनारे रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाना और प्रभावित परिवारों को जरूरी राहत उपलब्ध कराना है।

प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने बुलाई आपात बैठक

नेपाल में बाढ़ से मची तबाही के बीच प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन को लेकर आपात बैठक बुलाई है। प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, सरकार प्रभावित जिलों के प्रशासनिक अधिकारियों के लगातार संपर्क में है और हालात पर नजर रखी जा रही है। अचानक आए इस सैलाब ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों में बाढ़ के बढ़ते खतरे को सामने ला दिया है। प्रशासन अभी नुकसान का पूरा आंकलन कर रहा है, लेकिन शुरुआती जानकारी के अनुसार रसुवा जिले में बड़े पैमाने पर संपत्ति, सड़क, पुल, वाहन और अन्य बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा है। राहत और बचाव अभियान जारी है और सरकार ने लोगों से अफवाहों से बचने तथा केवल आधिकारिक निर्देशों का पालन करने की अपील की है।


पुतिन से मिले जयशंकर, सौंपा पीएम मोदी का निजी संदेश, भारत-रूस संबंधों पर हुई अहम चर्चा

by पूजा झा

विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने अपनी रूस यात्रा के दौरान सोमवार को राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की। इस बैठक को भारत और रूस के बीच रणनीतिक साझेदारी के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मुलाकात के बाद जयशंकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इसकी जानकारी साझा की। जयशंकर ने बताया कि उन्होंने राष्ट्रपति पुतिन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निजी संदेश सौंपा। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग और 27वीं भारत-रूस अंतर-सरकारी आयोग (IRIGC-TEC) की बैठक में हुई चर्चाओं से भी रूसी राष्ट्रपति को अवगत कराया।

पुतिन से किन मुद्दों पर हुई बातचीत?

जयशंकर ने कहा कि राष्ट्रपति पुतिन से मुलाकात के दौरान क्षेत्रीय और वैश्विक महत्व के कई मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई। उन्होंने यह भी कहा कि भारत रूस के साथ संबंधों को आगे बढ़ाने में राष्ट्रपति पुतिन के मार्गदर्शन को महत्व देता है। विदेश मंत्री की यह यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब भारत-रूस संबंधों को व्यापार, अर्थव्यवस्था और अन्य क्षेत्रों में और मजबूत करने के प्रयास जारी हैं। ऐसे में जयशंकर और पुतिन की बैठक को दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संपर्क की कड़ी के तौर पर देखा जा रहा है।

दो दिवसीय रूस दौरे पर हैं जयशंकर

जयशंकर रविवार को रूस की दो दिवसीय यात्रा के तहत मॉस्को पहुंचे थे। यह दौरा आगामी ब्रिक्स नेताओं के शिखर सम्मेलन की तैयारियों के बीच हो रहा है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भी 12-13 सितंबर को होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए नई दिल्ली आने की बात कही गई है। जयशंकर की यात्रा का उद्देश्य भारत और रूस के बीच द्विपक्षीय सहयोग के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा करना और आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाने के रास्तों पर चर्चा करना भी है।

रूसी उप-प्रधानमंत्री से भी हुई मुलाकात

पुतिन से मुलाकात से पहले जयशंकर ने रूस के उप-प्रधानमंत्री डेनिस मंतुरोव के साथ बैठक की। दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय व्यापार और आर्थिक सहयोग को बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा की। बैठक के दौरान जयशंकर ने भारत-रूस साझेदारी को लेकर कहा कि दोनों देशों के संबंधों ने बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच खुद को लगातार मजबूत और अनुकूल साबित किया है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बावजूद भारत और रूस के आपसी संबंध लगातार गहरे हुए हैं। विदेश मंत्री के मुताबिक, दोनों देशों के रिश्तों की मजबूती आपसी हित और भरोसे पर आधारित है।

लावरोव से भी होगी अहम बातचीत

जयशंकर के रूस दौरे के दौरान रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ भी बैठक प्रस्तावित है। दोनों नेता क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों के साथ-साथ भारत-रूस द्विपक्षीय संबंधों पर व्यापक चर्चा कर सकते हैं। यह बैठक जयशंकर और लावरोव की 22 जुलाई को मनीला में हुई मुलाकात के करीब एक महीने बाद होगी। उस दौरान आसियान से जुड़ी मंत्रिस्तरीय बैठकों के इतर दोनों नेताओं ने भारत-रूस संबंधों की समीक्षा की थी। मनीला बैठक में यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया की स्थिति सहित कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी विचारों का आदान-प्रदान हुआ था। जयशंकर ने पश्चिम एशिया में भारतीय नाविकों की सुरक्षा को लेकर भारत की चिंता भी रूस के सामने रखी थी। जयशंकर का मौजूदा मॉस्को दौरा ऐसे समय में हो रहा है, जब भारत और रूस अपने पारंपरिक रणनीतिक संबंधों को बदलते वैश्विक और आर्थिक माहौल के अनुरूप आगे बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। पुतिन के साथ हुई मुलाकात और आगामी उच्चस्तरीय वार्ताओं से दोनों देशों के बीच सहयोग के नए क्षेत्रों को लेकर तस्वीर और स्पष्ट होने की उम्मीद है।


J-16 बनाम राफेल की डॉगफाइट से भारत अलर्ट, मिस्र के आसमान में चीन ने दिखाई ताकत, जानें क्यों अहम है ये ड्रिल

by पूजा झा

चीन और मिस्र के बीच चल रहे संयुक्त सैन्य अभ्यास में चीनी J-16 फाइटर जेट और फ्रांस निर्मित राफेल विमानों के बीच डॉगफाइट का अभ्यास किया गया। देखने में यह एक सामान्य सैन्य ड्रिल लग सकती है, लेकिन भारत के लिए इसका रणनीतिक महत्व काफी ज्यादा है। इसकी वजह भारत-पाकिस्तान के बीच हालिया सैन्य टकराव, पाकिस्तान के साथ चीन का बढ़ता रक्षा सहयोग और J-16 जैसे उन्नत चीनी लड़ाकू विमान की क्षमताएं हैं।

मिस्र के आसमान में J-16 और राफेल आमने-सामने

चीन और मिस्र के बीच 'ईगल्स ऑफ सिविलाइज़ेशन' नाम से सैन्य अभ्यास आयोजित किया जा रहा है। इसके दूसरे चरण की शुरुआत 22 अगस्त से हुई। इस दौरान चीनी वायुसेना के J-16 विमानों ने मिस्र के राफेल फाइटर जेट्स के साथ आमने-सामने की हवाई लड़ाई यानी डॉगफाइट का अभ्यास किया। इस अभ्यास में मिस्र के MiG-29 लड़ाकू विमान भी शामिल रहे। चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की ओर से जारी फुटेज में J-16 और राफेल को नजदीकी हवाई युद्ध जैसे हालात में अभ्यास करते देखा गया। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चीनी फाइटर जेट के लिए राफेल के खिलाफ इस तरह का प्रत्यक्ष अभ्यास एक दुर्लभ मौका माना जा रहा है।

क्यों महत्वपूर्ण है J-16 बनाम राफेल की भिड़ंत?

J-16 और राफेल दोनों को 4.5 जनरेशन के आधुनिक लड़ाकू विमानों की श्रेणी में रखा जाता है। दोनों में अत्याधुनिक एवियोनिक्स, रडार और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम जैसी क्षमताएं मौजूद हैं। चीन का J-16 एक भारी, ट्विन-इंजन और टू-सीटर मल्टीरोल फाइटर है। इसे लंबी दूरी के मिशन और भारी हथियार ले जाने के लिए डिजाइन किया गया है। चीन इसे अपने प्रमुख कॉम्बैट एयरक्राफ्ट में गिनता है। वहीं राफेल फ्रांस की कंपनी डसॉल्ट एविएशन द्वारा विकसित मल्टीरोल फाइटर जेट है। भारतीय वायुसेना के राफेल विमानों में भारत की जरूरतों के अनुसार कई विशेष अपग्रेड किए गए हैं। इसलिए मिस्र के राफेल और भारतीय वायुसेना के राफेल को पूरी तरह एक जैसा मानना सही नहीं होगा

भारत की नजर इस युद्धाभ्यास पर क्यों?

भारत के लिए इस अभ्यास की अहमियत का सबसे बड़ा कारण पाकिस्तान है। पाकिस्तान चीन निर्मित J-10C और JF-17 जैसे लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल करता है। इसके अलावा पाकिस्तान की ओर से J-16 में भी दिलचस्पी दिखाई गई है। ऐसे में चीनी J-16 को राफेल के सामने वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में अभ्यास करते देखना भारतीय रक्षा विशेषज्ञों के लिए महत्वपूर्ण जानकारी दे सकता है। इससे J-16 की हवाई युद्ध क्षमता, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और अलग-अलग परिस्थितियों में प्रदर्शन को समझने में मदद मिल सकती है। भारत खुद भी राफेल के अपने बेड़े को और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है और 114 अतिरिक्त राफेल विमानों की संभावित खरीद की योजना पर चर्चा होती रही है। ऐसे में चीन के अत्याधुनिक फाइटर जेट की क्षमताओं पर नजर रखना भारत की रणनीतिक जरूरतों से जुड़ा विषय है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी दिलचस्पी

इस पूरे घटनाक्रम को हालिया भारत-पाकिस्तान सैन्य टकराव के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय राफेल समेत कई लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल हुआ था, जबकि पाकिस्तान के पास चीनी J-10C और JF-17 जैसे विमान मौजूद हैं। इसी वजह से चीन के J-16 का राफेल के साथ अभ्यास भारतीय वायुसेना के लिए विशेष रुचि का विषय बन जाता है। भारत यह समझना चाहेगा कि चीन का एक भारी और अधिक आधुनिक लड़ाकू विमान किस तरह की रणनीति और क्षमताओं के साथ राफेल जैसे विमान का मुकाबला कर सकता है। चीन और पाकिस्तान के बीच रक्षा सहयोग भी लगातार चर्चा में रहा है। पाकिस्तान की ओर से भविष्य में J-16 जैसे विमान हासिल करने की संभावित दिलचस्पी इस पूरे घटनाक्रम को भारत के लिए और महत्वपूर्ण बनाती है।

चीन की रणनीति का हिस्सा है ऐसी एक्सरसाइज?

विशेषज्ञ इस तरह के सैन्य अभ्यासों को चीन की उस रणनीति से भी जोड़कर देखते हैं, जिसमें वह ऐसे देशों के साथ एयर कॉम्बैट एक्सरसाइज करता है, जिनकी वायुसेना पश्चिमी देशों के लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल करती है। इससे चीनी पायलटों को अलग-अलग डिजाइन और तकनीक वाले विमानों के खिलाफ अभ्यास करने का अवसर मिलता है। इससे चीन को अपनी वायु युद्ध रणनीति और पायलटों की ऑपरेशनल तैयारी को परखने में मदद मिल सकती है।हाल में चीन ने थाईलैंड के साथ भी संयुक्त हवाई अभ्यास किया था। थाई वायुसेना F-16 और स्वीडन के Saab Gripen जैसे पश्चिमी मूल के लड़ाकू विमानों का संचालन करती है।

भारत के लिए क्या है सबसे बड़ा संदेश?

J-16 और राफेल की यह डॉगफाइट किसी युद्ध का हिस्सा नहीं, बल्कि सैन्य अभ्यास है। इसलिए इसके नतीजे को सीधे वास्तविक युद्ध में दोनों विमानों की जीत-हार के तौर पर देखना सही नहीं होगा। डॉगफाइट में पायलट का अनुभव, हथियारों का कॉन्फिगरेशन, रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, एयरबोर्न सपोर्ट और मिशन की परिस्थितियां भी अहम भूमिका निभाती हैं। फिर भी भारत के लिए इस अभ्यास की निगरानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन की वायु शक्ति लगातार बढ़ रही है और पाकिस्तान के साथ उसका रक्षा सहयोग भी भारत की सुरक्षा गणना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। खास तौर पर J-16 जैसे भारी और लंबी दूरी के मल्टीरोल फाइटर की क्षमताओं को समझना भारतीय वायुसेना के लिए रणनीतिक रूप से उपयोगी हो सकता है। मिस्र के आसमान में हुआ यह अभ्यास इसलिए सिर्फ चीन-मिस्र की सैन्य साझेदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत, चीन और पाकिस्तान के बदलते एयर-पावर समीकरण पर भी नजर डालने का मौका देता है।


अमेरिकी प्रतिबंधों का ईरान पर बड़ा असर, डॉलर के मुकाबले रियाल रिकॉर्ड निचले स्तर पर, 1 डॉलर के लिए देने पड़ रहे 20 लाख रियाल

by पूजा झा

अमेरिका के साथ जारी तनाव, युद्ध और लगातार बढ़ते आर्थिक प्रतिबंधों का असर अब ईरान की अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है। ईरानी मुद्रा रियाल अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई है। अनौपचारिक बाजार में एक अमेरिकी डॉलर की कीमत करीब 20.2 लाख ईरानी रियाल तक पहुंच गई है। यह गिरावट ऐसे समय में आई है, जब अमेरिका ईरान के खिलाफ और कड़े आर्थिक कदम उठाने की तैयारी कर रहा है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने नई कार्रवाई को ईरान के खिलाफ बड़े आर्थिक दबाव अभियान का हिस्सा बताया है। नई पाबंदियों में उन देशों और संस्थाओं को भी निशाना बनाया जा सकता है, जो ईरान के साथ व्यापार या आर्थिक संबंध जारी रखते हैं।

अनौपचारिक बाजार में 20.2 लाख रियाल का हुआ डॉलर

रिपोर्ट के मुताबिक, सोमवार को अनौपचारिक मुद्रा बाजार खुलने के साथ ही ईरानी रियाल गिरकर 1 डॉलर के मुकाबले 20.2 लाख रियाल तक पहुंच गया। यह रियाल का नया रिकॉर्ड निचला स्तर बताया जा रहा है। ईरान के केंद्रीय बैंक की आधिकारिक विनिमय दर करीब 15 लाख रियाल प्रति डॉलर है। हालांकि, आम लोगों और कारोबारियों के लिए अनौपचारिक बाजार की दर कहीं अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि बड़ी संख्या में लेनदेन उसी बाजार की वास्तविक कीमतों से प्रभावित होते हैं।

युद्ध से पहले ही कमजोर थी ईरान की अर्थव्यवस्था

ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव कोई नई बात नहीं है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण देश लंबे समय से आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा था। इसके अलावा महंगाई और आर्थिक वृद्धि की कमजोरी ने आम लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी थीं। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद शुरू हुए संघर्ष ने ईरानी अर्थव्यवस्था पर दबाव और बढ़ा दिया। करीब छह महीने से जारी युद्ध के कारण रियाल लगातार कमजोर होता गया। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी ईरान की अर्थव्यवस्था में बड़ी गिरावट की आशंका जताई है।

महंगाई ने आम ईरानी की मुश्किल बढ़ाई

मुद्रा के कमजोर होने का सबसे सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ता है। रियाल की कीमत गिरने से आयात महंगा हो जाता है और रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुओं के दाम तेजी से बढ़ सकते हैं। रिपोर्टों के अनुसार, युद्ध शुरू होने के बाद ईरान में कई जरूरी खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है। चावल की कीमतों में करीब 60 प्रतिशत तक वृद्धि का जिक्र किया गया है, जबकि बीफ के दामों में इससे भी ज्यादा उछाल दर्ज किया गया।

आर्थिक दबाव के बावजूद होर्मुज पर ईरान की पकड़

हालांकि, आर्थिक मोर्चे पर कमजोर पड़ने के बावजूद ईरान के पास एक बड़ा रणनीतिक हथियार अब भी मौजूद है—स्ट्रेट ऑफ होर्मुज। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। युद्ध शुरू होने से पहले वैश्विक स्तर पर कारोबार होने वाले तेल का करीब पांचवां हिस्सा इस जलमार्ग से गुजरता था। युद्ध के दौरान ईरानी हमलों और सुरक्षा संबंधी खतरों के कारण इस मार्ग से जहाजों की आवाजाही गंभीर रूप से प्रभावित हुई है। अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए यह एक बड़ी रणनीतिक चुनौती बनी हुई है।

ईरान और ओमान के बीच नई योजना पर चर्चा

होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान और ओमान के बीच बातचीत भी जारी है। रिपोर्टों के मुताबिक, दोनों देश जहाजों की आवाजाही और जलमार्ग के प्रबंधन को लेकर एक संभावित व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। प्रस्तावित मॉडल में फारस की खाड़ी में प्रवेश और बाहर निकलने के लिए अलग-अलग मार्गों के इस्तेमाल की संभावना पर विचार किया जा रहा है। हालांकि, इस संबंध में अंतिम समझौते और उसकी शर्तों को लेकर स्थिति अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

ओमान पर भी ट्रंप की नाराजगी

इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ओमान को लेकर भी कड़ा रुख अपनाया है। रिपोर्टों के मुताबिक, उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर ओमान ईरान युद्ध को समाप्त करने की अमेरिकी कोशिशों में बाधा बनता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। ओमान लंबे समय से अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है। फिलहाल भी दोनों देशों के बीच होर्मुज और क्षेत्रीय तनाव को लेकर बातचीत जारी है।

अमेरिका लाएगा और कड़े प्रतिबंध?

अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने संकेत दिया है कि वॉशिंगटन ईरान पर आर्थिक दबाव और बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। इसमें ईरान के साथ कारोबार करने वाले देशों और कंपनियों पर सेकेंडरी प्रतिबंध लगाने की संभावना भी शामिल है। अमेरिका इससे पहले भी ईरान की कथित अवैध वित्तीय और शिपिंग नेटवर्क पर कार्रवाई कर चुका है। अमेरिकी ट्रेजरी ने अगस्त में कई अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क पर प्रतिबंध लगाए थे, जिन पर ईरान की वित्तीय गतिविधियों को समर्थन देने का आरोप था।

UAE ने भी रोका ईरान के साथ व्यापार

तनाव के बीच संयुक्त अरब अमीरात ने पिछले सप्ताह ईरान के साथ व्यापार निलंबित करने की घोषणा की थी। UAE लंबे समय से ईरान के महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदारों में रहा है और ईरानी कारोबार के लिए आयात, पुनः निर्यात और वित्तीय गतिविधियों का प्रमुख केंद्र माना जाता रहा है। ईरान की ओर से भी अमेरिका के बढ़ते आर्थिक दबाव पर कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई है। ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल से जुड़े वरिष्ठ नेता मोहसेन रेजाई ने चेतावनी दी है कि नई अमेरिकी आर्थिक कार्रवाई का समर्थन करने वाले देशों के कदम को तेहरान गंभीर रूप से देखेगा।

क्या और बिगड़ेगी ईरान की स्थिति?

फिलहाल ईरान दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है। एक तरफ युद्ध और सैन्य तनाव है, दूसरी तरफ लगातार कमजोर होती अर्थव्यवस्था और रियाल की रिकॉर्ड गिरावट।  अमेरिका अगर नई और व्यापक आर्थिक पाबंदियां लागू करता है तो ईरान पर दबाव और बढ़ सकता है। लेकिन दूसरी तरफ होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान की रणनीतिक स्थिति यह संकेत देती है कि तेहरान के पास अभी भी ऐसा दबाव बनाने का साधन मौजूद है, जिसका असर सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि वैश्विक तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ सकता है। यानी अमेरिका आर्थिक मोर्चे पर ईरान को घेरने की कोशिश कर रहा है, जबकि ईरान अपनी रणनीतिक ताकत के जरिए जवाब देने की स्थिति में है। इस टकराव का अगला चरण न सिर्फ तेहरान और वॉशिंगटन, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए अहम साबित हो सकता है।


ट्रंप-मोदी मुलाकात में सवालों पर भारत ने जताई थी आपत्ति? सर्जियो गोर के दावे पर सरकार ने दी सफाई

by पूजा झा

अमेरिका के भारत में राजदूत सर्जियो गोर के एक बयान के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की जून में हुई मुलाकात को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। गोर ने दावा किया था कि फ्रांस में G7 शिखर सम्मेलन के दौरान मोदी-ट्रंप मुलाकात से पहले भारतीय पक्ष ने मीडिया को मौजूद रहने की अनुमति देने, लेकिन पत्रकारों के सवाल नहीं लेने की इच्छा जताई थी। हालांकि, अब भारत सरकार के सूत्रों ने इसे किसी असामान्य कदम के बजाय VVIP कार्यक्रमों की सामान्य प्रक्रिया बताया है।
क्या कहा था सर्जियो गोर ने?

अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने Economic Times World Leaders Forum में जून 2026 में फ्रांस के एवियन-ले-बेन में हुई मोदी-ट्रंप मुलाकात का जिक्र किया। उनके मुताबिक, बैठक से पहले अमेरिकी पक्ष को भारत की ओर से बताया गया था कि मीडिया को कार्यक्रम में मौजूद रहने दिया जाए, लेकिन सवाल-जवाब का पूरा सत्र न हो। 
गोर के मुताबिक, उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भारत की इस प्राथमिकता के बारे में जानकारी दी थी। हालांकि, बैठक के बाद ट्रंप ने कैमरों की ओर देखते हुए पत्रकारों से सवाल पूछने को कह दिया। गोर के अनुसार, इसके बाद दोनों नेताओं के बीच करीब 45 मिनट तक मीडिया बातचीत हुई।

भारत सरकार ने क्या कहा?

गोर के बयान के बाद भारत सरकार के सूत्रों ने सफाई देते हुए कहा कि किसी भी VVIP दौरे से पहले दोनों पक्षों के बीच नेताओं के सार्वजनिक कार्यक्रमों और उनकी व्यवस्थाओं को लेकर चर्चा होना सामान्य प्रक्रिया है। सूत्रों के अनुसार, भारतीय पक्ष ने VVIP दौरों के लिए लागू अपनी सामान्य और मानक प्रक्रिया के बारे में जानकारी दी थी। ऐसे कार्यक्रमों में कार्यक्रम का स्वरूप, मीडिया की मौजूदगी और सार्वजनिक बातचीत जैसे पहलुओं पर पहले से समन्वय किया जाता है। इसलिए सरकार के सूत्रों की प्रतिक्रिया को सीधे तौर पर “भारत ने ट्रंप से सवाल लेने से मना कर दिया था” के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, यह दोनों पक्षों के बीच कार्यक्रम की व्यवस्था को लेकर हुई सामान्य बातचीत से जुड़ा मामला बताया गया है।

कब हुई थी मोदी-ट्रंप की मुलाकात?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप की यह मुलाकात 17 जून 2026 को फ्रांस में आयोजित G7 शिखर सम्मेलन के दौरान हुई थी। बैठक के दौरान दोनों नेताओं ने भारत-अमेरिका संबंधों से जुड़े कई मुद्दों पर चर्चा की थी। दिलचस्प बात यह है कि गोर के मुताबिक जिस मीडिया बातचीत को लेकर पहले से अलग व्यवस्था की बात हुई थी, वह ट्रंप के पत्रकारों से सवाल लेने के बाद लंबी बातचीत में बदल गई।

विवाद किस बात पर है?

पूरे मामले में फिलहाल दो अलग-अलग बातें सामने आ रही हैं। एक तरफ सर्जियो गोर का दावा है कि भारतीय पक्ष ने सवाल-जवाब नहीं रखने की प्राथमिकता बताई थी। दूसरी तरफ भारतीय सरकारी सूत्रों का कहना है कि VVIP कार्यक्रमों की व्यवस्थाओं पर पहले से चर्चा करना सामान्य प्रोटोकॉल का हिस्सा है। इसलिए फिलहाल उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि भारत ने ट्रंप-मोदी मुलाकात में मीडिया के सवालों पर कोई औपचारिक रोक लगाने की कोशिश की थी। गोर का बयान इस मामले में एक पक्ष का विवरण है, जबकि भारत सरकार के सूत्रों ने इसे नियमित प्रोटोकॉल से जोड़कर देखा है।

भारत-अमेरिका संबंधों पर असर?

गोर ने इसी कार्यक्रम में भारत-अमेरिका रिश्तों को मजबूत और विश्वास पर आधारित बताया था। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के व्यक्तिगत संबंधों को भी दोनों देशों के रिश्तों का अहम पहलू बताया। ऐसे में सवाल-जवाब को लेकर सामने आया यह विवाद फिलहाल किसी बड़े राजनयिक मतभेद का संकेत नहीं देता। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, मामला मुख्य रूप से G7 में हुई उस मुलाकात के मीडिया प्रोटोकॉल और कार्यक्रम की व्यवस्था से जुड़ा है। यानी सर्जियो गोर का दावा चर्चा में जरूर है, लेकिन भारत सरकार की प्रतिक्रिया के बाद तस्वीर यह बनती है कि VVIP कार्यक्रमों को लेकर पहले से प्रोटोकॉल तय करना दोनों देशों के बीच सामान्य समन्वय का हिस्सा था। 


तीस्ता से सिंधु तक... क्या भारत के खिलाफ ‘वॉटर डिप्लोमेसी’ का नया मोर्चा बना रहे पाकिस्तान और बांग्लादेश?

by पूजा झा

भारत के पड़ोसी पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ जल विवाद एक बार फिर कूटनीतिक चर्चा के केंद्र में है। एक तरफ पाकिस्तान सिंधु जल संधि को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के खिलाफ अपनी शिकायत उठा रहा है, तो दूसरी ओर बांग्लादेश 1996 की गंगा जल संधि के नवीनीकरण से पहले ‘गारंटी क्लॉज’ की मांग कर रहा है और जरूरत पड़ने पर अंतरराष्ट्रीय मंचों का रुख करने की बात कह रहा है। हालांकि, फिलहाल ऐसा कोई औपचारिक प्रमाण नहीं है कि दोनों देश भारत के खिलाफ पानी के मुद्दे पर कोई साझा मोर्चा बना रहे हैं। बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री शाहिदुद्दीन चौधरी अनी ने 19 अगस्त 2026 को ढाका में आयोजित एक सेमिनार में कहा कि भारत के साथ गंगा जल बंटवारे की संधि के नवीनीकरण के दौरान बांग्लादेश अपने जल अधिकारों की सुरक्षा के लिए गारंटी क्लॉज शामिल कराने की कोशिश करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर बांग्लादेश अपने हितों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने के लिए तैयार है।

दिसंबर में खत्म हो रही है गंगा जल संधि

भारत और बांग्लादेश के बीच 12 दिसंबर 1996 को 30 साल के लिए गंगा जल बंटवारे की संधि हुई थी। यह संधि दिसंबर 2026 में समाप्त होने वाली है और फिलहाल इसके नवीनीकरण को लेकर बातचीत महत्वपूर्ण चरण में है। बांग्लादेश की ओर से अब नए समझौते में पुराने 1977 के समझौते की तरह सुरक्षा या गारंटी प्रावधान शामिल करने की मांग उठाई जा रही है। 1977 के समझौते में बांग्लादेश के लिए एक गारंटी प्रावधान था। इसके बाद 1982 और 1985 के समझौतों में भी जल बंटवारे की अलग व्यवस्थाएं रहीं, जबकि 1996 की संधि में 1977 जैसा सामान्य न्यूनतम-गारंटी प्रावधान नहीं रखा गया। हालांकि, 1996 की संधि में यह प्रावधान है कि अगर फरक्का पर पानी का प्रवाह 50,000 क्यूसेक से नीचे चला जाता है, तो दोनों देश आपात आधार पर बातचीत कर सकते हैं। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि मौजूदा संधि में कम पानी की स्थिति से निपटने का कोई प्रावधान ही नहीं है।

तीस्ता पर भी बांग्लादेश का दबाव

गंगा के अलावा तीस्ता नदी का पानी भी भारत-बांग्लादेश संबंधों में लंबे समय से संवेदनशील मुद्दा रहा है। बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री ने हाल में कहा कि ढाका भारत के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध खराब नहीं करना चाहता, लेकिन तीस्ता से जुड़े अपने हितों को भी नजरअंदाज नहीं कर सकता। उन्होंने तीस्ता नदी के दीर्घकालिक प्रबंधन और विकास के लिए योजना आगे बढ़ाने की बात कही है। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने भी संसद में तीस्ता नदी पर प्रस्तावित बैराज को लेकर तकनीकी और वित्तीय अध्ययन जारी होने की जानकारी दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, तीस्ता मास्टर प्लान में नदी के किनारों की सुरक्षा, ड्रेजिंग, बाढ़ नियंत्रण और अन्य बुनियादी ढांचे से जुड़े काम शामिल हैं।

UNECE कन्वेंशन से मिला अंतरराष्ट्रीय मंच

बांग्लादेश ने 20 जून 2025 को संयुक्त राष्ट्र यूरोप आर्थिक आयोग यानी UNECE के 1992 वाटर कन्वेंशन में औपचारिक रूप से शामिल होकर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया था। UNECE के अनुसार, बांग्लादेश दक्षिण एशिया का पहला देश है जिसने इस कन्वेंशन में प्रवेश किया। इसका उद्देश्य सीमा-पार जल संसाधनों के प्रबंधन में सहयोग और तकनीकी सहायता को बढ़ावा देना है। बांग्लादेश के लिए यह मंच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीमा-पार जल सहयोग और अपने हितों को सामने रखने का एक अतिरिक्त माध्यम जरूर देता है। लेकिन इसे भारत के खिलाफ किसी बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई के तौर पर देखना सही नहीं होगा, खासकर इसलिए क्योंकि भारत इस कन्वेंशन का पक्षकार नहीं है।

पाकिस्तान भी सिंधु जल संधि पर UN में उठा चुका है मुद्दा

इसी बीच पाकिस्तान भी सिंधु जल संधि के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जा रहा है। अप्रैल 2026 में पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से भारत की ओर से सिंधु जल संधि को ‘अबेयन्स’ में रखने के फैसले पर हस्तक्षेप की मांग की थी। पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार का पत्र सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष को सौंपा गया था। इसमें भारत से संधि के पूर्ण क्रियान्वयन और संबंधित सहयोग एवं डेटा साझा करने की प्रक्रिया बहाल करने की मांग की गई थी। पाकिस्तान पहले भी संयुक्त राष्ट्र में इस मुद्दे को उठा चुका है। दिसंबर 2025 में पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि ने सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष को पत्र भेजकर सिंधु जल संधि को लेकर भारत के फैसले पर आपत्ति दर्ज कराई थी।

क्या बन रहा है भारत के खिलाफ ‘वॉटर फ्रंट’?

यहीं से ‘वॉटर डिप्लोमेसी’ की चर्चा शुरू होती है। पाकिस्तान सिंधु नदी प्रणाली से जुड़े अपने हितों को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय है, जबकि बांग्लादेश गंगा और तीस्ता के मुद्दे पर भारत के साथ नए सिरे से बातचीत और जरूरत पड़ने पर अंतरराष्ट्रीय मंचों का विकल्प खुला रख रहा है। दोनों देशों की रणनीति में एक समानता जरूर दिखाई देती है—जल विवादों को सिर्फ द्विपक्षीय बातचीत तक सीमित न रखते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उठाने की तैयारी। लेकिन अभी तक ऐसा कोई विश्वसनीय प्रमाण सामने नहीं आया है जिससे यह कहा जा सके कि पाकिस्तान और बांग्लादेश ने भारत के खिलाफ पानी के मुद्दे पर कोई औपचारिक या समन्वित ‘साझा मोर्चा’ बना लिया है। 
ऐसे में फिलहाल इसे एक उभरती हुई कूटनीतिक समानता के तौर पर देखना ज्यादा उचित होगा। आने वाले महीनों में गंगा जल संधि के नवीनीकरण, तीस्ता परियोजना और सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान की सक्रियता यह तय कर सकती है कि दक्षिण एशिया में पानी का मुद्दा सिर्फ संसाधन विवाद रहेगा या बड़े कूटनीतिक दबाव का माध्यम भी बन जाएगा।


गंगा जल संधि पर बांग्लादेश का सख्त रुख, गारंटी क्लॉज की मांग

भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा के पानी का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। वजह है 1996 की गंगा जल संधि, जिसकी 30 साल की अवधि दिसंबर 2026 में खत्म होने वाली है। अब नई संधि को लेकर बांग्लादेश ने अपना रुख सख्त कर दिया है। ढाका चाहता है कि नए समझौते में ‘गारंटी क्लॉज’ शामिल किया जाए, ताकि सूखे के मौसम में भी उसे पानी की एक भरोसेमंद मात्रा मिलती रहे। बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री शाहिदुद्दीन चौधरी अनी ने 18 अगस्त को ढाका में आयोजित एक सेमिनार में कहा कि उनका देश नई संधि चाहता है और जरूरत पड़ने पर इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी उठाया जा सकता है। उन्होंने ‘सूचना के अधिकार’ और गारंटी क्लॉज जैसे प्रावधानों को नए समझौते में शामिल करने पर जोर दिया।

1996 की संधि में क्या तय हुआ था?

भारत और बांग्लादेश ने 12 दिसंबर 1996 को गंगा जल बंटवारे की संधि पर हस्ताक्षर किए थे। तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। संधि 30 साल के लिए हुई थी और दिसंबर 2026 में इसकी अवधि पूरी हो रही है। इस संधि के तहत फरक्का बैराज पर गंगा के पानी का बंटवारा मुख्य रूप से लीन सीजन यानी 1 जनवरी से 31 मई के दौरान किया जाता है। पानी का आवंटन हर 10 दिन के आधार पर तय फॉर्मूले से होता है। अगर फरक्का पर प्रवाह किसी 10-दिन की अवधि में 50 हजार क्यूसेक से नीचे चला जाए, तो दोनों देशों को आपात स्थिति में आपस में सलाह-मशविरा करना होता है।

गारंटी क्लॉज की मांग क्यों?

यही इस पूरे विवाद का अहम हिस्सा है। बांग्लादेश का कहना है कि मौजूदा संधि जिस दौर के हाइड्रोलॉजिकल आंकड़ों पर आधारित थी, नदी की मौजूदा स्थिति उससे काफी बदल चुकी है। जलवायु परिवर्तन, बारिश के बदलते पैटर्न और सूखे के कारण गंगा के प्रवाह में अनिश्चितता बढ़ी है। इसलिए ढाका चाहता है कि नए समझौते में ऐसा प्रावधान हो, जो सूखे के मौसम में पानी की उपलब्धता को ज्यादा भरोसेमंद बनाए। बांग्लादेश खास तौर पर उस गारंटी क्लॉज को वापस लाने की मांग कर रहा है, जो 1977 के गंगा समझौते में मौजूद था। 1977 के समझौते में बांग्लादेश के लिए न्यूनतम हिस्सेदारी की गारंटी का प्रावधान था, लेकिन 1996 की संधि में वैसा न्यूनतम गारंटी प्रावधान शामिल नहीं किया गया।

असली विवाद कहां है- फरक्का बैराज

गंगा जल विवाद को समझने के लिए फरक्का बैराज को समझना जरूरी है। पश्चिम बंगाल में बना फरक्का बैराज गंगा के पानी का एक हिस्सा भागीरथी-हुगली नदी प्रणाली की ओर मोड़ने के लिए इस्तेमाल होता है। इसके बाद गंगा की मुख्य धारा बांग्लादेश में प्रवेश करती है, जहां इसे पद्मा कहा जाता है। भारत का तर्क है कि फरक्का का इस्तेमाल हुगली नदी में पर्याप्त पानी बनाए रखने और कोलकाता बंदरगाह की नौवहन जरूरतों के लिए किया जाता है। वहीं बांग्लादेश की लंबे समय से शिकायत रही है कि सूखे के मौसम में फरक्का के कारण उसके हिस्से में पानी का प्रवाह प्रभावित होता है। यही वजह है कि फरक्का दोनों देशों के बीच पानी के विवाद का सबसे संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है।

बांग्लादेश अब क्या चाहता है?

ढाका की मांग सिर्फ गारंटी क्लॉज तक सीमित नहीं है। बांग्लादेश पानी से जुड़े आंकड़ों और सूचनाओं को साझा करने की व्यवस्था मजबूत करना चाहता है। साथ ही वह नदी के पर्यावरण, खारेपन, पारिस्थितिकीय बहाव और ऊपरी हिस्सों में पानी के इस्तेमाल जैसे मुद्दों को भी नए ढांचे में शामिल करने की मांग कर रहा है। बांग्लादेश ने जून 2026 में भारत के सामने वार्ता का प्रस्ताव भी रखा था। अगस्त की शुरुआत में वहां की रिपोर्टों के मुताबिक ढाका भारत के जवाब का इंतजार कर रहा था। हालांकि बांग्लादेशी अधिकारियों ने बाद में कहा कि तकनीकी स्तर पर दोनों पक्षों के बीच संपर्क जारी है।

भारत के लिए चुनौती क्या है?

भारत के सामने भी मुश्किलें कम नहीं हैं। गंगा का पानी सिर्फ बांग्लादेश का मुद्दा नहीं है। फरक्का के जरिए पानी के प्रबंधन का असर पश्चिम बंगाल, खासकर हुगली नदी प्रणाली और कोलकाता क्षेत्र पर भी पड़ता है। इसलिए नई संधि में पानी की मात्रा और वितरण पर बातचीत के साथ घरेलू हितों का संतुलन भी जरूरी होगा। 1996 की संधि के तहत भारत और बांग्लादेश के बीच पानी के प्रवाह की निगरानी के लिए संयुक्त तंत्र भी है। दोनों देशों के बीच Joint Rivers Commission इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

अब आगे क्या?

दिसंबर 2026 की डेडलाइन तेजी से करीब आ रही है। बांग्लादेश चाहता है कि नई संधि में उसके लिए ज्यादा भरोसेमंद जल सुरक्षा सुनिश्चित हो और गारंटी क्लॉज वापस आए। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह बांग्लादेश की चिंताओं, पश्चिम बंगाल की जरूरतों और अपने व्यापक जल हितों के बीच संतुलन कैसे बनाए। बात सिर्फ गंगा के पानी की नहीं है। भारत और बांग्लादेश के बीच 50 से ज्यादा साझा नदियां हैं, इसलिए गंगा पर होने वाली बातचीत भविष्य में तीस्ता समेत दूसरे नदी विवादों के लिए भी एक मिसाल बन सकती है। और अब नजर इस बात पर है कि दिसंबर 2026 से पहले क्या दोनों देश गंगा जल बंटवारे के लिए नई सहमति बना पाते हैं—या फिर 30 साल पुरानी संधि दोनों देशों के रिश्तों में एक नया जल विवाद खड़ा करती है।


सर्जियो गोर का कश्मीर-लद्दाख दौरा, पाकिस्तान और चीन के लिए क्या है संदेश?

अमेरिका के भारत में राजदूत और दक्षिण-मध्य एशिया के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत सर्जियो गोर दो दिवसीय जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दौरे पर हैं। उनका यह दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव और भारत-चीन सीमा पर जारी रणनीतिक चुनौतियां चर्चा में हैं। ऐसे में गोर की यात्रा को सिर्फ औपचारिक राजनयिक दौरे के तौर पर नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर अमेरिका की बढ़ती दिलचस्पी के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। सर्जियो गोर बुधवार को श्रीनगर में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और उपराज्यपाल मनोज सिन्हा से मुलाकात करेंगे। इसके अलावा उनकी सुरक्षा से जुड़े अधिकारियों के साथ भी बातचीत प्रस्तावित है। इसके बाद 20 अगस्त को वह लद्दाख जाएंगे। यानी उनका दौरा कश्मीर से शुरू होकर सीधे उस सीमावर्ती क्षेत्र तक पहुंच रहा है, जहां 2020 की गलवान झड़प के बाद भारत और चीन के बीच तनाव का केंद्र रहा है।

पाकिस्तान के लिए क्या संदेश?

कश्मीर का मुद्दा पाकिस्तान लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है। इस्लामाबाद की कोशिश रही है कि भारत-पाकिस्तान विवाद में अमेरिका समेत बड़े देशों की भूमिका बढ़े और कश्मीर पर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की गुंजाइश बने। लेकिन सर्जियो गोर का श्रीनगर दौरा एक अलग तस्वीर पेश करता है। अमेरिकी राजदूत यहां सीधे जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व से बातचीत करेंगे और सुरक्षा व्यवस्था को भी समझेंगे। इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि अमेरिका कश्मीर की परिस्थितियों को भारत के साथ सीधे संवाद के जरिए समझने पर जोर दे रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह दौरा और महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत लगातार सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाता रहा है। ऐसे में गोर का कश्मीर पहुंचना अमेरिका के लिए क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति को जमीनी स्तर पर समझने का एक अवसर भी माना जा रहा है।

लद्दाख दौरा क्यों अहम?

गोर की यात्रा का दूसरा महत्वपूर्ण पड़ाव लद्दाख है। वर्ष 2020 में गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प के बाद दोनों देशों के संबंधों में बड़ा तनाव पैदा हुआ था। इसके बाद LAC पर सैन्य तैनाती और सीमा विवाद लगातार रणनीतिक चिंता का विषय बने रहे हैं। अमेरिका पहले भी वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर यथास्थिति को एकतरफा तरीके से बदलने की कोशिशों का विरोध करता रहा है। ऐसे में गोर का लद्दाख दौरा भारत की सीमा सुरक्षा और चीन के साथ उसके संबंधों को लेकर अमेरिकी रुचि को रेखांकित करता है। हालांकि, इस यात्रा को सीधे चीन के खिलाफ अमेरिकी कदम बताना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना जरूर है कि वॉशिंगटन भारत के सीमावर्ती इलाकों और वहां की सुरक्षा चुनौतियों को करीब से समझने की कोशिश कर रहा है। 

क्या पाकिस्तान की रणनीति को झटका?

पाकिस्तान लंबे समय से चाहता रहा है कि अमेरिका कश्मीर मुद्दे पर ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाए। लेकिन सर्जियो गोर की यात्रा का कार्यक्रम फिलहाल भारत के साथ सीधे संपर्क और क्षेत्रीय सुरक्षा पर केंद्रित नजर आता है। श्रीनगर में मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल से मुलाकात के बाद लद्दाख जाना भी इसी व्यापक रणनीतिक संदर्भ में देखा जा रहा है। इससे पाकिस्तान की उस कोशिश को झटका माना जा सकता है, जिसमें वह कश्मीर को भारत-पाकिस्तान के बीच अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के मुद्दे के रूप में पेश करना चाहता रहा है।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है दौरा?

भारत के लिए यह यात्रा इसलिए अहम है क्योंकि एक वरिष्ठ अमेरिकी राजनयिक देश के दो बेहद संवेदनशील क्षेत्रों—जम्मू-कश्मीर और लद्दाख—का दौरा कर रहे हैं। एक तरफ पाकिस्तान से जुड़ी सीमा पार आतंकवाद की चुनौती है, तो दूसरी ओर चीन के साथ LAC पर रणनीतिक तनाव।  ऐसे में सर्जियो गोर का दौरा भारत-अमेरिका रणनीतिक संबंधों में क्षेत्रीय सुरक्षा की बढ़ती अहमियत को दिखाता है। हालांकि, यात्रा के दौरान कोई बड़ा नीतिगत ऐलान होता है या नहीं, इस पर अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन कश्मीर और लद्दाख को एक ही दौरे में शामिल करना अपने आप में अमेरिका की दक्षिण एशिया और भारत-चीन सीमा से जुड़ी प्राथमिकताओं की ओर इशारा जरूर करता है।


भारत-जर्मनी के बीच 6 पनडुब्बियों का सौदा, करीब ₹90 हजार करोड़ की डील, अंतिम दौर में बातचीत

भारत और जर्मनी के बीच नौसैनिक रक्षा सहयोग को लेकर एक बड़ी डील अंतिम चरण में पहुंच गई है। प्रोजेक्ट-75आई के तहत जर्मनी की थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) और भारत की मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) मिलकर भारतीय नौसेना के लिए छह आधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियां बनाएंगे। रिपोर्टों के मुताबिक इस परियोजना की अनुमानित लागत करीब 8 अरब यूरो यानी लगभग 90 हजार करोड़ रुपये है। हालांकि अंतिम कीमत और शर्तें औपचारिक मंजूरियों और बातचीत के बाद तय होंगी। 

भारत में बनेंगी पनडुब्बियां

प्रोजेक्ट-75आई के तहत इन पनडुब्बियों का निर्माण भारत में मझगांव डॉक के जरिए किया जाना है। इस परियोजना का उद्देश्य सिर्फ पनडुब्बियां हासिल करना नहीं, बल्कि अत्याधुनिक तकनीक और निर्माण क्षमता को भारत में लाना भी है। TKMS और MDL ने सितंबर 2025 में परियोजना के लिए आधिकारिक कॉन्ट्रैक्ट वार्ता शुरू की थी। रक्षा मंत्रालय ने 2021 में छह AIP-सक्षम पारंपरिक पनडुब्बियों के लिए RFP जारी किया था। परियोजना में फ्यूल-सेल आधारित एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP), आधुनिक टॉरपीडो, मिसाइल और उन्नत सेंसर जैसी क्षमताएं शामिल हैं।

AIP तकनीक क्यों है खास?

इन पनडुब्बियों की सबसे अहम विशेषताओं में AIP सिस्टम शामिल है। यह तकनीक पनडुब्बी को बिना सतह पर आए लंबे समय तक पानी के अंदर रहने में मदद करती है। इससे उसकी स्टील्थ क्षमता और समुद्र में ऑपरेशनल एंड्योरेंस बढ़ता है। TKMS की ओर से प्रस्तावित पनडुब्बियों में AIP तकनीक के साथ आधुनिक हथियार और सेंसर सिस्टम शामिल किए जाने की योजना है। इससे भारतीय नौसेना की समुद्री निगरानी और पारंपरिक पनडुब्बी युद्ध क्षमता को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

क्यों जरूरी है यह परियोजना?

भारतीय नौसेना लंबे समय से पारंपरिक पनडुब्बी बेड़े को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। प्रोजेक्ट-75आई की शुरुआत कई साल पहले हुई थी, लेकिन तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से इसमें लगातार देरी होती रही। अब TKMS और MDL की साझेदारी के जरिए परियोजना आगे बढ़ रही है। TKMS के साथ भारत का सहयोग पूरी तरह नया भी नहीं है। भारतीय नौसेना पहले से जर्मन डिजाइन की टाइप-209 यानी शिशुमार क्लास पनडुब्बियों का संचालन करती है।

डील का रणनीतिक महत्व

भारत के लिए यह सौदा हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी समुद्री सुरक्षा और पनडुब्बी क्षमता मजबूत करने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वहीं जर्मनी के लिए भारत के साथ रक्षा और औद्योगिक सहयोग बढ़ाने का यह एक बड़ा अवसर है। रिपोर्टों के अनुसार, परियोजना पर अंतिम मंजूरी और तकनीक हस्तांतरण से जुड़ी समीक्षा अभी महत्वपूर्ण चरण में है। जून 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक डील सितंबर 2026 तक पूरी होने की संभावना जताई गई थी, हालांकि अंतिम समयसीमा सरकारी मंजूरियों और बातचीत पर निर्भर करेगी। अगर समझौता अंतिम रूप लेता है तो यह भारत की पनडुब्बी निर्माण क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ ‘मेक इन इंडिया’ और रक्षा क्षेत्र में तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में भी अहम कदम होगा।


बलूचिस्तान में BLA के 22 हमलों का दावा, 26 पाकिस्तानी जवानों की मौत की बात

पाकिस्तान के बलूचिस्तान में सुरक्षा हालात एक बार फिर तनावपूर्ण बने हुए हैं। बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने दावा किया है कि उसने पिछले आठ दिनों के दौरान प्रांत के अलग-अलग इलाकों में कुल 22 हमले किए। संगठन के मुताबिक, इन हमलों में पाकिस्तानी सेना, पुलिस चौकियों, सुरक्षा बलों के काफिलों और कथित सरकार समर्थित हथियारबंद समूहों को निशाना बनाया गया। BLA का दावा है कि इन हमलों में पाकिस्तानी सेना और कथित ‘डेथ स्क्वाड’ के करीब 26 सदस्य मारे गए, जबकि कई अन्य घायल हुए हैं। संगठन ने एक कथित सदस्य को जिंदा पकड़ने का भी दावा किया है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। BLA के अनुसार, उसके लड़ाकों ने सुरक्षा ठिकानों के अलावा पुलों, वाहनों और कमर्शियल गाड़ियों को भी निशाना बनाया। संगठन ने इसे अपनी कथित ‘आर्थिक नाकेबंदी’ का हिस्सा बताया है।

9 अगस्त से हमलों का सिलसिला

BLA के दावे के मुताबिक, 9 अगस्त को चागाई जिले में नोक चाह के पास क्वेटा-ताफ्तान ट्रेड रूट पर तीन कमर्शियल गाड़ियों को रोककर जब्त किया गया। इसके अगले दिन 10 अगस्त को खारन हाईवे के जोमी इलाके में पुलिसकर्मियों को हिरासत में लेने और विस्फोटक के जरिए एक पुलिस पोस्ट को नष्ट करने का दावा किया गया। BLA का कहना है कि बाद में हिरासत में लिए गए पुलिसकर्मियों को छोड़ दिया गया। 11 अगस्त को बुलेदा के सुराप इलाके में एक कथित सरकार समर्थित हथियारबंद समूह के ठिकाने पर कार्रवाई का दावा किया गया। BLA के मुताबिक, इस दौरान समूह का कथित नेता मारा गया, जबकि चार अन्य लोग घायल हुए। इसके अलावा संगठन ने छत्तर पुलिस स्टेशन को विस्फोटक से नष्ट करने की जिम्मेदारी भी ली है। यकमाच बाजार में गोलीबारी के दौरान तीन कमर्शियल वाहनों को नुकसान पहुंचाने और एक अन्य वाहन को कब्जे में लेने का दावा किया गया। 

सेना के काफिले पर IED हमले का दावा

BLA ने दावा किया कि कलात के रोडेनजो इलाके में पाकिस्तानी सेना के एक काफिले को IED के जरिए निशाना बनाया गया, जिसमें 17 जवान मारे गए। इसके बाद 13 अगस्त को पंजगुर के चितकान इलाके में पुलिस लाइन पर ग्रेनेड हमला किए जाने का दावा किया गया। BLA के मुताबिक, इस घटना में एक अधिकारी घायल हुआ। वहीं 14 अगस्त को तुर्बत में मोटरसाइकिल पर लगाए गए रिमोट-कंट्रोल IED से सेना के काफिले को निशाना बनाने का दावा किया गया। संगठन के अनुसार, इस हमले में तीन जवानों की मौत हुई और चार गंभीर रूप से घायल हुए। 

चौकियों और पुल को नुकसान पहुंचाने का दावा

BLA ने 15 अगस्त को सराब के मुल मदरसा इलाके में विस्फोटकों के जरिए सेना की दो चौकियों और एक पुल को नष्ट करने का दावा भी किया है। बलूचिस्तान लंबे समय से अलगाववादी हिंसा से जूझ रहा है और BLA इस क्षेत्र में सक्रिय प्रमुख बलूच अलगाववादी संगठनों में से एक है। हालिया घटनाक्रम के बीच पाकिस्तान के सुरक्षा हालात पर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, BLA की ओर से बताए गए मृतकों और हमलों के आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है, इसलिए इन दावों को आधिकारिक आंकड़ों के रूप में नहीं देखा जा सकता।


दुनिया को कच्चा तेल बेचने वाला रूस भारत से क्यों खरीद रहा पेट्रोल?

रूस दुनिया के बड़े कच्चे तेल उत्पादक और निर्यातक देशों में शामिल है। इसके बावजूद अब उसे भारत से पेट्रोल मंगाना पड़ रहा है। यह घटनाक्रम वैश्विक ऊर्जा बाजार में बदलते समीकरणों के साथ-साथ रूस की घरेलू रिफाइनिंग व्यवस्था पर बढ़ते दबाव को भी दिखाता है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, 5 अगस्त को रूस को भारत की नायरा एनर्जी से करीब 42 हजार टन पेट्रोल की पहली खेप मिली। यह सवाल इसलिए भी अहम है कि जिस रूस से भारत बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदता है, अब वही देश भारत से तैयार पेट्रोल खरीदने की स्थिति में पहुंच गया है।

यूक्रेन के ड्रोन हमलों से रिफाइनरियों पर असर

रूस के पेट्रोल संकट की सबसे बड़ी वजह उसकी रिफाइनिंग क्षमता पर पड़ा दबाव बताया जा रहा है। यूक्रेन ने पिछले कुछ वर्षों में रूस की तेल रिफाइनरियों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों को ड्रोन हमलों के जरिए निशाना बनाया है। 2026 में इन हमलों में तेजी आने से कई प्रमुख रिफाइनिंग इकाइयां प्रभावित हुई हैं। रिफाइनरियों के प्रभावित होने का सीधा असर कच्चे तेल को पेट्रोल और डीजल जैसे तैयार ईंधन में बदलने की क्षमता पर पड़ा। नतीजतन रूस के कुछ इलाकों में घरेलू ईंधन की उपलब्धता पर दबाव बढ़ा और उसे विदेशों से पेट्रोल खरीदने की जरूरत पड़ गई।

भारत से रूस पहुंची 42 हजार टन पेट्रोल की खेप

ब्लूमबर्ग के मुताबिक, भारत से रूस के लिए पेट्रोल की पहली बड़ी खेप गुजरात के वाडिनार स्थित नायरा एनर्जी की रिफाइनरी से रवाना हुई थी। करीब 42 हजार टन पेट्रोल लेकर टैंकर ने 18 जून को वाडिनार से ईंधन लोड किया। इसके बाद कार्गो को मिस्र के डेमियेटा पोर्ट पर दूसरे जहाज में ट्रांसफर किया गया और अगस्त की शुरुआत में यह रूस पहुंचा। नायरा एनर्जी में रूस की सरकारी तेल कंपनी रोसनेफ्ट की करीब 49 फीसदी हिस्सेदारी है। ऐसे में भारत से रूस को रिफाइंड पेट्रोल की सप्लाई को दोनों देशों के पारंपरिक ऊर्जा कारोबार से अलग एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई में कम से कम दो और टैंकर वाडिनार पहुंचे और पेट्रोल लेकर रवाना हुए। उद्योग से जुड़े सूत्रों के हवाले से भारत से रूस के लिए कम से कम 60 हजार टन पेट्रोल भेजे जाने की जानकारी सामने आई थी।

रूस ने दूसरे देशों से भी शुरू किया पेट्रोल आयात

रूस ने घरेलू ईंधन संकट से निपटने के लिए सिर्फ भारत का रुख नहीं किया है। जुलाई में उसने कम से कम तीन देशों से पेट्रोल आयात शुरू किया। बेलारूस और कजाखस्तान से जमीन के रास्ते ईंधन पहुंचाया गया, जबकि भारत से समुद्री मार्ग के जरिए पेट्रोल भेजा गया। रूस अब हर महीने करीब 4 लाख टन पेट्रोल आयात करने की योजना बना रहा है। बेलारूस से भी बड़ी मात्रा में पेट्रोल रेल के जरिए रूस पहुंचा है।

2005 के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंची रिफाइनिंग

रूस की रिफाइनिंग क्षमता पर पड़े असर का अंदाजा कच्चे तेल की प्रोसेसिंग से लगाया जा सकता है। एनर्जी एस्पेक्ट्स के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई की शुरुआत में रूस की रिफाइनरियां करीब 3.91 मिलियन बैरल कच्चा तेल प्रतिदिन प्रोसेस कर रही थीं। यह पिछले साल के औसत से लगभग 1.4 मिलियन बैरल प्रतिदिन कम था। रिपोर्ट के अनुसार, यह मार्च 2005 के बाद रूस के राष्ट्रीय रिफाइनिंग स्तर का सबसे निचला स्तर था। रिफाइनिंग कम होने का मतलब सीधे तौर पर पेट्रोल और अन्य तैयार ईंधनों की घरेलू सप्लाई पर दबाव बढ़ना है।

पेट्रोल के निर्यात पर भी रोक

घरेलू बाजार में पेट्रोल की उपलब्धता बनाए रखने के लिए रूस ने पेट्रोल के निर्यात पर लगी रोक को 2026 के अंत तक बढ़ा दिया है। डीजल के निर्यात पर भी प्रतिबंध लगाए गए हैं। इसके बावजूद रूस और उसके कब्जे वाले क्रीमिया के कुछ हिस्सों में पेट्रोल की कमी और राशनिंग की खबरें सामने आई हैं। रॉयटर्स के मुताबिक, गर्मियों के दौरान रूस में पेट्रोल की दैनिक खपत करीब 1.10 लाख टन तक पहुंच जाती है। जून के अंत में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी ड्रोन हमलों के कारण कुछ क्षेत्रों में ईंधन की कमी बढ़ने की बात स्वीकार की थी।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है रूस का पेट्रोल खरीदना?

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू भारत और रूस के बीच ऊर्जा व्यापार है। रूस भारत को बड़ी मात्रा में कच्चा तेल बेचता है, जबकि अब रूस भारत से तैयार पेट्रोल खरीद रहा है। जुलाई में भारत ने रूस से रिकॉर्ड करीब 2.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल आयात किया। केप्लर के मुताबिक, यह भारत के कुल कच्चे तेल आयात का करीब 55.5 फीसदी था। यानी एक तरफ रूस भारत को कच्चा तेल उपलब्ध करा रहा है और दूसरी तरफ भारत की रिफाइनिंग क्षमता उसी तेल को पेट्रोल जैसे तैयार ईंधन में बदलकर रूस तक पहुंचा रही है। यह वैश्विक तेल व्यापार में बदलती भूमिका का बड़ा उदाहरण है।

बड़ा तेल उत्पादक होकर भी पेट्रोल का आयात क्यों?

रूस का मामला यह समझने के लिए महत्वपूर्ण है कि किसी देश के पास भारी मात्रा में कच्चा तेल होना और घरेलू स्तर पर पर्याप्त पेट्रोल उपलब्ध होना एक ही बात नहीं है। कच्चे तेल को पेट्रोल, डीजल और अन्य उत्पादों में बदलने के लिए पर्याप्त और लगातार चलने वाली रिफाइनिंग क्षमता जरूरी होती है। रूस की रिफाइनरियों पर हमलों और उत्पादन क्षमता में आई कमी ने इसी अंतर को उजागर किया है। वहीं, भारत के पास बड़ी रिफाइनिंग क्षमता है। ऐसे में रूस का भारत से पेट्रोल खरीदना दोनों देशों के ऊर्जा कारोबार के बदलते स्वरूप के साथ-साथ वैश्विक तेल बाजार में बन रहे नए समीकरणों की ओर भी इशारा करता है। 


2030 तक भारतीय नौसेना के बड़े युद्धपोतों पर होगी ब्रह्मोस की तैनाती, समुद्री स्ट्राइक क्षमता होगी मजबूत

by न्यूज डेस्क

नई दिल्ली: भारतीय नौसेना अपने फ्रंटलाइन युद्धपोतों पर ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की तैनाती बढ़ाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। लक्ष्य आने वाले वर्षों में नौसेना के प्रमुख सतही युद्धपोतों को ब्रह्मोस से लैस करना है। रिपोर्टों के मुताबिक, 2030 तक नौसेना के बड़े युद्धपोतों पर इस मिसाइल की उपलब्धता सुनिश्चित करने की योजना है। इससे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की लंबी दूरी की समुद्री स्ट्राइक क्षमता और मजबूत हो सकती है।

20 फ्रंटलाइन युद्धपोतों पर पहुंचा ब्रह्मोस

2025 तक करीब 20 फ्रंटलाइन भारतीय युद्धपोत ब्रह्मोस सिस्टम से लैस हो चुके थे। नए युद्धपोतों को डिजाइन करते समय भी ब्रह्मोस की तैनाती को ध्यान में रखा जा रहा है। ब्रह्मोस एयरोस्पेस के मुताबिक, यह मिसाइल भारतीय नौसेना के विध्वंसक और फ्रिगेट जैसे फ्रंटलाइन सतही युद्धपोतों पर प्रमुख स्ट्राइक हथियार के तौर पर तैनात है। 
नीलगिरी क्लास के नए स्टील्थ फ्रिगेट्स में आठ वर्टिकल लॉन्च ब्रह्मोस मिसाइलों की क्षमता है। वहीं, नए पीढ़ी के कुछ विध्वंसक 16 तक ब्रह्मोस वर्टिकल लॉन्चर ले जा सकते हैं, जबकि पुराने प्लेटफॉर्म में आठ मिसाइलों की व्यवस्था देखने को मिलती है।

220 से ज्यादा मिसाइलों की खरीद को मंजूरी

फरवरी 2024 में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी ने भारतीय नौसेना के युद्धपोतों के लिए 200 से ज्यादा ब्रह्मोस मिसाइलों की खरीद को मंजूरी दी थी। इस सौदे की अनुमानित कीमत करीब 19,000 करोड़ रुपये बताई गई थी। इसमें मौजूदा और विस्तारित रेंज वाले ब्रह्मोस वेरिएंट शामिल थे। इसके बाद अगस्त 2025 में डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल ने नौसेना के लिए ब्रह्मोस फायर कंट्रोल सिस्टम और वर्टिकल लॉन्च सिस्टम की अतिरिक्त खरीद को भी मंजूरी दी। इसका उद्देश्य ज्यादा युद्धपोतों पर मिसाइल सिस्टम के एकीकरण को आगे बढ़ाना है।

समुद्र से जमीन और समुद्र दोनों पर हमला करने में सक्षम

ब्रह्मोस एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जिसे समुद्री प्लेटफॉर्म से समुद्र और जमीन आधारित लक्ष्यों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है। ब्रह्मोस एयरोस्पेस के अनुसार, नौसैनिक संस्करण को वर्टिकल और इनक्लाइंड दोनों तरह के लॉन्च सिस्टम से दागा जा सकता है। मिसाइल की सुपरसोनिक गति और स्टैंड-ऑफ क्षमता इसे नौसेना के लिए महत्वपूर्ण स्ट्राइक सिस्टम बनाती है। ब्रह्मोस की खासियतों में सल्वो लॉन्च क्षमता भी शामिल है, जिसके तहत कम अंतराल में कई मिसाइलें अलग-अलग लक्ष्यों या अलग-अलग दिशाओं में दागी जा सकती हैं। इससे युद्धपोत की समुद्री स्ट्राइक क्षमता बढ़ती है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी अहमियत

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ब्रह्मोस की भूमिका के बाद इस मिसाइल सिस्टम की सामरिक अहमियत पर भी खास ध्यान गया। भारतीय सशस्त्र बलों में ब्रह्मोस पहले से ही जमीन, समुद्र और हवा से लॉन्च किए जाने वाले अलग-अलग वेरिएंट में मौजूद है। नौसेना की दीर्घकालिक योजना पुराने युद्धपोतों पर मौजूद एंटी-सरफेस मिसाइल प्रणालियों को आधुनिक ब्रह्मोस सिस्टम से बदलने और नए युद्धपोतों में शुरुआत से ही इसकी क्षमता शामिल करने की है।

2030 तक क्या बदलेगा?

2030 तक नौसेना के पास ब्रह्मोस से लैस युद्धपोतों की संख्या और बढ़ने की उम्मीद है। नए फ्रिगेट और विध्वंसक लगातार बेड़े में शामिल किए जा रहे हैं, जबकि पुराने प्लेटफॉर्म पर रेट्रोफिटिंग के जरिए मिसाइल सिस्टम लगाया जा रहा है। इससे भारतीय नौसेना की लंबी दूरी की समुद्री मारक क्षमता में महत्वपूर्ण इजाफा हो सकता है।  
ब्रह्मोस भारत और रूस का संयुक्त उपक्रम है। समय के साथ इसके उत्पादन में स्वदेशी सामग्री और तकनीक की हिस्सेदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है। नौसेना के आधुनिकीकरण और 2047 तक आत्मनिर्भरता के लक्ष्य के बीच ब्रह्मोस भारतीय समुद्री शक्ति के प्रमुख स्ट्राइक सिस्टम में बना हुआ है।


भारत समेत रूस के बड़े तेल खरीदारों पर 100% तक टैरिफ, US सीनेट में रूस प्रतिबंध बिल पास

वॉशिंगटन: रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच अमेरिका ने रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। अमेरिकी सीनेट ने रूस पर नए प्रतिबंध लगाने वाले एक व्यापक विधेयक को भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है। इस बिल में रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान शामिल है। भारत भी उन देशों में शामिल है, जिन पर इस प्रावधान का असर पड़ सकता है। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि भारत पर अभी 100 प्रतिशत टैरिफ लागू नहीं हुआ है। सीनेट से पास हुआ बिल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ऐसा टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रस्ताव करता है। इसके लिए बिल को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से भी मंजूरी और उसके बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर की जरूरत होगी।

86-11 वोट से पास हुआ बिल

अमेरिकी सीनेट ने शुक्रवार को 86-11 वोट से 'Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026' को मंजूरी दी। यह विधेयक रूस के अधिकारियों और उससे जुड़े लोगों पर नए प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ रूस की ऊर्जा आय पर दबाव बढ़ाने की कोशिश करता है। बिल का नाम दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के नाम पर रखा गया है। ग्राहम रूस के खिलाफ कड़े प्रतिबंधों और यूक्रेन के समर्थन के प्रमुख अमेरिकी पैरोकारों में शामिल थे। उनका 11 जुलाई 2026 को निधन हो गया था। उनकी जगह उनकी बहन डार्लिन ग्राहम को दक्षिण कैरोलिना से अंतरिम सीनेटर नियुक्त किया गया है। सीनेट में मतदान के बाद डार्लिन ग्राहम ने सदन में बिल के पारित होने का आंकड़ा पढ़ा। इस दौरान सीनेट में तालियां भी बजीं।

भारत पर क्यों पड़ सकता है असर?

बिल का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रूस की ऊर्जा खरीद से जुड़ा है। प्रस्तावित कानून राष्ट्रपति को उन देशों से आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की अनुमति देता है, जो रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदते हैं। रॉयटर्स के अनुसार, इस प्रावधान के दायरे में भारत के साथ चीन और कुछ यूरोपीय देश तथा जापान जैसे बड़े रूसी ऊर्जा खरीदार आ सकते हैं। हालांकि अंतिम टैरिफ लगाना राष्ट्रपति के विवेक पर निर्भर होगा। इसलिए यह कहना कि 'अमेरिका ने भारत पर 100% टैरिफ लगा दिया' अभी सही नहीं होगा। फिलहाल सही स्थिति यह है कि अमेरिकी सीनेट ने ऐसा कानून पास किया है, जो आगे चलकर भारत समेत कुछ देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार दे सकता है।

रूस के अधिकारियों और संस्थानों पर भी प्रतिबंध

बिल में रूसी अधिकारियों, कुलीन कारोबारियों यानी ओलिगार्क्स और अन्य संबंधित संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाने के प्रावधान भी हैं। इसका उद्देश्य रूस की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा से होने वाली आय पर अतिरिक्त दबाव बनाना है। अमेरिका का तर्क है कि रूस की ऊर्जा से होने वाली आय उसके यूक्रेन युद्ध को वित्तीय मदद देती है। नए प्रतिबंधों का मकसद रूस की आय के स्रोतों को सीमित करना और उन देशों पर दबाव बढ़ाना है जो रूसी ऊर्जा खरीद रहे हैं।

ईरान पर भी बढ़ेगा अमेरिकी दबाव

रूस के अलावा इस विधेयक में ईरान से जुड़े प्रतिबंधों को भी आगे बढ़ाने का प्रावधान शामिल है। अमेरिकी lawmakers ने ईरान के ऊर्जा और हथियार क्षेत्र से जुड़े प्रतिबंधों को जारी रखने की दिशा में भी इसमें प्रावधान जोड़े हैं।

अब प्रतिनिधि सभा में जाएगा बिल

सीनेट से मंजूरी मिलने के बाद अब बिल अमेरिकी House of Representatives यानी प्रतिनिधि सभा में जाएगा। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा 31 अगस्त को ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद फिर से बैठक करेगी और इसके बाद बिल पर आगे की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। हालांकि प्रतिनिधि सभा में बिल के टैरिफ प्रावधानों को लेकर विरोध की संभावना है। कुछ सांसदों और अमेरिकी उद्योग जगत को आशंका है कि नए टैरिफ अधिकारों से अमेरिका में आयातित सामान की लागत बढ़ सकती है और इसका असर अमेरिकी कंपनियों तथा उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।


आतंकवाद पर शेख हसीना के बेटे का बयान, ISI पर लगाए आरोप, पाकिस्तान ने भारत पर साधा निशाना

नई दिल्ली: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के बेटे और पूर्व आईसीटी सलाहकार सजीब वाजेद जॉय के एक बयान को लेकर पाकिस्तान और भारत के बीच जुबानी तकरार तेज हो गई है। जॉय ने बांग्लादेश में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI की कथित भूमिका पर सवाल उठाए, जिसके बाद पाकिस्तान ने सीधे आरोपों का जवाब देने के बजाय भारत पर निशाना साधा। मीडिया ब्रीफिंग के दौरान एक पत्रकार ने पाकिस्तानी अधिकारी से सजीब वाजेद जॉय के उस बयान पर सवाल पूछा, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि बांग्लादेश में ISI को खुली छूट मिली हुई है। इसके जवाब में पाकिस्तानी अधिकारी ने कहा, "भारत ISI को लेकर पैरानॉयड है, शायद यह संक्रमण उन्हें लग गया है।" हालांकि, उन्होंने जॉय के आरोपों पर कोई ठोस जवाब नहीं दिया।

पाकिस्तान के बयान में तथ्यात्मक गलती

पाकिस्तानी अधिकारी ने यह भी संकेत दिया कि सजीब वाजेद जॉय भारत में रह रहे हैं, जबकि यह तथ्य सही नहीं है। जॉय लंबे समय से अमेरिका में रह रहे हैं। दूसरी ओर, उनकी मां शेख हसीना अगस्त 2024 में सत्ता से हटने के बाद भारत आई थीं और फिलहाल यहीं रह रही हैं।
यह पहली बार नहीं है जब सजीब वाजेद जॉय ने ISI की कथित भूमिका पर सवाल उठाए हैं। वर्ष 2024 में बांग्लादेश में राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान भी उन्होंने परिस्थितिजन्य सबूतों के आधार पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी की संभावित संलिप्तता पर संदेह जताया था। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।  
सजीब वाजेद जॉय लगातार विदेश से अपनी मां और अवामी लीग के समर्थन में बयान देते रहे हैं।

वहीं, शेख हसीना भी हाल के महीनों में बांग्लादेश लौटने की इच्छा जता चुकी हैं। इस पूरे घटनाक्रम की सबसे अहम बात यह रही कि ISI पर लगे आरोपों का सीधा जवाब देने के बजाय पाकिस्तान ने भारत पर हमला बोला। इससे भारत-पाकिस्तान के बीच खुफिया एजेंसी ISI को लेकर लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक और कूटनीतिक तनातनी एक बार फिर सुर्खियों में आ गई है।


हूती विद्रोहियों के बड़े हमले से मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ा, यमन में 58 सैनिकों की मौत, सऊदी अरब में भी कई घायल

by न्यूज डेस्क

नई दिल्ली: मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने गुरुवार को यमन और सऊदी अरब में एक साथ बड़े हमले किए। यमन में सैन्य ठिकानों को बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन से निशाना बनाया गया, जबकि सऊदी अरब के नजरान क्षेत्र पर भी हमला हुआ। इन घटनाओं के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की चर्चा ने वैश्विक ऊर्जा और शिपिंग बाजारों की चिंता बढ़ा दी है।यमन के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, हूती विद्रोहियों के हमले में 58 सैनिकों की मौत हो गई, जबकि कई अन्य घायल हुए हैं। मंत्रालय ने कहा कि इस हमले का जवाब सही समय और सही जगह पर दिया जाएगा। वहीं, सऊदी अरब के नजरान क्षेत्र में हुए हमले में 11 नागरिक घायल हुए हैं। घायलों में 7 सऊदी नागरिक, एक यमनी, दो मिस्री, एक पाकिस्तानी नागरिक और 4 साल का एक बच्चा शामिल है। स्थानीय प्रशासन ने घायलों का इलाज शुरू कर दिया है और सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है।

होर्मुज डील पर बढ़ी हलचल   

इस बीच, AP की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका और ईरान के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर समझौते की संभावना तेज हो गई है। बताया जा रहा है कि ईरान और ओमान के बीच मसौदा अंतिम चरण में है, जिससे क्षेत्र में समुद्री आवाजाही के नए नियम तय हो सकते हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि ईरान ने खुद बातचीत की पहल की है और दोनों पक्षों के बीच वार्ता में सकारात्मक प्रगति हुई है। उनके मुताबिक, संभावित समझौता ईरान के हित में होगा। समुद्री ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, बढ़ते तनाव का असर वैश्विक शिपिंग पर भी दिख रहा है। बुधवार को होर्मुज जलडमरूमध्य से केवल दो जहाज गुजरे, जबकि सामान्य दिनों में यहां 130 से 140 जहाज प्रतिदिन गुजरते हैं। वहीं, बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य में भी जहाजों की आवाजाही लगातार घट रही है। दुनिया के आठ प्रमुख शिपिंग संगठनों ने संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन से अपील की है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर किसी भी प्रकार का टोल या अतिरिक्त शुल्क लागू न किया जाए। उनका कहना है कि ऐसा होने पर समुद्री परिवहन महंगा होगा, जिसका सीधा असर वैश्विक व्यापार, ईंधन की कीमतों और महंगाई पर पड़ेगा। 


होर्मुज पर होगा ईरान का कब्जा, ओमान से डील पर हो रही बात!

पिछले कुछ समय से ईरान और अमेरिका के बीच जंग जारी है, जिस कारण होर्मुज पर तनाव बढ़ा हुआ है और दोनों देश स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज पर कब्‍जा जमाने की कोशिश कर रहे हैं. इस बीच, रॉयटर्स की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान का स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज पर बड़ा कंट्रोल हो सकता है, क्‍योंकि ईरान और ओमान एक डील को लेकर चर्चा कर रहे हैं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दोनों देश इस बात पर भी चर्चा कर रहे हैं कि 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' से गुजरने वाली जहाजों पर टैक्‍स लगाए जाएंगे. इन जहाजों से 7 फीसदी का शिपिंग चार्ज लग सकता है, जिसका मतलब है कि ईरान इस डील से हर साल एक बड़ा अमाउंट हासिल कर सकता है. 

दावा है कि ईरान को शिपिंग टोल से हर साल 100 अरब डॉलर की आय हो सकती है. शिपिंग टोल सिर्फ कमर्शियल जहाजों पर ही लागू होगा. रॉयटर्स कहता है कि यह एक ऐसा कदम है, जो जियो-पॉलिटिकल टेंशन को और भी बढ़ा सकता है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार , ईरान और ओमान इस डील पर चर्चा कर रहे हैं जिससे खाड़ी में आने-जाने वाले जहाजों पर ईरान का अधिक नियंत्रण हो जाएगा. इस प्रस्ताव के तहत, जहाज आने-जाने दोनों ही यात्राओं में ईरानी जलक्षेत्र से होकर गुजरेंगे, जिससे ईरान को चार्ज वसूलने का अधिकार मिल सकता है. ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने ईरान की IRNA समाचार एजेंसी को बताया कि जहाज दोनों दिशाओं में ईरानी क्षेत्रीय जलक्षेत्र से होकर गुजरेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि ईरान को संकेत मिले हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका जून में हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन (MOU) में उल्लिखित समझौतों पर लौटने के लिए तैयार है.

ईरान इसके बदले क्या कीमत वसूलना चाहता है? 

अलग-अलग रिपोर्ट के अनुसार, ईरान वस्‍तु की कीमत के 5% से 7% के बीच शुल्क लगाने पर जोर दे रहा है, जबकि ओमान ने कथित तौर पर 3% का कम शुल्क प्रस्तावित किया है. हालांकि अभी तक कोई समझौता नहीं हुआ है, लेकिन ग्‍लोबल एनर्जी ट्रेड में होर्मुज की भूमिका ने इस प्रस्‍ताव की ओर सभी का ध्‍यान खींचा है. विश्व के तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा इस संकरे मार्ग से होकर गुजरता है, जिससे पारगमन नियमों में कोई भी बदलाव ऊर्जा बाजारों, बीमा कंपनियों और शिपिंग कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है.

कितनी होगी कमाई 

अनुमानों के अनुसार, अगर ईरान पहले की तरह शिपिंग मात्रा के तहत होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले सभी कमर्शियल यातायात पर 7% टोल लगाने में सक्षम होता, तो वह हरदिन लगभग 385 मिलियन डॉलर बना सकता है, जो सालाना 100 बिलियन डॉलर से अधिक है इन स्तरों पर, होर्मुज टोल से होने वाली वार्षिक आय दुनिया की कुछ सबसे बड़ी कंपनियों, जिनमें प्रमुख टेक कंपनियां और ऊर्जा क्षेत्र की दिग्गज कंपनियां शामिल हैं, की वार्षिक शुद्ध आय के बराबर हो सकती है. यह स्वेज नहर द्वारा अर्जित ऐतिहासिक उच्चतम वार्षिक टोल राजस्व को भी बौना कर देगी. 


PoK आंदोलन को कुचलने पहुंचा जैश कमांडर, पीस कमेटी में आतंकी!

by न्यूज डेस्क

नई दिल्ली पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoJK) में जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के आंदोलन के बीच एक नया विवाद सामने आया है। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों और सुरक्षा सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि आंदोलन को शांत कराने के लिए पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के समर्थन से एक तथाकथित 'पीस कमेटी' रावलाकोट भेजी गई। इस प्रतिनिधिमंडल को लेकर विवाद इसलिए गहराया है क्योंकि इसमें प्रतिबंधित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (JeM) के वरिष्ठ कमांडर इलियास कश्मीरी के शामिल होने का दावा किया जा रहा है। हालांकि, इस दावे की पाकिस्तान सरकार, ISI या किसी स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय एजेंसी द्वारा आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। सामने आए वीडियो और दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि भी नहीं हो सकी है।

क्या है पूरा मामला?

PoJK में पिछले कई महीनों से JAAC स्थानीय लोगों की मांगों को लेकर आंदोलन चला रहा है। संगठन बिजली दरों में कमी, महंगाई पर नियंत्रण, टैक्स व्यवस्था में बदलाव और स्थानीय अधिकारों को लेकर पाकिस्तान प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन कर रहा है। इसी बीच कुछ मीडिया रिपोर्टों और सुरक्षा सूत्रों ने दावा किया कि आंदोलन को नियंत्रित करने के लिए एक प्रतिनिधिमंडल रावलाकोट पहुंचा, जिसे 'पीस कमेटी' का नाम दिया गया। दावा है कि इस दल में जैश-ए-मोहम्मद का वरिष्ठ कमांडर इलियास कश्मीरी भी मौजूद था।

वीडियो आने के बाद बढ़ा विवाद

सोशल मीडिया पर एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि इलियास कश्मीरी कैमरे से बचते हुए दिखाई दे रहा है। हालांकि वीडियो की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है और न ही किसी सरकारी एजेंसी ने इसकी आधिकारिक पुष्टि की है। यदि यह दावा सही साबित होता है, तो यह सवाल खड़ा होता है कि शांति वार्ता के लिए भेजे गए प्रतिनिधिमंडल में किसी प्रतिबंधित आतंकी संगठन से जुड़े व्यक्ति की कथित मौजूदगी कैसे हुई।

कौन है इलियास कश्मीरी? 

रिपोर्टों के अनुसार, इलियास कश्मीरी को जैश-ए-मोहम्मद का वरिष्ठ कमांडर माना जाता है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद उसने कथित तौर पर यह दावा किया था कि भारतीय सैन्य कार्रवाई में मसूद अजहर के परिवार के कई सदस्य मारे गए थे। हालांकि उसके हालिया कथित तौर पर 'पीस कमेटी' का हिस्सा होने के दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, लश्कर-ए-तैयबा (LeT) भी JAAC आंदोलन के खिलाफ प्रचार अभियान चला रहा है। दावा किया गया है कि संगठन आंदोलन के नेताओं को "गद्दार" बताकर उनके खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि इस संबंध में भी कोई आधिकारिक सार्वजनिक बयान सामने नहीं आया है।

JAAC आंदोलन क्या है?

जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में सक्रिय नागरिक संगठन है, जो क्षेत्र में बढ़ती महंगाई, बिजली के ऊंचे बिल, टैक्स और स्थानीय लोगों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर लंबे समय से आंदोलन कर रहा है। इस आंदोलन के दौरान कई बार बड़े प्रदर्शन हुए हैं और पाकिस्तान प्रशासन के साथ तनाव भी देखने को मिला है। फिलहाल PoJK में आंदोलन जारी है। वहीं, ISI समर्थित कथित 'पीस कमेटी' और उसमें आतंकी कमांडर की मौजूदगी के दावों को लेकर पाकिस्तान सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। चूंकि वीडियो और सुरक्षा सूत्रों के दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, इसलिए इस पूरे मामले को लेकर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है।


ट्रंप की अपनी सेना पर 'सर्जिकल स्ट्राइक'! आर्मी चीफ रैंडी जॉर्ज को बीच जंग में फायर किया गया

by KhabarCafe

ईरान युद्ध के बीच अमेरिकी प्रशासन ने बड़ा झटका दिया है। रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने आर्मी चीफ ऑफ स्टाफ जनरल रैंडी जॉर्ज को तत्काल प्रभाव से पद से हटाकर रिटायरमेंट लेने को कहा है। पेंटागन के प्रवक्ता शॉन पार्नेल ने इसकी पुष्टि की है।

यह फैसला ईरान के खिलाफ चल रही सैन्य कार्रवाई के बीच आया है, जब अमेरिका हवाई हमलों को तेज कर रहा है। कई मीडिया रिपोर्ट्स में इसे ट्रंप प्रशासन की "सेना को अपनी लाइन पर लाने" की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

क्यों हटाया गया रैंडी जॉर्ज?

  • जनरल रैंडी जॉर्ज को पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के समय में आर्मी चीफ बनाया गया था।
  • ट्रंप और हेगसेथ अपनी "विजन" को लागू करने के लिए नई लीडरशिप चाहते हैं।
  • सूत्रों के मुताबिक, हेगसेथ ने सीधे जॉर्ज से "इमीडिएट रिटायरमेंट" की मांग की।
  • उनकी जगह आर्मी वाइस चीफ जनरल क्रिस्टोफर ला-नेव को कार्यवाहक चीफ बनाया गया है।

यह घटना अमेरिकी सेना में चल रही "प्यूरिज" (सफाई) का हिस्सा लग रही है। ईरान वॉर के दौरान टॉप जनरल को हटाने से कई सवाल उठ रहे हैं — क्या ये सैन्य रणनीति में बदलाव का संकेत है? या राजनीतिक नियंत्रण बढ़ाने की कोशिश?

ट्रंप प्रशासन ने साफ संदेश दिया है कि पेंटागन अब पुरानी लीडरशिप के साथ नहीं चलेगा। ईरान जंग का नया चैप्टर शुरू होते ही अमेरिकी सेना के अंदर भी हलचल तेज हो गई है।


161 जिंदगियां मौत के मुंह में थीं! इंडिगो फ्लाइट 6E-579 का दिल्ली एयरपोर्ट पर इंजन फेलियर, इमरजेंसी लैंडिंग से बचा बड़ा हादसा

161 जिंदगियां मौत के मुंह में थीं! इंडिगो फ्लाइट 6E-579 का दिल्ली एयरपोर्ट पर इंजन फेलियर, इमरजेंसी लैंडिंग से बचा बड़ा हादसा

by KhabarCafe

नई दिल्ली, 28 मार्च 2026: विशाखापत्तनम से दिल्ली आ रही इंडिगो की फ्लाइट 6E-579 में लैंडिंग से ठीक पहले एक इंजन अचानक बंद हो गया। बोइंग 737-800 विमान में कुल 161 यात्री और क्रू सदस्य सवार थे। पायलटों की त्वरित सूझबूझ और एटीसी के समन्वय से विमान ने दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर सुरक्षित इमरजेंसी लैंडिंग कर ली। किसी को कोई चोट नहीं आई।

क्या हुआ था? विमान दिल्ली पहुंचने के करीब था, तभी नंबर-1 इंजन (CFM-56) में तेज़ कंपन (वाइब्रेशन) महसूस हुआ और बिना किसी कमांड के इंजन बंद हो गया। यह एक तरह की इन-फ्लाइट इंजन शटडाउन की स्थिति थी, जो लैंडिंग के समय बेहद खतरनाक हो सकती है। विमान के संतुलन बिगड़ने, रनवे से फिसलने या आग लगने का खतरा था।

समयरेखा:

  • सुबह करीब 10:39-10:53 बजे: पायलटों ने एटीसी को इमरजेंसी घोषित की।
  • एयरपोर्ट पर फुल इमरजेंसी लागू की गई, दमकल की गाड़ियां और बचाव दल तैयार रखे गए।
  • 10:54 बजे: विमान रनवे 28 पर एक इंजन पर ही सुरक्षित लैंडिंग कर लिया।

लैंडिंग के तुरंत बाद एम्बुलेंस और बचाव टीमें पहुंचीं। सभी यात्रियों को सुरक्षित उतारा गया।

इंडिगो का बयान: "लैंडिंग से ठीक पहले तकनीकी खराबी का पता चला। स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर के अनुसार पायलटों ने प्राथमिकता लैंडिंग का अनुरोध किया। विमान सुरक्षित उतर गया। यात्री और क्रू की सुरक्षा हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। विमान की जांच और रखरखाव चल रहा है।"

डीजीसीए का बयान: विमान वेट-लीज पर लिया गया था (टर्की की कोरेंडन एयरलाइंस से)। इंजन में उच्च वाइब्रेशन के बाद अनकमांडेड शटडाउन हुआ। जांच के लिए विमान को ग्राउंड कर दिया गया है।

विशेषज्ञों की राय: कम ऊंचाई पर इंजन फेलियर सबसे जोखिम भरी स्थिति होती है क्योंकि पायलट के पास सुधार के लिए बहुत कम समय होता है। इस बार पायलटों और एटीसी की बेहतरीन टीमवर्क ने 161 जिंदगियों को बचाया।

अभी तक किसी यात्री ने शिकायत नहीं की है और फ्लाइट को आगे की जांच के लिए भेज दिया गया है।


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इधर ईरान संग बातचीत भी, उधर मिडिल ईस्ट में 10 हजार और सैनिक भेजने की तैयारी

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका अगले 10 दिनों तक ईरान के एनर्जी प्लांट्स और तेल सुविधाओं पर कोई हमला नहीं करेगा। उन्होंने दावा किया कि ईरान के साथ बातचीत चल रही है और ये “बहुत अच्छी” जा रही है। ट्रंप ने Truth Social पर पोस्ट कर कहा कि ईरानी सरकार की अनुरोध पर उन्होंने हमलों को 6 अप्रैल तक के लिए टाल दिया है।

वहीं वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, पेंटागन मिडिल ईस्ट में 10,000 तक अतिरिक्त ग्राउंड ट्रूप्स भेजने की योजना बना रहा है। इससे ट्रंप को ईरान के खिलाफ ज्यादा सैन्य विकल्प मिल सकेंगे, भले ही दोनों पक्ष बातचीत कर रहे हों।

(आपके दिए अतिरिक्त वाक्य “ये ड्रोन नावें...” को शामिल नहीं किया क्योंकि वो इस खबर के मुख्य संदर्भ से मैच नहीं कर रहा था। अगर उसे भी जोड़ना हो तो बताएं।)

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